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रविवार, 18 दिसंबर 2022

मुक्तक 007: 05डी मौसम बदलेगा से

मुक्तक 007

 :1:
कोई हफ़्तों न करे बात, कोई बात नहीं
आप दो पल न करें बात तो डर लगता है
दिल-ए-वीरान में अब कौन इधर आता है
आप आते हैं तो  वीरान भी घर लगता है

:2:
दर्द-ए-हस्ती है मुख़्तसर भी नहीं
ख़त्म होने को ये सफ़र भी नहीं
रंग मुझ पर चढ़ा मुहब्बत का
और इसकी मुझे ख़बर भॊ नहीं

;3:
तुम्हारी गली से निकल कर जो आया
ये दुनिया न भायी , न ख़ुद को मैं भाया
अजब सा नशा चढ़ गया है जो मुझ पर
न उतरे कभी ज़िंदगी भर ख़ुदाया !

:4:
आप से जब मिले हम सफल हो गए
रास्ते ज़िंदगी के सरल हो गए
दर्द उड़ते रहे बादलों की तरह
आँसुओं में ढले तो ग़ज़ल हो गए


-आनन्द.पाठक ’आनन’-

880092 7181



मुक्तक 006 :03 डी मौसम बदलेगा से

 

मुक्तक 006

:1: 

कहीं कुछ बात ऐसी है, छुपा कर रह गई तुम भी
जो होंठो पर रही बातें, दबा कर रह  गई तुम भी
ये मेरा क्या कि तनहा था कि तनहा ही रहूँगा मैं
जगे थे दर्द जो दिल में सुला कर रह गई तुम भी

:2:
आस्माँ देखते ना चला कीजिए
ठोकरों से ज़मीं पर बचा कीजिए
ज़िंदगी का सफ़र एक लम्बा सफ़र
हर क़दम सोच कर ही रखा कीजिए

:3:
कभी कभी तो डर लगता है कैसे प्यार सँभालूँगा मैं
इतना प्यार जो तुम करती हि कैसे कर्ज उतारूँगा मैं
देख रहा हूँ ख़्वाब अभी से आने वाले कल का जानम
इन्शा अल्लाह इक दिन तुमको पलकों पर बैठा लूंगा मैं

;4:
कुरबत ने कुछ तो दिल में उम्मीद है जगाई
आए थे ख़्वाब रंगी ,ना नींद आज आई
जाने किधर को लेकर जाएगा दिल दिवाना
यह कैसी तिश्नगी है ये कैसी आशनाई


-आनन्द.पाठक ’आनन’

880092 7181



मुक्तक 005 : 02डी मौसम बदलेगा से

मुक्तक 005

 :1;
चन्द लमहे भी क्या हसीं होते
आप मेरे जो हमनशीं होते
ज़िंदगी और भी संवर जाती
आप दिल के अगर मकीं होते

:2:
दीप उम्मीद का इक जलाए रखा
उनके स्वागत में पलकें बिछाए रखा
वो न आएँ  न आएँ भले उम्र भर
इक मिलन का भरम था बनाए रखा


:3:
यह चमन है हमारा, तुम्हारा भी है
ख़ून देकर सभी ने सँवारा भी है
कौन है जो हवा में ज़ह्र घोलता
कौन है जो कि दुश्मन का प्यारा भी है


;4:
बात क्या थी जो मुझसे छुपाई गई
जो सर-ए-बज़्म सबको बताई गई
कुछ भी कहने की मुझको इजाज़त नहीं
सिर्फ़ मुझ पर ही बन्दिश लगाई गई

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

880092 7181


रविवार, 15 मई 2022

ग़ज़ल 236 [37 D]: तुम्हारी ज़ुल्फ़ को छू कर

 


1222---1222---1222---1222


ग़ज़ल 236[37 D]


तुम्हारी ज़ुल्फ़ को छू कर हवाएँ गा रहीं सरगम
तुम्हे जब देख लेती हैं नशे में झूमती  हरदम

हमेशा पूछती कलियाँ बता ऎ बाग़वाँ मेरे !
चमन में कौन आता है बहारों का लिए मौसम

न कोई अब तमन्ना है, न कोई आरज़ू बाक़ी
हुए जब से हमारे तुम ख़ुशी का है इधर आलम

फ़रिश्तों ने बताया था तुम्हारी कैफ़ियत सारी
वही सच मान कर हर्फ़न इबादत कर रहे हैं हम

ज़ुबाँ जब दे दिया तुमको, निभाना जानता भी हूँ
कभी तुम आजमा लेना रहूँगा मैं सदा क़ायम

न कोई शर्त होती है, न शिकवा ही मुहब्बत में
मुहब्बत का सफ़र होता लब-ए-दम तक मेरे जानम 

तसव्वुर मे , ख़यालों में, तुम्हारा मुन्तज़िर ’आनन’
मुजस्सम तुम चले आते तो मिट जाते हमारे ग़म 


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

 कैफ़ियत =ब्यौरा, विवरण

हर्फ़न     = अक्षरश:

लब-ए-दम  तक =आखिरी साँस तक

मुन्तज़िर = प्रतीक्षारत

मुजस्सम = सशरीर


गुरुवार, 12 मई 2022

ग़ज़ल 235[03 D] : हालात-ए-ख़ुमारी में

 ग़ज़ल 235[03 D]


221--1222 //221---1222


हालात-ए-खुमारी में जाने मैं किधर आया
मालूम नहीं मुझको कब यार का दर आया

कैसी ये कहानी है तुमने जो सुनाई है
सीने में छुपा मेरा इक दर्द उभर आया

है कौन यहाँ ऐसा जिसको न मिला ग़म हो
हर बार तपा हूँ मैं, हर बार निखर आया

जीवन का सफ़र है क्या? मर मर के यहाँ जीना
कालीन बिछी राहें ?, ऐसा न सफ़र आया

आती है सदा किसकी करता है इशारे कौन?
कोई तो यक़ीनन है लेकिन न नज़र आया 

जीवन के सफ़र में, हाँ ,ऐसा भी हुआ अकसर
ज़ुल्मत न उधर बीती, सूरज न इधर आया

दुनिया के झमेलों में, उलझा ही रहा ’आनन’
जब आँख खुली उसकी, तब लौट के घर आया


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ 

ज़ुल्मत = अँधेरा ,तीरगी

इसी ग़ज़ल को मेरी आवाज़ में यहाँ सुने


मंगलवार, 10 मई 2022

ग़ज़ल 234[98 D] : ज़िंदगी ग़म भी शादमानी भी

 ग़ज़ल 234[98 D]


2122---1212---22


ज़िंदगी ग़म भी शादमानी भी
इक हक़ीक़त भी है कहानी भी

हादिसे कुछ ज़मीन के आइद
कुछ बलाएँ भी आसमानी भी

प्यार मेरा पढ़ेगी कल दुनिया
एक राजा था एक रानी भी

तेरे अन्दर ही इल्म की ख़ुशबू
तेरे अन्दर ही बदगुमानी भी

अब न आएगा लौट कर  बचपन
अब न लौटेगी वो जवानी भी

दर्द अपना बयान करता है
कुछ तो आँखों से कुछ ज़ुबानी भी 

लुत्फ़ है ज़िन्दगी अगर ’आनन’
साथ में तल्ख़-ए-ज़िंदगानी भी


-आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 233 [97 D] : जन्नत से वो निकाले--

 ग़ज़ल 233[97 D]


221--2122 // 221--2122


जन्नत से है  निकाला , हमको मिली सज़ा है
दिल आज भी हमारा ,उतना ही बावफ़ा है

तेरी नज़र में शायद , गुमराह हो गया हूँ
मैने वही किया है , इस दिल ने जो कहा है

जब तक नहीं मिले थे, सौ सौ ख़याल मन में
जब रूबरू हुए वो , सजदे में सर झुका है 

रहबर की शक्ल में थे, किरदार रहजनों -सा
दो-चार गाम पर ही, यह कारवाँ लुटा है

ज़ाहिद की बात अपनी, रिंदो की बात अपनी
दोनों के हैं दलाइल, दोनों को सच पता है

जो कुछ वजूद मेरा, तेरी ही मेहरबानी
आगे भी हो इनायत, बस इतनी इल्तिजा है

आरिफ़ नहीं हूँ ’आनन’, इतना तो जानता हूँ
दिल में न हो मुहब्बत,  फिर तो वो लापता है ।


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

गाम = क़दम

दलाइल = दलीलें ,तर्क [ दलील का ब0व0\

ज़ाहिद  = धर्मोपदेशक

रिंद      = शराबी

आरिफ़ = तत्व ज्ञानी, ध्यानी, ज्ञाता

पोस्टेड 28-05-22




गुरुवार, 5 मई 2022

ग़ज़ल 232[96D] : हमारी सोच में चन्दन की ख़ुशबू है

 ग़ज़ल 232 [96 D]
1222---1222---1222----1222

हमारी सोच में चन्दन की खुशबू है, मेरी थाती
तुम्हारी सोच नफ़रत से नहीं आगे है बढ़ पाती

चमन अपना, वतन अपना, ये कलियाँ फूल सब अपने
वो नफरत कौन सी ऐसी कि जो पत्थर है चलवाती

तुम्हारे रहबरों ने की अँधेरों की तरफ़दारी
नहीं पूछा किसी ने रोशनी क्यों घर नहीं आती

कहाँ होता है कोई फ़ैसला तलवार ख़ंज़र से
अगर मिल बैठ कर जो बात करते बात बन जाती

दिया तनहा तुम्हें दिखता है लेकिन है नहीं तनहा
दुआएँ अम्न की है साथ उसके, जल रही बाती

सभी अपनी ग़रज़ से हैं सियासत के बने मोहरे
ये दुनिया है जहाँ मौक़ा मिले तो चाल चल जाती

ये उनका काम है ’आनन’, लड़ाना और लड़वाना
तुम्हें उनकी खुली साज़िश समझ में क्यॊं नही आती

-आनन्द.पाठक-

गुरुवार, 28 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 231[95D] : जब हक़ीक़त से सामना होगा

 ग़ज़ल 231[95 D]

2122---1212---22

जब हक़ीक़त से सामना  होगा
हस्र-ए-उलफ़त तुम्हें पता होगा !

वक़्त सबका हिसाब रखता है
फिर तुम्हारी अना का क्या होगा?

आग दामन को छू रही है, वो
मजहबी खेल में लगा होगा ।

गर्म होने लगी हवाएँ  हैं-
सानिहा फिर कोई नया होगा

ख़्वाब टूटा तो ग़मज़दा क्यों हो ?
 इक नया रास्ता खुला होगा

जो भी होना है वो तो होना है
तेरी क़िस्मत में जो लिखा होगा

 उस से अब भी उमीद है ’आनन’
एक दिन वह भी बावफा होगा ।


-आनन्द.पाठक-


सोमवार, 25 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 230 [94 D] : ख़ुदाया काश वह मेरा--

 ग़ज़ल 230 [94 D]

1222---1222---1222---1222


ख़ुदाया ! काश वह मेरा कभी जो हमनवा होता
उसी की याद में जीता, उसी पर दिल फ़ना होता

कभी तुम भी चले आते जो मयख़ाने में ऎ ज़ाहिद !
ग़लत क्या है, सही क्या है, बहस में कुछ मज़ा होता

किसी के दिल में उलफ़त का दिया जो तुम जला देते
कि ताक़त रोशनी की क्या ! अँधेरों को पता होता 

उन्हीं से आशनाई भी , उन्हीं से है शिकायत भी
करम उनका नहीं होता तो हमसे क्या हुआ होता

नज़र तो वो नहीं आता, मगर रखता ख़बर सब की
 जो आँखें बन्द करके देखता, शायद दिखा होता 

वो आया था बुलाने पर, वो पहलू में भी था बैठा
निगाहेबद नहीं होती , न मुझसे वो ख़फ़ा होता

निहाँ होना, अयाँ होना, पस-ए-पर्दा छुपे रहना
वो बेपरदा चले आते समय भी रुक गया होता

हसीनों की निगाहों में बहुत बदनाम है ’आनन’
हसीना रुख बदल लेतीं, कभी जब सामना होता


-आनन्द.पाठक-

पोस्टॆड 30-04-22

रविवार, 24 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 229 [40D] : अगर सच से न घबराते

 1222--1222--1222-1222

ग़ज़ल 229 [40 D]

अगर सच से न घबराते, तो मंज़र और कुछ होता
गुनाहों से जो बाज़ आते, तो मंज़र  और कुछ होता

तुम्हारे हाथ में माचिस, चिराग़ों को जलाते तुम
उजाला दिल में फैलाते, तो मंज़र और कुछ होता

बना कर सीढ़ियाँ तुमको, वो तख़्त-ओ-ताज तक पहुँचे
अगर तुम बिक नहीं जाते, तो मंज़र और कुछ होता

बना ली दूरियाँ तुमने, इन आक़ाओं के कहने पर
न कहने में अगर आते , तो मंज़र और कुछ होता

डराते हैं तुम्हे हर दिन, कहीं यह ’वोट’ ना फिसले
अगर तुम डर नहीं जाते, तो मंज़र और कुछ होता

ग़रज उनकी जो होती है, तुम्हे मोहरा बनाते है
न आपस में वो लड़वाते, तो मंज़र और कुछ होता

यहाँ पर कौन है किसका, सभी मतलब के हैं ’आनन’
कभी तुम बेग़रज़ आते, तो मंज़र और कुछ होता


-आनन्द.पाठक-



शनिवार, 23 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 228 [92 D] सबक़ उलफ़त का पढ़ आते ---

 ग़ज़ल 228 [92 D]


1222--1222---1222--1222


सबक़ उलफ़त का पढ़ आते ,नज़ारा और कुछ होता
अगर नफ़रत न फैलाते , नज़ारा और कुछ होता ।

जहाँ पत्थर थे बरसाए, जहाँ तलवार लहराए
वहाँ गर फूल बरसाते ,नज़ारा और कुछ होता ।

जलाते जा रहे हो बस्तियाँ, दूकाँ ,मकाँ ,छप्पर
ज़हानत पर उतर आते, नज़ारा और कुछ होता ।

अगर तुम क़ैद ना करते चमन के रंग, ख़ुशबू तो
सुमन हर डाल खिल जाते, नज़ारा और कुछ होता ।

फ़रेबी रहनुमाओं के जो चालों में न तुम फँसते
निकल बाहर चले आते, नज़ारा और कुछ होता ।

सियासत भी है मज़हब में, बने हैं क़ौम के लीडर
इरादे जो समझ जाते ,नज़ारा और कुछ होता ।

इधर भी सरफ़िरे कुछ हैं  उधर भी सरफ़िरे ;आनन’ 
तराने प्यार के गाते, नज़ारा और कुछ होता ।


आनन्द.पाठक



मंगलवार, 19 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 227 [91 D]: यूँ उनकी शान के आगे है--

 ग़ज़ल 227 [91 D]


1222--1222--1222--12


यूँ उनकी शान के आगे है  मेरी शान क्या  !
इनायत हो न जब उनकी मेरी पहचान क्या !

हवा नफ़रत जो फ़ैलाए तो है किस काम की
न फैलाएअगर ख़ुशबू हवा का मान क्या

गिरह तू चाहता है खोलना ,खुलती नहीं
तेरा अख़्लाक़ क्या है ताक़त-ए-ईमान क्या  !

शराइत हैं हज़ारों जब, हज़ारों बंदिशें
तुम्हारे दर तलक जाना कहीं आसान क्या !

दिखाता राह इन्सां को मुहब्बत का दिया
जले ना आग सीने में तो फिर इन्सान क्या

कभी तुमने नहीं देखा ख़ुद अपने आप को
वगरना ज़िंदगी होती कभी अनजान क्या

जो कहना चाहते हो तुम ज़रा खुल कर कहो
तुम्हारी चाहतें क्या ,ख़्वाब क्या, अरमान क्या

अक़ीदत हो तुम्हारे दिल में हो जो हौसला
तो  ’आनन’ सामने हो आँधियाँ तूफ़ान क्या !


-आनन्द.पाठक-


शराइत = शर्तें

अक़ीद्त = श्रद्धा विश्वास

प्र0 20-04-22


बुधवार, 13 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 226 [90 D] : बुजुर्गों की दुआएँ हो तो

 ग़ज़ल 226 [90 D]


1222---1222--1222--1222


बुजुर्गों की दुआएँ  हो तो हासिल हर ख़ुशी होगी
उन्हीं से रहबरी होगी, उन्हीं से रोशनी  होगी

न हुस्ना हमसफ़र कोई, न काँधे पर टिका सर हो
मुहब्ब्त के बिना भी ज़िंदगी क्या ज़िंदगी होगी

हमें मालूम है उनकी बुलंदी की हक़ीक़त क्या
क़लम गिरवी रखी होगी ज़ुबाँ उनकी  बिकी होगी

वो आया था यही कह कर बदल देगा ज़माने को
सियासत में उलझ कर बात उसकी रह गई होगी

समझ कर भी न समझो तो फिर आगे और क्या कहना
तुम्हारी सोच में शायद कहीं कोई कमी होगी

जो नफ़रत से भरा हो दिल नज़र कुछ भी न आएगा
मुहब्ब्बत से जो भर लोगे ख़ुदा की बंदगी होगी

सही क्या है ग़लत क्या है न समझोगे कभी ’आनन’
कि जबतक आँख पर ख़ुदगर्ज़ की पट्टी बँधी होगी


-आनन्द पाठक-


रविवार, 10 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 225 [89 D] : मुलव्विस हूँ हमेशा मैं---

 

ग़ज़ल 225 [89 D]

1222-----1222-----1222----1222


मुलव्विस हूँ हमेशा मै, गुनाहों में, ख़ताओं में
मगर वो याद रखता है, मुझे अपनी दुआओं मे

रहूँ या ना रहूँ कल मैं ग़ज़ल मेरी मगर होगी
जो ख़ुशबू बन के फैलेगी ज़माने की हवाओं में

नजूमी तो नहीं हूँ मैं मगर इतना तो कह सकता
सुनाऊँ दास्ताँ अपनी तो गूँजेंगी फ़िज़ाओं में

कभी शे’र-ओ-सुख़न मेंरे सुनोगे जो अकेले में
छ्लक आएँगे दो आँसू तुम्हारी भी निगाहों में

रफ़ाक़त अब नहीं वैसी कि पहले थी कभी जैसी
मगर शामिल रहोगी तुम सदा मेरी दुआओं में

नज़ाक़त भी, तबस्सुम भी, लताफ़त भी, क़यामत भी
कहीं मैं खो नहीं जाऊँ तुम्हारी इन अदाओं में

खला में बारहा तुमको पुकारा नाम ले ’आनन’
सदा आती है किसकी लौट कर आती सदाओं में।


-आनन्द.पाठक-

-


मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 224 [88 D]: एक रिश्ता जो ग़ायबाना है

 

ग़ज़ल 224[88D]

2122—1212—22

 

एक रिश्ता जो ग़ायबाना1 है ,
उम्र भर वह हमें निभाना है ।
 
इतनी ताक़त दे ऎ ख़ुदा मेरे !
आज उनसे नज़र मिलाना है ।
 
शेख जी ! फिर वही रटी बातें ?
और क्या कुछ नया बताना है ?
 
रंग-सा घुल गई समन्दर में ,
बूँद का बस यही फ़साना है ।
 
वो पुकारेगा जब कभी मुझको,
काम हो लाख , छोड़ जाना है।
 
तेरी आदत वही पुरानी है -
ज़ख़्म देकर के भूल जाना है ।
 
बात सबकी सुना करो ’आनन’ ,
जो कहे दिल वो आज़माना है ।
 

-आनन्द.पाठक-

 

1-    1- परोक्ष में. छिपा छिपा

सोमवार, 4 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 223 [87 D]: अनाड़ी था नया था राहबर

 

ग़ज़ल 223 [87D]

1222---1222---1222---1222


अनाड़ी था, नया था, राहबर था बदगुमाँ मेरा
कि उसकी रहबरी में लुट गया है कारवाँ मेरा
 
धुआँ जब फेफड़ॊ में था, जलन आँखों में थी उसकी
 मिली जी भर खुशी उसको जला जब आशियाँ मेरा
 
ज़माने की हवाओं से मुतासिर हो गया वह भी
कि अपनी पीठ खुद ही थपथापाता हमज़ुबाँ मेरा
 
चमन मेरा, वतन मेरा, सभी मिल बैठ कर सोचें
जहाँ तक भी हवा जाए ,ये महके गुलसिताँ मेरा
 
ग़म-ए-दौरां, ग़म-ए-जानाँ, कभी मज़लूम के आँसू
यही हर्फ़-ए-सुख़न मेरा, यही रंग-ए-बयाँ  मेरा
 
अगर दिल तोड़ दे कोई, बिना पूछे चले आना
मुहब्बत से भरा है दिल ये बह्र-ए-बेकराँ1  मेरा
 
कहाँ मिलता है कोई अब यहाँ दिल खोल कर ’आनन’
किसे फ़ुरसत पड़ी है जो सुने दर्द-ए-निहां2 मेरा

 

 

-आनन्द.पाठक-

 

1-     अत्यधिक, असीम सागर 2- दिल का छिपा हुआ दर्द

 

शुक्रवार, 11 मार्च 2022

ग़ज़ल 222 [01D] : करें जब गोपियों की चूड़ियाँ --

 ग़ज़ल 222[01D]

1222---1222---1222---1222


ग़ज़ल 221 के ज़मीन पर 
एक और ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ।

ग़ज़ल --होली में


करें जो गोपियों की चूड़ियाँ झंकार होली में ,
बिरज में खूब देतीं है मज़ा लठमार होली में   ।

अबीरों के उड़ें बादल कहीं है फ़ाग की मस्ती
कहीं गोरी रचाती सोलहो शृंगार होली में  ।

इधर कान्हा की टोली है उधर ’राधा’ अकेली है
चलें दोनो तरफ़ से रंग की बौछार होली में ।

कहीं है  थाप चंगों पर, कहीं पायल की छमछम है,
कही पर कर रहा कोई सतत मनुहार होली में ।

किसी के रंग में रँग जा, न आता रोज़ यह मौसम,
किसी का हो गया है जो, वही हुशियार होली में ।

बिरज की हो, अवध की हो, कि होली हो’ बनारस’ की
खुले दिल से करें स्वागत , करें सत्कार होली में ।

गुलालों में घुली हैं स्नेह की ख़ुशबू  मुहब्बत की ,
भुला कर सब गिले शिकवे गले मिल यार होली में ।

न खाली हाथ लौटा है यहाँ से आजतक कोई ,
चले आना कि ’आनन’ का खुला है द्वार होली में ।


-आनन्द.पाठक-
8800927181

इसी ग़ज़ल को मेरी आवाज़ में सुनें



ग़ज़ल 221[86D] : न रूठो तुम ,चली आओ--

 ग़ज़ल 221[86 D ]

1222---1222----1222---1222


चली आओ, न रूठो तुम,  करेंगे प्यार होली में
मुझे देना है दिल अपना तुम्हें उपहार होली में

भले आओ न आओ तुम, गिला कुछ भी नहीं तुमसे
करूँगा याद मैं तुमको, सनम सौ बार होली में

ख़ता है छेड़ना तुमको, पता है क्या सज़ा होगी
कहाँ कब मानता है दिल, सज़ा स्वीकार होली में

तेरी तसवीर में ही रंग भर कर मान लूँगा मैं
हुई चाहत मेरी पूरी, प्रिये ! इस बार होली  में

ज़माने की निगाहों से ज़रा बच कर चला करना
ख़बर क्या क्या उड़ा देंगे, सर-ए-बाज़ार होली में

ये फ़ागुन की हवाएँ हैं, नशा भरती हैं नस-नस में
तुम्हारा रूप उस पर से, जगाता प्यार होली में

गिरीं रुख़सार पर ज़ुल्फ़ें,  जवानी खुद से बेपरवा
करे जादू तुम्हारे रूप का  शृंगार होली में 

लगाना रंग ’आनन’ को. न उतरे ज़िंदगी भर जो
यही है प्यार का मौसम गुल-ओ-गुलज़ार होली में


-आनन्द.पाठक-

  

मंगलवार, 8 मार्च 2022

ग़ज़ल 220 : ्जुल्मात में मशाल जलाती रही

 

ग़ज़ल 220

221—2121—1221—212


जुल्मात में मशाल जलाती रही ग़ज़ल
हर दौर-ए-इन्क़लाब में गाती रही ग़ज़ल

पैग़ाम-ए-इश्क़ सबको सुनाती रही ग़ज़ल
दुनिया के ग़म का बोझ उठाती रही ग़ज़ल
 
मायूसियों के दौर में कोई हो ग़मजदा
तारीक़ियों में राह दिखाती रही ग़ज़ल
 
ग़ंग-ओ-जमन की मौज सी लबरेज़ प्यार से
नफ़रत की आग दिल की बुझाती रही ग़ज़ल
 
आदाब-ए-ज़िंदगी कभी अरकान-ए-तर्बियत
तहज़ीब-ए-गुफ़्तगू भी सिखाती रही ग़ज़ल

दरबार में रही कभी ,घुँघरू में जा बसी
उतरी तो फिर अवाम पे छाती  रही ग़ज़ल
 
ख़ुशबू ज़बान की है हलावत लिए हुए
ग़ैरो को भी गले से लगाती रही ग़ज़ल
 
अल्फ़ाज़ बाँधने की ये जादूगरी नहीं
अन्दर में रूह तक कहीं जाती रही ग़ज़ल
 
’आनन’ ग़ज़ल की खूबियाँ क्या जानता नहीं ?
दो दिल की दूरियों को मिटाती रही ग़ज़ल।

-आनन्द.पाठक-