मुक्तक 005
:1;
चन्द लमहे भी क्या हसीं होते
आप मेरे जो हमनशीं होते
ज़िंदगी और भी संवर जाती
आप दिल के अगर मकीं होते
चन्द लमहे भी क्या हसीं होते
आप मेरे जो हमनशीं होते
ज़िंदगी और भी संवर जाती
आप दिल के अगर मकीं होते
:2:
दीप उम्मीद का इक जलाए रखा
उनके स्वागत में पलकें बिछाए रखा
वो न आएँ न आएँ भले उम्र भर
इक मिलन का भरम था बनाए रखा
:3:
यह चमन है हमारा, तुम्हारा भी है
ख़ून देकर सभी ने सँवारा भी है
कौन है जो हवा में ज़ह्र घोलता
कौन है जो कि दुश्मन का प्यारा भी है
;4:
बात क्या थी जो मुझसे छुपाई गई
जो सर-ए-बज़्म सबको बताई गई
कुछ भी कहने की मुझको इजाज़त नहीं
सिर्फ़ मुझ पर ही बन्दिश लगाई गई
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
880092 7181
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें