अनुभूतियाँ : क़िस्त 033 ओके
129
क्यों चिन्ता में डूबी रहती?
सबके साथ यही होता है,
कोई पा जाता है मंज़िल
कोई आजीवन रोता है ।
130
झूठ भले हो जितना सुन्दर
होते उसके पाँव नहीं है
सच तो चलता रहे निरन्तर
सच को मिलता छाँव नहीं है।
131
सच की राह बहुत लम्बी है
झूठ डगर पर हाथ मलोगी,
दोनों राह तुम्हारे सम्मुख
सोचो तुम किस राह चलोगी?
132
प्रश्न यही सौ बार उठा है
रिश्ता किसने तोड़ा पहले ,
इतने दिन तक साथ चली थी
फिर किसने मुँह मोड़ा पहले ।
-आनन्द.पाठक
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सबके साथ यही होता है,
कोई पा जाता है मंज़िल
कोई आजीवन रोता है ।
होते उसके पाँव नहीं है
सच तो चलता रहे निरन्तर
सच को मिलता छाँव नहीं है।
झूठ डगर पर हाथ मलोगी,
दोनों राह तुम्हारे सम्मुख
सोचो तुम किस राह चलोगी?
प्रश्न यही सौ बार उठा है
रिश्ता किसने तोड़ा पहले ,
इतने दिन तक साथ चली थी
फिर किसने मुँह मोड़ा पहले ।
-आनन्द.पाठक
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