शनिवार, 25 मई 2019

चन्द माहिया : क़िस्त 58


चन्द माहिया : क़िस्त 58 ओके

:1:
सदचाक हुआ दामन
तेरी उलफ़त में
बरबाद हुआ ’आनन’

:2:
क्यों रूठी हो ,हमदम
कैसे मनाना है
कुछ मुझ को  सिखा जानम

:3:
दिल ले ही लिया तुमने
जाँ भी ले लेते
क्यों छोड़ दिया तुमने ?

:4:
लहरा के न चल पगली
दिल पे रह रह के
गिर जाती है बिजली


:5:
क्या पाना क्या खोना
जब से गए हो तुम
दिल का खाली कोना


-आनन्द.पाठक--

चन्द माहिया : क़िस्त 57

चन्द माहिया : क़िस्त 57 ओके

1
वादा करना आसाँ
कौन निभाता है ?
ऎ ,मेरे दिल-ए-नादाँ

2
जब हो ही गए रुस्वा
छोड़ो जाने दो
 क्या तुम से गिला शिकवा

3
खुद को तो छुपा लोगी
ख़ुशबू जुल्फ़ों की
तुम कैसे छुपाओगी

4
ये ग़ैब अदा किसकी
दिल पे तारी है
हर साँस सदा किसकी

5
तसवीर तेरी, बातें
करती रहती हैं
कटती रहती रातें

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 18 मई 2019

ग़ज़ल 121 [07 A] : सपने हैं रखे गिरवी

           221--  --1222           //221--      1222
       मफ़ऊलु--मफ़ाईलुन    // मफ़ऊलु---मफ़ाईलुन

ग़ज़ल 121[07 A]  :  सपनों हैं रखे गिरवी-- ओके


सपने हैं रखे गिरवी, साँसों पे उधारी है
 क़िस्तों में सदा हमने, यह उम्र  गुज़ारी  है

 
हर सुब्ह रहे ज़िन्दा, हर शाम रहे मरते
 
जितनी है मिली क़िस्मत, उतनी ही हमारी है

 
अबतक है कटी जैसे, बाक़ी भी कटे वैसे
 
सदचाक रही हस्ती, हर बार सँवारी  है

 
जब से है उन्हें देखा, मदहोश हुआ हूँ, मैं
 
उतरा न नशा अबतक, कैसी ये ख़ुमारी  है

 
दावा तो नहीं करता, पर झूठ नहीं यह भी
 
जब प्यार न हो दिल में, हर शख़्स भिखारी है

 
देखा तो नहीं उसको, सब उसकी नज़र में हैं
 
जो सबको नचाता है, वह कौन मदारी  है ?

 
जैसा भी रहे मौसम, बिन्दास जिओ, ’आनन’
 
दिन और बचे कितने, उठने को सवारी है ।


 -आनन्द.पाठक-
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[सं 18-05-19]



ग़ज़ल 120 [26 A] : दुनिया से जब चलूँ मैं--

221---2122  //221--2122

 ग़ज़ल [26 A ] ओके : दुनिया से जब चलूँ मैं-- ओके

दुनिया से जब मैं जाऊँ  ,पीड़ा मेरी  घनी हो=
इक हाथ पुस्तिका  हो .इक हाथ  लेखनी हो

सूली पे रोज़ चढ़ कर ,ज़िन्दा रहा हूँ कैसे
आएँ हमारे घर पर, गर रीति  सीखनी हो

हर दौर में रही है ,सच-झूठ की लड़ाई
तुम ’सच’ का साथ देना,जब झूठ से ठनी हो

बेचैनियाँ हों दिल में ,दुनिया के सौ मसाइल
तब मैकदे में  आना .खुद से न जब बनी  हो

जंग-ओ-जदल से हासिल, अब तक न कुछ हुआ है
पैग़ाम-ए-इश्क़ देना, जो जंग रोकनी हो

चाहत यही रहेगी ,घर घर में  हो दिवाली
हर दिल में हो मुहब्बत, हर दिल में रोशनी हो 

माना कि है फ़क़ीरी ,फिर भी बहुत है दिल में
’आनन’ से ले के जाना , उल्फ़त जो बाँटनी हो


-आनन्द.पाठक-
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मंगलवार, 7 मई 2019

ग़ज़ल 119 : झूठ का है जो फैला--

212--      -212--       -212
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़ाइलुन

एक ग़ज़ल : झूठ का है जो फैला धुआँ---

झूठ का है जो  फैला  धुआँ
साँस लेना भी मुश्किल यहाँ

सच की उड़ती रहीं धज्जियाँ
झूठ का दबदबा  था जहाँ

चढ़ के औरों के कंधों पे वो
आज छूने चला  आसमाँ

तू इधर की उधर की न सुन
तू अकेला ही  है  कारवाँ

जिन्दगी आजतक ले रही
हर क़दम पर कड़ा इम्तिहाँ

बेज़ुबाँ की ज़ुबाँ  है ग़ज़ल
हर सुखन है मेरी दास्ताँ

एक ’आनन’ ही तनहा नहीं
जिसके दिल में है सोज़-ए-निहाँ

-आनन्द.पाठक-

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