शनिवार, 29 मई 2021

ग़ज़ल 174 : किसी के प्यार में ये दिल लुटा दिया मैने

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ग़ज़ल 174

किसी के प्यार में ये दिल लुटा दिया मैने
हसीन जुर्म पे ख़ुद को सज़ा  दिया  मैने ।

तलाश जिसकी थी वो तो नहीं मिला फिर भी
तमाम उम्र उसी में गँवा दिया मैने ।

भटक न जाएँ मुसाफ़िर कहीं अँधेरों में
चिराग़ राह में दिल का जला दिया मैने ।

जहाँ भी नक़्श-ए-क़दम आप का नज़र आया
मुक़ाम-ए-ख़ास समझ, सर झुका दिया मैने ।

इसी उमीद  में जीता रहा कि आओगे
ख़बर न आई तो दीया बुझा दिया मैने ।

नहीं हूँ फ़ैज़ तलब जो भी फ़ैसला कर दो
गुनाह जो भी था अपना बता दिया मैने ।

लगे न दाग़ कहीं इश्क़ पाक है ’आनन’
फ़ना का रस्म था वो भी निभा दिया मैने ।

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ
फ़ैज़-तलब = यश का आकांक्षी
मुक़ाम-ए-ख़ास = विशिष्ट स्थान
फ़ना = प्राणोत्सर्ग


बुधवार, 26 मई 2021

ग़ज़ल 173 :पास मेरे था उसका पता उम्र भर--

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फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन
बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम


ग़ज़ल 173

पास मेरे था उसका पता उम्र भर
लाख ढूँढा उसे ,ना मिला उम्र भर

बारहा वह मिला मैने देखा नहीं
बीच में थी खड़ी इक अना उम्र भर

आप से क्या मिले इक घड़ी दो घड़ी
ख़ुद से ख़ुद ही रहा मैं जुदा उम्र भर

क्या ग़लत, क्या सही, क्या गुनह, क्या सवाब
मन इसी में उलझता गया उम्र भर

ज़ाहिरी तौर पर हों भले हम सुखन 
आदमी आदमी से डरा उम्र भर

पास आया भी वह , मुस्कराया भी वह
पर बनाए रहा, फ़ासिला उम्र भर 

छोड़ कर वह गया जब से ’आनन’ मुझे
फिर न कोई मिला दूसरा उम्र भर

-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ 
अना = अहम ,अहंकार
गुनह ,सवाब = पाप पुण्य
हमसुखन = बात करने वाले दोस्त


रविवार, 23 मई 2021

ग़ज़ल 172 : जो कहा तुमने ---

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ग़ज़ल 172


जो कहा तुमने ,मैने माना है

जानता था कि वो बहाना है


बारहा ज़िन्दगी नहीं मिलती

जो मिली है  उसे निभाना है


हसरतें दिल की दिल में दफ़्न हुईं

राज़ यह भी नहीं बताना है


मौत उलझी हुई पहेली है

ज़िन्दगी इक नया फ़साना है


एक रिश्ता अज़ल से है क़ायम

क्या नया और क्या पुराना है 


इश्क़ की राह में सुकून कहाँ

साँस जब तक है चलते जाना है


किस  ख़ता की सज़ा है ये,’आनन’

रुख से पर्दा नहीं उठाना है 


-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ

बारहा = बार बार

अज़ल = आदि काल से  

ग़ज़ल 171 : आँकड़ों से हक़ीक़त छुपाना भी क्या !

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ग़ज़ल 171 

आँकड़ों से हक़ीक़त छुपाना भी क्या
रोज़ रंगीन सपने  दिखाना भी क्या !

सोच में जब भरा  हो  धुआँ ही धुआँ
उनका सुनना भी क्या और सुनाना भी क्या !

वो जमीं के मसाइल न हल कर सके
चाँद पर फिर महल का बनाना भी क्या !

बस्तियाँ जल के जब ख़ाक हो ही गईं
बाद जलने के आना न आना भी क्या !

अब सियासत में बस गालियाँ रह गईं
ऎसी तहजीब को आजमाना भी क्या !

चोर भी सर उठा कर चले आ रहें
उनको क़ानून का ताज़ियाना भी क्या !

लाख दावे वो करते रहे साल भर
उनके दावों का सच अब बताना भी क्या !

इस व्यवस्था में ’आनन’ कहाँ तू खड़ा ,
तेरा जीना भी क्या, तेरा जाना भी क्या !

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ 
मसाइल = समस्यायें .मसले
ताज़ियाना = चाबुक ,कोड़े

प्र0

ग़ज़ल 170 : उँगलियाँ वो सदा उठाते हैं--

 ग़ज़ल 170

2122---1212---22


उँगलियाँ वो सदा उठाते हैं

शोर हर बात पर मचाते हैं


आप की आदतों में शामिल है

झूठ की ’हाँ ’ में”हाँ ’ मिलाते हैं


आँकड़ों से हमें वो बहलाते

रोज़ सपने नए दिखाते हैं


बेच कर आ गए ज़मीर अपना

क्या है ग़ैरत ! हमें सिखाते हैं


लोग यूँ तो शरीफ़ से दिखते

साथ क़ातिल का ही निभाते हैं


चल पड़ा इक नया चलन अब तो

दूध के हैं  धुले,  बताते हैं


दर्द सीने में पल रहा ’आनन’

हम ग़ज़ल दर्द की सुनाते हैं


-आनन्द.पाठक -

प्र0

शुक्रवार, 21 मई 2021

ग़ज़ल 169 : अगर ढलान से दर्या नहीं चला होता

 ग़ज़ल 169


1212---1122---1212---22


अगर ढलान से दर्या नहीं चला होता

मिलन की प्यास का सागर को क्या पता होता


तुम इतमिनान से इलजाम धर गए मुझ पर

जवाब क्या था मेरा भी तो सुन लिया होता


हसीन ख़्वाब दिखा कर उसे न बहलाते

वो जानता जो हक़ीक़त तो मर गया होता


कि तुम भी हो गए शामिल हवा की साज़िश में 

चराग़ तुम न बुझाते ,नहीं बुझा होता


तमाम धमकियाँ सहता रहा ज़माने की

चमन के दर्द का कोई तो हमनवा होता


यक़ीन कौन करेगा तुम्हारी बातों का

कहीं भी सच का  ज़रा रंग तो मिला होता


ज़मीर वक़्त पे जो जागता नहीं ’आनन’

किसी के पाँव के नीचे दबा पड़ा होता


-आनन्द पाठक-



सोमवार, 17 मई 2021

ग़ज़ल 168 : सभी ग़म एक से होते--

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ग़ज़ल 168


सभी ग़म एक से होते, नहीं होते किसी के कम

बयाँ कर देते हैं आँसू,  छुपाएँ लाख चाहे हम


दिया ख़ुद को जलाती है तो होता रास्ता रोशन

हवाएँ धौस देती हैं ,न जाने क्यों उसे हरदम


उमीदों के दरख़्तों पर कभी तो फूल आएँगे

बहारें लौट आएँगी ,बदलने दो ज़रा मौसम


सफ़र किसका कहाँ तक जा के रुक जाए नहीं मालूम

चलो मिल कर जलाते हैं मुहब्बत का दिया जानम


सितारे चाँद आ जाते उतर कर आसमाँ से ,सच

ज़रा कुछ दूर तक चलते निभाते साथ जो हमदम


क्षितिज के पार से जाने बुलाता कौन है मुझको

कि लगता है कोई रिश्ता पुराना है अभी क़ायम


ये जीवन चार दिन का है गुज़ारें हँस के सब ’आनन’

कहाँ होगे सखे ! कल तुम ,कहाँ होंगे न जाने हम 


-आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 167 : मुहब्बत में दीवानों को

 ग़ज़ल 167 : मुहब्बत में दीवानों को--

1222---1222---1222---1222-


मुहब्बत में दीवानों को नसीहत क्या ! हिदायत क्या !

अलग दुनिया में रहते हैं ,जमाने को शिकायत क्या !


रखा जिस हाल में मुझको कोई होता तो रो देता

मिली जो भी ख़ुशी थोड़ी तो हँसने में  किफ़ायत क्या !


जो बन कर पेड़ जंगल के, थपेड़े वक़्त के सहते

जुड़े अपनी जड़ो से है तो फिर उनकी हिफ़ाज़त क्या !


जो ज़िन्दा क़ौम होती हैं ,जमाने को बदल देती

कि मुर्दा क़ौम से होगी भला कोई बग़ावत क्या !


शहीदों ने कटाए सर कि उअन्के शौक़ थे अपने

किसी की मेह्र्बानी क्या ,किसी से लें इजाज़त क्या


किसी के इश्क़ में डूबा सदा रहता है दिल अपना

किया ख़ुद को समर्पण तो इबादत क्या ! जियारत क्या !


हमारे हौसले अपने, हमारे रास्ते अपने

अलग दुनिया है ’आनन’ की ,कोई हर्फ़-ए-इनायत क्या 


-आनन्द पाठक-