गुरुवार, 28 नवंबर 2019

एक ग़ज़ल 133 : मेरे जानाँ --



2122--        -1212--     --22
फ़ाइलातुन---मफ़ाइलुन---फ़े’लुन

एक ग़ज़ल : मेरे जानाँ --

मेरे जानाँ ! न आज़मा  मुझको
जुर्म किसने किया ,सज़ा मुझको

ज़िन्दगी तू ख़फ़ा ख़फ़ा क्यूँ है ?
क्या है मेरी ख़ता ,बता  मुझको

सामने वो नज़र नहीं  आता
कौन फिर दे रहा सदा मुझको

नासबूरी की इंतिहा क्या  है
ज़िन्दगी तू ज़रा बता मुझको

होश फिर उम्र भर  नहीं आए
जल्वाअपना  कभी दिखा मुझको

मैं निगाहें  मिला सकूँ उनसे
इतनी तौफ़ीक़ दे ख़ुदा मुझको

उनका होना ही  है बहुत ’आनन’
देता रहता है हौसला मुझको

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ
नासबूरी =अधीरता ,ना सब्री
तौफ़ीक़ =शक्ति,सामर्थ्य
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सोमवार, 11 नवंबर 2019

ग़ज़ल 132 : भले ज़िन्दगी से ---

122---122---122---122
फ़ऊलुन---फ़ऊलुन--फ़ऊलुन--फ़ऊलुन
बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम

---------

एक ग़ज़ल : भले ज़िन्दगी से हज़ारों ---

भले ज़िन्दगी से  हज़ारों शिकायत
 जो कुछ भी  मिला है,उसी की इनायत

ये हस्ती न होती ,तो होते  कहाँ हम
फ़राइज़ , शराइत ,ये रस्म-ओ-रिवायत

कहाँ तक मैं समझूँ ,कहाँ तक मैं मानू
वो वाइज़ की बातें  ये हर्फ़-ए-हिदायत

न पंडित ,न मुल्ला ,न राजा ,न रानी
रह-ए-मर्ग में ना किसी को रिआयत

मेरी ज़िन्दगी ,मत मुझे छोड़ तनहा
किसे मैं सुनाऊँगा अपनी हिकायत

निगाहों में उनके लिखा जो पढ़ा तो
झुका सर समझ कर मुहब्बत की आयत

बुरा मानने की नहीं बात ,’आनन’
है जिससे मुहब्बत ,उसी से शिकायत

-आनन्द.पाठक--

शब्दार्थ
फ़राइज़ = फ़र्ज़ का ब0व0
शराइत = शर्तें [ शर्त का ब0व0]
रह-ए-मर्ग = मृत्यु पथ पर [ मौत की राह में ]
अपनी हिकायत  = अपनी कथा कहानी
आयत = कलमा-ए-क़ुरान [ की तरह पाक] -
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शनिवार, 9 नवंबर 2019

एक ग़ज़ल 131 : झूठ इतना इस तरह --

एक ग़ज़ल : झूठ इतना इस तरह ---

2122---2122---212

झूठ इतना इस तरह  बोला  गया
सच के सर इलजाम सब थोपा गया

झूठ वाले जश्न में डूबे  रहे -
और सच के नाम पर रोया गया

वह तुम्हारी साज़िशें थी या वफ़ा
राज़ यह अबतक नहीं खोला गया

आइना क्यों देख कर घबरा गए
आप ही का अक्स था जो छा गया

कैसे कह दूँ तुम नहीं शामिल रहे
जब फ़ज़ा में ज़ह्र था घोला गया

बेबसी नाकामियों के नाम पर
ठीकरा  सर और के फ़ोड़ा गया

हो गई ज़रख़ेज़ ’आनन’ तब ज़मीं
प्यार का इक पौध जब रोपा गया

-आनन्द.पाठक-

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