शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

अनुभूतियाँ 184/71

 अनुभूतियाँ 184/71

733
माली अगर सँवारे गुलशन
प्रेम भाव से मनोयोग से ।
ख़ुशबू फ़ैले दूर दूर तक
डाली डाली के सुयोग से।

734
बदले कितने रूप शब्द ने
तत्सम से लेकर तदभव तक
कितने क्रम से गुज़रा करतीं
जड़ी बूटियाँ ज्यों आसव तक ॥

735
सबका अपना अपना जीवन
सुख दुख सबके अपने अपने
सबकी अपनी अपनी मंजिल
कुछ हासिल कुछ टूटे सपने

736
जो वह कह दे सत्य वही बस
भरा हुआ यह उसके मन में
आँखे बंद किया रहता है
नहीं देखता वातायन में

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025

ग़ज़ल 448 [22-G] : तुम्हारे झूठ का हम ऎतबार क्या करते--

 ग़ज़ल 448 [22-जी] : तुम्हारे झूठ का हम ऎतबार क्या करते--

1212---1122---1212---22

तुम्हारे झूठ का हम ऐतबार क्या करते
कहोगे सच न जो तुम, इन्तज़ार क्या करते।

 हमारी बात न सुनना, न दर्द ही सुनना ,
गुहार आप से हम बार बार क्या करते।

ज़ुबान दे के भी तुमको मुकर ही जाना है
तुम्ही बता दो कि तुमसे क़रार क्या करते।

वो साज़िशों में ही दिन रात मुब्तिला रहता,
बना के अपना उसे राज़दार क्या करते ।

हज़ार बार बताए उन्हें न वो समझे ,
न उनको ख़ुद पे रहा इख्तियार क्या करते।

लगा के बैठ गए दाग़ खुद ही दामन पर
तमाम उम्र रहे बेक़रार , क्या करते ।

मक़ाम सब का यहाँ एक ही है जब 'आनन'
दिल.ए.ग़रीब को हम सोगवार क्या करते ।

-आनन्द पाठक ’आनन’

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रविवार, 19 अक्टूबर 2025

ग़ज़ल 447 [21-जी] : बाग़ मेरा न यूँ लुटा होता

 ग़ज़ल 447[21-जी] : बाग़ मेरा यूँ न लुटा होता

2122---1212---22

बाग़ मेरा न यूँ लुटा होता
बाग़बाँ जो जगा रहा होता ।

हाल ग़ैरों से ही सुना तुमने ,
हाल-ए-दिल मुझसे कुछ सुना होता ।

सर उठा कर जो हम नहीं चलते
सर हमारा कटा नहीं होता ।

राह तेरी अलग रही होती
अपनी शर्तों पे जो जिया होता।

द्वार दिल का जो तुम खुला रखते
लौट कर वह नहीं गया होता ।

वक़्त भरता नहीं अगर मेरा

जख़्म-ए-दिल अब तलक हरा होता।


हुस्न और इश्क़ ग़र न हो ’आनन’

ज़िंदगी का जवाज़ क्या होता ?


-आनन्द.पाठक ’आनन’-

जवाज़ = औचित्य


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रविवार, 12 अक्टूबर 2025

ग़ज़ल 446 [ 20- G] : लोग अपने आप पर इतरा रहे हैं

 ग़ज़ल 446[ 20-जी] : लोग अपने आप पर


2122---2122---2122

लोग अपने आप पर इतरा रहे हैं
एक झूठी शान पर इठला रहे  हैं ।

उम्र भर दरबार में जो सर झुकाए,
मान क्या, सम्मान क्या, समझा रहे हैं ।

जो जुगाड़ी तन्त्र से पहुँचें यहाँ तक
ठोक सीना वो हुनर बतला रहे हैं ।

ख़ुदसिताई का लगा जब रोग उनको
इक ’सनद’ सौ-सौ जगह चिपका रहे हैं।

मजहबी दीवार जिनको तोड़ना था 
नफ़रतें हर शहर में फैला रहे हैं ।

यह जहालत है, हिमाकत है कि जुरअत
दम फ़रेबी का वो भरते जा रहे हैं ।

हैफ़ ! उनको क्या कहें अब और ’आनन’
रोशनी को तीरगी बतला रहे हैं ।

-आनन्द पाठक ’आनन’

हैफ़ = अफ़सोस

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शनिवार, 4 अक्टूबर 2025

ग़ज़ल 445 [19-G] : जिन्हे कुछ न करना

ग़ज़ल 445 [19-जी]: जिन्हे कुछ न करना 

122---122---122---122

जिन्हें कुछ न करना, न दुख ही जताना
ग़म.ए.दिल फिर अपना उन्हें क्या सुनाना

अँधेरों की ही वह हिमायत है करता
कभी रोशनी के  म'आनी न जाना

जिसे सरफिरा कह के ख़ारिज़ किया है
बदल देगा इक दिन वही यह जमाना

वो कहता है कुछ और कुछ सोचता है
पलट जाने का वह खिलाड़ी पुराना ।

वो परचम लिए झूठ का चल रहा है
वही चंद बेजान नारे लगाना ।

सियासत में उसको सभी लगता जायज़
लहू हो बहाना कि बस्ती जलाना ।

तकारीर उनकी तो कुछ और 'आनन'
हक़ीक़त में उनको अमल में न लाना ।

-आनन-

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शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

ग़जल 444 [18-G] : रोज़ सपने नया दिखाता है

ग़ज़ल 444 [ 18-जी: " रोज़ सपने नया दिखाता है


2122  --1212--22

रोज़ सपनें नए दिखाता है
जाने क्या क्या हमें बताता है

यह हुनर है कमाल है उसका
वो हवा में महल बनाता है

आग-सा वह बयान दे दे कर
बारहा वह हमें डराता है ।

जब तलक 'वोट' की ज़रूरत है
दर पे आकर वह सर झुकाता है

छोड़िए बात क्या करें उसकी
खु़द की गैरत जो बेच खाता है

साज़िशों मे रहा मुलव्वस वह
खुद को मासूम-सा दिखाता है

खुद गरज हो गया है वो, 'आनन'
खुद से आगे न देख पाता है ।

-आनन-
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