शुक्रवार, 29 दिसंबर 2023

अनुभूतियाँ 131/18 : राम लला जी के प्राण प्रतिष्ठा पर

 अनुभूतियाँ 131/18 :


:1:

राम लला जी के मंदिर का

संघर्षों की एक कहानी

नई फ़सल अब क्या समझेगी

प्राण दिए कितने बलिदानी 


;2:

पावन क्षण में पावन मन से

पूजन अर्चन शत शत वंदन

स्वागत में हम  खड़े राम के

लेकर अक्षत रोली चंदन 

:3:

जन मन में अब राम बसे हैं

हर्षित हैं सब अवध निवासी

सब पर कृपा राम की होती

जन मानस,साधु सन्यासी 

:4:

रामराज की बातें तब तक

जब तक राम हृदय में बसते

वरना तो कुरसी की खातिर

सबके अपने अपने  रस्ते


:5:
मंदिर का हर पत्थर पावन
प्रांगण का हर रज कण चंदन
हाथ जोड़ कर शीश झुका कर
राम लला का है अभिनंदन


:6:

हो जाए जब सोच तुम्हारी

राग द्वेष मद मोह से मैली

राम कथा में सब पाओगे

जीवन के जीने की शैली ।


:7: 

एक बार प्रभु ऐसा कर दो

अन्तर्मन में ज्योति जगा दो

काम क्रोध मद मोह  तमिस्रा

मन की माया दूर भगा दो ।

-आनन्द.पाठक-



चन्द माहिए : क़िस्त 99/09 : 22 जनवरी 2024 प्राण प्रतिष्ठा पर

 चन्द माहिए 98/09] : प्राण प्रतिष्ठा पर


:1:

जन जन के दुलारे हैं

आज अवध में फिर 

प्रभु राम पधारे  हैं


:2:

झूमेंगे नाचेंगे

प्राण प्रतिष्ठा में

श्री राम विराजेंगे


:3:

सपना साकार हुआ

राम लला जी का

मंदिर तैयार हुआ


:4:

प्रभु राम की सब माया

उनकी किरपा से

अब यह शुभ दिन आया


:5:

गिन गिन कर काटे दिन

स्वर्ग से उतरेंगे

भगवान सभी इस दिन


:6:

मंदिर की इच्छा में

पाँच सदी तक थे

दो नैन प्रतीक्षा में ।


:7:

प्रभु प्रेम में हो विह्वल

शर्त मगर यह भी

मन भाव भी हो निश्छल


-आनन्द.पाठक-

गुरुवार, 28 दिसंबर 2023

ग़ज़ल 351[26] : न मिलते आप से जो हम ---

 ग़ज़ल 351[26]


1222---1222----1222---1222


न मिलते आप से जो हम तो दिल बहका नही होता

अगर हम होश में आते, तो ये अच्छा नहीं होता


तुम्हारे हुस्न के दीदार की होती तलब किसको,

तजल्ली ख़ास पर इक राज़ का परदा नहीं होता ।


असर मे आ ही जाते हम, जो वाइज के दलाइल थे

अगर इस दरमियाँ इक मैकदा आया नहीं होता ।


कभी जब फ़ैसला करना, समझ कर, सोच कर करना

कि जज़्बे से किया हो फ़ैसला , अच्छा नहीं होता ।


अगर दिल साफ़ होता, सोच होता आरिफ़ाना तो 

तुम्हे फिर ढूँढने में मन मेरा भटका नहीं होता ।


नवाज़िश आप की हो तो समन्दर क्या. कि तूफ़ाँ क्या

करम हो आप का तो ख़ौफ़ का साया नहीं होता ।


दिखावे  में ही तूने काट दी यह ज़िंदगी ’आनन’

तू अपने आप की जानिब से क्यों सच्चा नहीं होता ।



-आनन्द.पाठक-



 


मंगलवार, 26 दिसंबर 2023

ग़ज़ल 350[25} चुनावों का ये मौसम

ग़ज़ल 350

1222---1222---1222---1222


चुनावों काये मौसम,है  तुझे सपने दिखाएगा

घिसे नारे पिटे वादे, वही फिर से सुनाएगा ।


थमा कर झुनझुना हमको, हमें बहला रहा कब से

सभी घर में है ख़ुशहाली, वो टी0वी0 पर दिखाएगा


सजा कर आँकड़े संकल्प पत्रों में हमे देगा

वो अपनी पीठ अपने आप ख़ुद ही थपथाएगा ।


किनारे पर खड़े होकर नसीहत करना आसाँ है

उतर कर आ समन्दर में , नसीहत भूल जाएगा


इधर टूटे हुए चप्पू , उधर दर्या है तूफानी

हुई अब  नाव भी जर्जर, तू कैसे पार पाएगा ?


सभी अपने घरों में बन्द हो अपना ही सोचेंगे

लगेगी आग बस्ती में ,बुझाने कौन आएगा ।


किसी की अन्धभक्ति में चलेगा बन्द कर आँखें

गिरेगा तू अगर ;आनन; ग़लत किसको बताएगा 


-आनन्द.पाठक-



रविवार, 24 दिसंबर 2023

ग़ज़ल 349[24] : चिराग़ों की हवाओं से---

ग़ज़ल 349 [24]


1222---1222---122


चिराग़ों की हवाओं से ठनी है

मगर कब रोशनी इनसे डरी है


अगर दिखती नहीं तुमको बहारें

तुम्हारी ही नज़र में कुछ कमी है


किसी के प्यार में ख़ुद को मिटा दे

भले ही चार दिन की ज़िंदगी है


जगाने को यहाँ रिश्ते हज़ारों

निभाने को मगर किसको पड़ी है


जगाएगा तो जग जाएगा इक दिन

तेरे अन्दर जो सोया आदमी है


नहीं कुछ और मुझको देखना है

मेरे दिल में तेरी सूरत बसी है


सभी में बस उसी का अक्स देखा

अजब ’आनन’ तेरी दीवानगी है ।


-आनन्द.पाठक-

ग़ज़ल 348 { 23] : समन्दर की व्यथा क्या है

 ग़ज़ल 348[23]


1222  1222


समन्दर की व्यथा क्या है

ये नदिया को पता क्या है


उड़ानों में परिंदो से

न पूछो मर्तबा क्या है


जो पगड़ी बेंच दी तुमने

तो बाक़ी अब बचा क्या है


किसी के वास्ते हमदम !

समय रुकता भला क्या है ?


गले सबको लगा .प्यारे!

कि दुनिया में रखा क्या है ।


मुहब्बत में फ़ना होना

तो इसमें कुछ नया क्या है ।


हिमायत सच की करते हो

अरे! तुमको हुआ क्या है


कभी मिलना जो ’आनन’ से

समझ लोगे वफ़ा क्या है ।



-आनन्द.पाठक-


शनिवार, 23 दिसंबर 2023

ग़ज़ल 347 [22]: हमारी बात क्या करना---

 


ग़ज़ल 347 [22]


1222---1222---1222---1222


हमारी बात क्या करना, हमारी छोड़िए साहिब !

मिला जो प्यार से हमसे. उसी के हो लिए साहिब !


पड़ी पाँवों में ज़जीरें, रवायत की जहालत की,

हमें बढने से जो रोकें उन्हें तो तोड़िए साहिब


हमेशा आप बातिल की तरफ़दारी में क्यों रहते

कभी तो सच की जानिब से ज़रा कुछ बोलिए साहिब


मुक़ाबिल आइना होते, पसीने क्यों छलक आते

हक़ीक़त तो हक़ीक़त है , न मुँह यूँ मोड़िए साहिब


शजर ज़िंदा रहेगा तो परिंदे चहचहाएँगे

हवाओं में ,फ़ज़ाओं में , न नफ़रत घोलिए साहिब


बसे हैं साँप बन कर जो, छुपे हैं आस्तीनों में

मुलव्विस हैं जो साजिश में उन्हें मत छोड़िए साहिब


हमें मालूम है क्या आप की मजबूरियाँ ’आनन’

सितम पर आप क्यॊं चुप हैं ,ज़ुबाँ तो खोलिए साहिब !


-आनन्द.पाठक-


मंगलवार, 19 दिसंबर 2023

अनुभूतियाँ 130/17

 130/17


:1:

इतना भी आसान नहीं है

इल्म-ए-सदाक़त, इल्म-ए-दियानत

वरना तो ता उम्र ज़िंदगी

भेजा करती रह्ती लानत


:2:

दिल से जब मिट जाए जिस दिन

इस्याँ और गुनह तारीक़ी

जाग उठेंगे तब उस दिन से

इश्क़ रुहानी , इश्क़-ए- हक़ीक़ी


:3:

सतरंगी अनुभूति मेरी

श्वेत-श्याम सा अनुभव भी है

भोगी हुई व्यथाएँ शामिल

कुछ खुशियों के कलरव भी है


:4:

एक बार प्रभु ! ऐसा कर दो

अन्तर्मन में ज्योति जगा दो

काम क्रोध मद मोह तमिस्रा

मन की माया दूर भगा दो ।


-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 129/16

 129/16


:1:

अगम व्यथाओं का होता है

एक समन्दर सब के अन्दर

कश्ती पार लगेगी कैसे

जुझा करते हैं जीवन भर


:2:

ग़लत बयानी करते रहना

ख़ुद ही उलटे शोर मचाना

नया चलन हो गया आजकल

सच की बातों को झुठलाना


:3:

पंडित जी ने बतलाया था

शर्त तुम्हारी पता तुम्हारा

पाप-पुण्य की ही गणना में

बीत गया यह जीवन सारा


:4:

सबकी अपनी व्यथा-कथा है

अपने अपने विरह मिलन की

सब के आँसू एक रंग के

मौन कथाएँ पीर नयन की


-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 128/15

 128/15


:1:

वक़्त सुनाएगा जब इक दिन

मेरी अधूरी प्रेम कहानी

दुनिया समझेगी तब उस दिन

क्या होता है इश्क़ रुहानी


:2:

तनहाई में तेरी यादों 

का एक सहारा ही होता

पास बचा अब क्या मेरे जो

दिल क्या खोता या दिल रोता


:3:

जब जब उमड़ी होगी बदली

विरहन की सूनी आंखों  में

तब तब भींगी होगी सेजरिया

साजन बिन सूनी रातों में ।


:4:

बेमौसम बरसात हुई है

मीत हमारा रोया होगा

टूटा होगा कोई भरोसा

कोई सपना खोया होगा

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 127/14

 अनुभूतियां 127/14


:1:

स्मॄतियों के पंख लगा कर

उड़ते बादल नील गगन में

अनुभूति की बूँदे छन छन

बरसें मन के उजड़े वन में


:2:

बात बात पर ज़िद करती हो

व्यर्थ तुम्हें अब समझाना  है

लोग नहीं वैसे कि जैसे-

तुमने समझा या जाना है


:3:

रंज़ गिला शिकवा सब मुझसे

और तुम्हारी तंज बेरुखी

मेरी आँखों में सपनो-सा

बसी रही तुम लेकिन फिर भी


:4:

कोई तो  है जो छुप छुप कर

संकेतों से मुझे बुलाता

छुवन हवा की जैसे लगती

लेकिन कोई नज़र न आता ।

-आनन्द.पाठक


शुक्रवार, 8 दिसंबर 2023

ग़ज़ल 346[21]: काश ! ख़ुद से गर मिला होता--

 



ग़ज़ल 346 [21]


2122--1212--22


काश! खुद से अगर मिला होता

भीड़ में यूँ न लापता होता  ।


रंग चेहरे का क्यों उडा करते

जब हक़ीक़त से सामना होता


तुम न होते तो ज़िंदगी फिर क्या

कौन साँसों में फिर बसा होता ?


वक़्त अपने हिसाब से चलता 

चाहने से हमारे क्या होता ।


बात सुननी ही जब नहीं मेरी

आप से और क्या गिला होता ।


पा ही जाता मैं मंज़िल-ए-मक़्सूद

एक ही राह जो चला  होता ।


वह भी आता तुझे नज़र ’आनन’

"ढाइ-आखर"- जो तू पढ़ा होता ।


-आनन्द.पाठक-

रविवार, 3 दिसंबर 2023

अनुभूतियाँ 126/13

 अनुभूतियाँ 126/13

      :1:

क़समें खाना, वादे करना
वचन निभाना आता है क्या ?
रात घनेरी जब जब होगी
दीप जलाना आता है क्या ?

   :2:
रंज किसी का, गुस्सा मुझ पर
ये तो कोई बात न होती ।
अगर नहीं तुम अपने होते
किसके काँधे सर रख रोती ।

  :3:
बीत गई जो बातें छोड़ॊ
गुस्सा थूको, अब तो हँस दो
मैं  हारी अब गले लगा लो
भुजपाशों का बंधन कस दो 

:4:
हाथ बढ़ा फिर हाथ खीचना
नई तुम्हारी आदत देखी
फिर भी मैने किया भरोसा
मेरी नहीं शराफत देखी

-आनन्द.पाठक-



ग़ज़ल 345[20] : देखने में हों लगते भले--

 



ग़ज़ल 345[20]


212---212---212


देखने में लगते हों लगते भले

सोज़-ए-दिल से सभी हैं जले


एक धुन हो , लगन हो जिसे

क्या उसे पाँव के  आबले


रोशनी उसको भाती नहीं

जो अंधेरों में अब तक पले


देख कर आइना सामने

आप मुड़ कर किधर को चले


रंज किस बात का है तुझे

यार आ अब तो लग जा गले 


आदमी जो नहीं कर सका

वक़्त ने कर दिए फ़ैसले


जिस मकाँ में रहा उम्र भर

छोड़ कर आकबत को चले


तुमने देखा ही ’आनन’ कहाँ

इन चिराग़ों के पुरहौसले ।


-आनन्द.पाठक-


आख़िरत = परलोक