शनिवार, 20 जुलाई 2024

ग़ज़ल 403 [ 59-फ़] : इश्क़ की एक ही कहानी है

 ग़ज़ल 403 [ 59-फ़]

2122---1212---22


इश्क़ की एक ही कहानी है

रंज़-ओ-ग़म की ये तर्जुमानी है ।


उम्र ब्भर का ये इक तकाज़ा है,

चन्द लम्हों की शादमानी  है ।


प्यार करना है आ गले लग जा

चार दिन की ये जिंदगानी है ।


रंग-ए-दुनिया अगर बदलना हो

लौ मुहब्बत की इक जगानी है ।


ज़िंदगी ख़ुशनुमा नज़र आती

इश्क़ ही की ये मेहरबानी है ।


जब वो क़तरा में इक समन्दर है

बात यह रोज़ क्या बतानी है ।


जानना क्या कि इश्क़ क्या ’आनन’

जानता हूँ कि राह-ए-फ़ानी है ।


-आनन्द पाठक--


शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

अनुभूतियाँ 140/27

अनुभूतियाँ 140/27

 :1: 
ना कोई अपना है होता
ना ही कोई यहाँ पराया
यह तो है व्यवहार आप का
किसको कितना कैसा भाया ।

:2:
फिर सावन के दिन आए हैं
उमड़ घुमड़ कर बदरा गरजै
तड़क भड़क कर बिजुरी चमकी
गोरी का  जियरा है धड़कै ।

कविता 21 : आया ऊँट पहाड़ के नीचे--

 कविता 21 : आया ऊँट पहाड़ के नीचे--


आया ऊँट पहाड़ के नीचे

देख रहा है अँखियाँ मीचे

अयँ ?

मुझसे भी क्या कोई बड़ा है?

यहाँ सामने कौन खड़ा है?

ऐसा भी  होता क्या ? मुझसे भी  ऊँचा क्या ! 

जिसने देखा हो  झाड़ बस !

वह क्या समझे है पहाड़ क्या !


 अपने कद का रोब दिखाता

 अपने पद का ही बस गाता 

क्या करता है एक आदमी

सिर्फ़ हवा में

मुठ्ठी खींचे, दाँते भींचे

आया ऊँट पहाड़ के नीचे

आया उँट पहाड़ के नीचे ।


-आनन्द.पाठक


कविता 20 : जाने क्यों ऐसा लगता है--

 कविता 20 : जाने क्यों ऐसा लगता है---


जाने क्यों ऐसा लगता है ?

उसने मुझे पुकारा होगा

जीवन की तरुणाई में, अँगड़ाई ले

दरपन कभी निहारा होगा

शरमा कर फ़िर, उसने मुझे पुकारा होगा ।

जाने क्यों ऐसा लगता है ?

--   -- 


कभी कभी वह तनहाई में 

भरी नींद की गहराई में 

देखा होगा कोई सपना

छूटा एक सहारा होगा, उसने मुझे पुकारा होगा

जाने क्यों ऐसा लगता है ।

---

सारी दुनिया सोती रहती

लेकिन वह 

रात रात भर जागा करता , तारे गिनता

टूटा एक सितारा होगा

फिर घबरा कर

उसने मुझे पुकारा होगा ।

जाने क्यों ऐसा लगता है ॥


-आनन्द.पाठक-


कविता 19 : जाने यह कैसा बंधन है--

 कविता 19 : जाने यह कैसा बंधन है--


जाने यह कैसा बंधन है

रिश्ता पावन ऐसे जैसे

स्तुति वाचन-ॠचा मन्त्र का

गीत गीत से -छ्न्द छन्द का

फ़ूल फ़ूल से - गन्ध गन्ध का

जैसे पानी का चंदन से

भक्ति भावना का वंदन से

शब्द भाव का--नदी नाव का

बाहों का आलिंगन से

एक अदृश्य -सा अनुबंधन है ।

जाने यह कैसा बंधन है ।


-आनन्द.पाठक--


गुरुवार, 18 जुलाई 2024

ग़ज़ल 402[ 59-अ] : दिल ही से सब बयाँ हो--

 ग़ज़ल 402 [ 59-अ ]

 59-अ

221---2122  // 221--2122 


हर दर्द नागहाँ हो, यह भी तो सच नहीं हैअ

दिल ही से सब अयाँ  हो, यह भी तो सच नहीं है ।


इलजाम आप पर है, कहते हैं यह धुआँ  है ,

बिन आग का धुआँ हो, यह भी तो सच नहीं है ।


माखन न तुमने खाया, बरबस लगा गए सब

आदाब-ए-पासबाँ हो , यह भी तो सच नहीं है ।


आते हो हाशिए पर , कहते हो साजिशे  हैं 

कुछ भी न दरमियाँ हो, यह भी तो सच नहीं है ।


’दिल्ली’ में बारहा तुम, मजमा लगाते फिरते

तुम मिस्ल-ए-कारवाँ हो, यह भी तो सच नहीं है ।


काजल की कोठरी से, बेदाग़ कौन निकला ,

मजलूम बेज़ुबाँ हो ,यह भी तो सच नहीं है ।


इतनी बड़ी तो हस्ती, ’आनन’ नहीं तुम्हारी,

दामान-ए-आसमाँ हो, यह भी तो सच नहीं है ।


-आनन्द.पाठक- 


कविता 18: कह न सका मैं --

 कविता 18 : कह न सका मैं---


कह न सका मैं 

जो कहना था ।

मौन भाव से सब सहना था।

तुम ही कह दो।


शब्द अधर तक आते आते

ठहर गए थे।

अक्षर अक्षर बिखर गए थे।

आँखों में आँसू उभरे थे ।

 पढ़ न सका मैं |

तुम जो ना लिख पाई 

तुम ही पढ़ दो।

कह न सकी जो तुम भी कह दो

कह न सका मैं , तुम ही कह दो ।


-आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 401[43-अ] : जो गीत दर्द के गाते नहीं तो---

 ग़ज़ल 401 [43-अ ]

1212---1122---1212---22


जो गीत दर्द के गाते नहीं , तो क्या करते 

तमाम उम्र सुनाते नहीं , तो क्या करते ।


कड़े थे शर्त हमारी तो ज़िंदगी के मगर 

उधार हम जो चुकाते नहीं, तो क्या करते !


हज़ार क़ैद थे आइद हमारे ख़्वाबों पर

हर एक ख़्वाब मिटाते नहीं, तो क्या करते।


उमीद थी कि वो आएँगे खुद बख़ुद चल कर

पयाम दे के बुलाते नहीं, तो क्या करते ।


तमाम लोग थे ईमाँ खरीदने निकले-

इमान अपना बचाते नहीं, तो क्या करते ।


शरीफ़ लोग भी बातिल के साथ साथ खड़े

अलम जो सच का उठाते नहीं, तो क्या करते ।


हर एक मोड़ पे नफ़रत की तीरगी ’आनन’

चिराग़-ए-इश्क़ जलाते नहीं, तो क्या करते ।


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

आइद थे = लागू थे

पयाम दे के = संदेश भेज कर

बातिल के साथ = झूठ के साथ

तीरगी   = अँधेरा

अलम = झंडा





कविता 17 : वह कौन थी ?

 कविता 17


कल जो तुमने यह पूछा था

वह कौन थी ? 

भाव मुखर थे, ग़ज़ल मौन थी ।


मेरी ग़ज़लों के शे’रों के

 मिसरों में 

चाहे वह अर्कान रहा हो

लफ्जों का औजान रहा हो

रुक्नो का गिरदान रहा हो

मक्ता है या मतला है

सबमे उसका रूप ढला है।

मेरे भावों की छावों में 

जो लड़की  गुमसुम गुमसुम थी

वह तुम थी , हाँ वह तुम थी।


’अइसा काहे तुमने पूछा ?

ई का तुम्हरा मन में सूझा ?’


-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 17 जुलाई 2024

ग़ज़ल 400 [ 42-अ] : खोटे सिक्के हाथों में ले---

 ग़ज़ल 400 [42-अ] 

21---121---121--122  // 21---121--121--122


खोटे सिक्के हाथों में ले, मोल लगाने लोग खड़े है 

घड़ियाली आँसू से पूरित, दर्द जताने लोग खड़े हैं ।


आज धुँआ फिर से उठ्ठेगा, झुग्गी झोपड़ पट्टी से ही

कल जैसा फिर दुहराने को, आग लगाने लोग खड़े हैं ।


बेंच दिए ’रामायण-गीता’ आदर्शों की बात भुला कर

वाचन करने को तत्पर हैं, अर्थ बताने लोग खड़े हैं ।


दीन-धरम है बाक़ी अब भी, कुछ लोगों के दिल के अन्दर

आग लगाने वालों सुन लो, आग बुझाने लोग खड़े हैं ।


दुनिया भर की बात करेंगे, चाँद सितारे मुठ्ठी में है

करना धरना एक नही है, गाल बजाने लोग खड़े हैं ।


शर्म-ओ-हया की बात कहाँ अब, उरियानी का फैशन आया

वाजिब है कुछ की नजरों मे, आज बताने लोग खड़े हैं


’आनन’ तुम भी कैसे कैसे, लोगों की बातों में आए

झूठे वादों से जन्नत की, सैर कराने लोग खड़े हैं ।


-आनन्द पाठक-



एक समीक्षा : मौसम बदलेगा [ ग़ज़ल संग्रह] --की समीक्षा - नीरज गोस्वामी जी के द्वारा

 एक समीक्षा : मौसम बदलेगा [ ग़ज़ल संग्रह] --की समीक्षा - नीरज गोस्वामी जी के द्वारा


#नीरज #गोस्वामी -

हाँ यही नाम है उनका जिन्हे मैं --नीरज भाई - कह कर बुलाता हूँ । साहित्य और ब्लाग की दुनिया में एक जाना पहचाना और पुराना नाम। किसी परिचय का मोहताज़ नही । बहुमुखी प्रतिभा के धनी --’एक्टिंग- रंगमच से ले कर साहित्यिक मंचों तक। कलम के धनी।
अन्य किताबों के साथ साथ इनकी किताब #101 किताबें ग़ज़लों की# और -#डाली --#मोगरे #की --काफ़ी चर्चा में रही। #नीरज भाई के नाम के साथ एक समस्या यह है कि इनकी कुछ ग़ज़लो को लोग गोपाल दास ’नीरज" जी के नाम से मन्सूब कर देतें है ख़ास तौर पर होली के समय। फ़िर हम दोनों खूब हँसते है। सफ़ाई यह नहीं --मैं देता रहता हूँ।
आज उन्होने ही मेरी एक किताब ग़जल संग्रह ---मौसम बदलेगा-- पर अपनी एक समीक्षात्मक क़लम चलाई है। आप लोग भी पढ़े और अपनी राय से अवगत कराएँ।
लिन्क नीचे लगा रहा हूँ।


सादर
-आनन्द.पाठक-

मंगलवार, 16 जुलाई 2024

ग़ज़ल 399 [ 41-अ] : सूरज को गिरवी रख रख वो--

 ग़ज़ल 399 [ 41 -अ] 

21---121---121--122 // 21---121--121--12


सूरज को गिरवी रख रख वो , किरणों को नीलाम किए,

उनका ही अन्तस था काला, दरपन को बदनाम किए


शिकवा, आम शिकायत तुमसे, चाहे जितना कर लें हम

नाम तुम्हारा ही ले ले कर, सुबह किए हम, शाम किए ।


इस्याँ अपना जग ज़ाहिर है, और इबादत उल्फत भी

जो भी हासिल इस दुनिया से, सारे उनके नाम किए ।


तनहाई में आँखें नम थी, रंज़ो-ओ-ग़म थे साथ मेरे

एक तेरी तस्वीर मेरा दिल, पूरी रात कलाम किए ।


कितने दौर- ए- जाम चले हैं ,फिर भी प्यास अधूरी है

जब जब प्यास बढ़ी है यारब!, याद तुम्हें हर गाम किए


अक्स तुम्हारा हर शै में है, कब हमने इनकार किया

वैसे हम हर नक्श-ए-पा पर, सजदा और सलाम किए


हस्ती अपनी क्या है ’आनन’, एक तमाशा मेला है ,

दिन भर दौड़े, भागे, घूमे, रात हुई आराम किए ।


ग़ज़ल 398 [---] : आकर इस फ़ानी दुनिया में--

 ग़ज़ल 398 [---]

21---121--121---122 // 21---121---121--12


आकर इस फ़ानी दुनिया में, चार दिनों की शान बने ,

चाल तुम्हारी टेढ़ी टेढ़ी, क्यों तुम नाफरमान बने ?


उनको क्या लेना-देना था, आदर्शों के मेले से-

गैरत अपनी बेंच दिए तो, ख़ुद अपनी पहचान बने ।


’राम-कथा’ कहते फ़िरते थे, गाँव-गली में वाचक बन 

’दिल्ली’ जाकर जाने क्यों वह,’रावण’ के उन्वान बने ।


कल तक जिन हाथों में शोभित, दंड, कमंडल, माला थी

आज उन्हीं हाथों में जाकर, खंजर, तीर-कमान बने ।


कल तक खुद को खोज रहे थे,  संबंधों की दुनिया में

गिरगिट-सा कुछ रंग बदल कर, आज वही अनजान बने ।


बात जहाँ पर तय होनी थी,चेहरे पर कितने चेहरे ,

जो चेहरे ’उपमेय’ नहीं थे, वो चेहरे ’उपमान’ बने ।


दुनिया मे क्या करने आए, पर क्या तुमने कर डाला,

’ढाई-आखर’ पढ़ कर” आनन’, क्यों ना तुम इन्सान बने?


-आनन्द पाठक-


रविवार, 14 जुलाई 2024

ग़ज़ल 397 [ 40-अ] : लोग सिक्कों पर फ़िसलने लग गए

 ग़ज़ल 397 [ 40-अ]

2122---2122---212


लोग सिक्कों पर फ़िसलने लग गए

भूमिका अपनी बदलने लग गए ।


आइना जब भी दिखाते हैं उन्हें

ले के पत्थर वो निकलने लग गए ।


मुठ्ठियाँ जब गर्म होने लग गईं

मोम-से थे जो , पिघलने लग गए।


आज आँगन में नहीं ’तुलसी’ कहीं

’कैकटस’ गमलों में पलने लग गए।


सत्य से जो बेखबर अबतक रहे

झूठ की वह राह चलने लग गए।


फ़न कुचलने का समय अब आ गया

साँप सड़को पर निकलने लग गए ।


अब तो ’आनन’ हाल ऐसा हो गया

लोग इक दूजे को छलने लग गए ।


-आनन्द.पाठक-

ग़ज़ल 396 [39-A] : जब कभी हम से वह मिला करता--

 ग़ज़ल 396/39-A]


2122---1212-  22

जब कभी हम से वह मिला करता

दिल न जाने है क्यों डरा  करता ।


उसकी तक़रीर जब कहीं होती

हादिसा क्यों वहीं हुआ करता ।


जख्म अपना उसे दिखाता हूँ

दर्द सुन कर वो अनसुना करता ।


फूल बन कर उसे महकना  था

बन के काँटा है वह उगा करता ।


सच से जब उसका सामना होता

रंग चेहरे का क्यों उड़ा करता ।


रोशनी क्या है, क्या वो समझेगा,

जो अँधेरों में है पला करता ?


संग-ए-दिल लाख हो भले ’आनन’

दिल में दर्या है इक बहा करता ।


-आनन्द.पाठक -


सोमवार, 8 जुलाई 2024

ग़ज़ल 395[ 58फ़] : उसे पता ही नहीं---


ग़ज़ल 395 [58फ़] 

1212---1122---1212---112/22


उसे पता ही नहीं क्या वो बोल जाता है

न सर, न पैर हो, बातें वही सुनाता  है ।


वो आइना पे ही इलजाम मढ़ के चल देता

अगर जो आइना कोई कहीं दिखाता  है ।


किसी के पीठ पे हो कर सवार पार हुआ

उसी को बाद में फिर शौक़ से डुबाता है ।


वो चन्द रोज़ हवा में उड़ा करेगा अभी

नई नई है मिली जीत यह दिखाता  है ।


उसे बहार में भी आ रही नज़र है खिज़ाँ

वो जानबूझ के भी सच नही बताता  है ।


ज़मीन पर है नहीं पाँव आजकल उसके

वो आसमाँ से हक़ीक़त न देख पाता है ।


हवा लगी है उसे बदगुमान की ’आनन’

किसी को अपने मुक़ाबिल नही लगाता है ।


-आनन्द.पाठक-

दोहा 18 : सामान्य

 ्दोहा 18 [ सामान्य]


नकली बाबा बोलता, खुद को ’हरि-अवतार’ ।
जनता भी पागल हुई, जाने को दरबार ॥

शुहरत उसको क्या मिली, बदल गया व्यवहार ।
हेय समझने लग गया , जो थे उसके यार ॥

जीवन इक लम्बा सफर, मिले किसी का साथ ।
कट जाए आराम से, जुड़े हाथ से हाथ ।।

शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

ग़ज़ल 394 [57 फ़] : मचा के शोर मुझे चुप करा नहीं सकते


ग़ज़ल 394 [57फ़]

1212---1122---1212---112/22


मचा के शोर मुझे चुप करा नहीं सकते

पहाड़ फूँक से ही तुम उड़ा नहीं सकते


ग़रूर है ये तुम्हारा , तमीज़ का परचम

दिखा के आँख मुझे तुम डरा नहीं सकते 


नहीं वो पेड़ जो  गमलों में, नरसरी में पले

वो शाख हैं कि हमें तुम झुका नहीं सकते ।


ये झूठ का जो पुलिंदा लिए हुए सर पे

पयाम सच का मेरे तुम दबा नहीं सकते


सवाल ये है कि सुनना न मानना है तुम्हें

दिमाग़ में जो तुम्हारे मिटा नहीं सकते ।


वो हार कर भी सबक कुछ न सीख पाया है

नहीं है सीखना जिसको सिखा नहीं सकते ।


जवाब सुन के भी वह सुन सका नहीं ’आनन’

जो कान बंद किए हो , सुना नहीं सकते।


-आनन्द.पाठक-

सोमवार, 1 जुलाई 2024

कविता 16: बचपन से--

 कविता 16


बचपन से

रंग बिरंगी शोख तितलियाँ 

बैठा करती थी फूलों पर

भागा करता था मैं

पीछे पीछे

छूना चाहा जब भी उनको

उड़ जाती थीं इतरा कर 

इठला कर 

मुझे थका कर ।


-आनन्द.पाठक-