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मंगलवार, 3 सितंबर 2024

गीत 88 : इससे पहले कि हम रोशनी से जलें--

  गीत 88: गीत 14 [ अभी संभावना है ]

इससे पहले कि हम  रोशनी से जलें,’आदमी’ तो जगा आदमी में ।

आदमी से अजनबी हुआ आदमी
रंग के भेद में रंग गया आदमी ।
काल गोरे हो तन पर लहू एक रंग
जात और पात में बँट गया आदमी ।

इससे पहले कि हम धर्म अधूरा पढ़ें,"ढाई आख़र" पढ़े आख़िरी में ।

आदमी है खड़ा लेकर ’परमाणु-बम्ब’
आदमी बन गया साँप का तन-बदन ।
हर ज़हर से ज़हरीला हुआ आदमी 
आदमी बन गया एक सीलन घुटन ।

इससे पहले कहीं हम-नस्ल ना बचे, ’गाँधी-गौतम’ बचा आदमी ।

आदमी को निगलता हुआ आदमी
आदमी से उबलता हुआ आदमी ।
आदमी आदमी से परेशान है -
अग्नि-शलाका उगलता हुआ आदमी ।

इससे पहले कि हम पर अँधेरा हँसे, रोशनी तो जगा आदमी में ।

’गाँधी’ वह जो मिटे आदमी के लिए
’सुकरात’ वह जो ज़हर के प्याले पिए
आदमी ने ही सूली चढ़ाया उसे -
आदमी जो जिया आदमी के लिए ।

इससे पहले कि फिर कोई सूली चढ़े, एक "ईशा" जगा आदमी में ।
इससे पहले कि हम  रोशनी से जलें,’आदमी’ तो जगा आदमी में ।
-आनन्द.पाठक-



गीत 87 : वह नई रोशनी की फिर से बातें करते है --

 

गीत 87 [ अभी संभावना है]


वह नई रोशनी की फिर से  बातें करते हैं
मैं एक अँधेरा तब से अब तक भोग रहा हूँ ।

गलियों गलियों नुक्कड़ नुक्कड़ चौराहों पर
’सम्पूर्ण क्रान्ति" का नारा हमसे लगवाएँगे ।
पुन: सुनहले स्वप्न दिखा सूनी आँखों  में
सिंहासन सत्ता का हमसे हिलवाएँगे ।

तार तार हो गई मेरी विश्वास चदरिया
मैं पेबन्द पेबन्द तब से अब तक जोड़ रहा हूँ।

हम आज तलक है  खड़े उन्हीं चौराहों पर
कल हमे अकेला छोड़ कि "दिल्ली’ चले गए ।
सब सत्ता के बँटवारे  में आसक्त रहे 
                  कितने वर्षों हम उनके हाथों छले गए ।

वह आश्वासन का बोझ सौंप आश्वस्त हुए
मैं टुकड़ा-टुकड़ा अब तक जीवन जोड़ रहा हूँ ।

हर कोई एक मशाल लिए अपने हाथों में
" जे0पी0 बनने का दम्भ लिए फिरता रहता है।
हर रथी यहाँ अब स्वयं सारथी बन बैठा
हर नेता खुद को महारथी सोचा करता ।

वह शहर शहर में अश्वमेध की बातें करता
मैं बलिवेदी की तब से अब तक सोच रहा हूँ।


-आनन्द.पाठक-


शनिवार, 10 अगस्त 2024

ग़ज़ल 417 [21-अ] : तुम्हे लगता है जैसे--

  ग़ज़ल 417 [21 अ] -ओके

1222---1222---1222---1222


तुम्हें लगता है जैसे यह तुम्हारी ही बड़ाई है
खरीदी भीड़ की ताली, खरीदी यह बधाई  है ।

जहाँ कुछ लोग बिक जाते, खनकते चन्द सिक्कों पर
वहीं सच क़ैद में है,  झूठ की ही  रहनुमाई है ।

हमें मालूम है कल क्या अदालत फ़ैसला देगी ,
मिलेगी क़ैद फूलों को ही, पत्थर की  रिहाई है ।

रहा हो दस्तबस्ता, सरनिगूँ दरबार में जो भी

वही देता हमेशा ही बग़ावत की दुहाई है ।


रँगा चेहरा है दिल काला, मुखौटों पर मुखौटे हैं,

कमाल-ए-ख़ास है उसका कि उस पर भी रँगाई है।


भरोसा है नहीं उसको , ज़माने पर , न ख़ुद पर ही

न लोगों से वो मिलता है , न ख़ुद से आशनाई है ।



फिसलना तो बहुत आसान होता है यहाँ ’आनन’

बहुत मुशकिल हुआ करती सदाक़त की चढ़ाई है।


-आनन्द पाठक-

गुरुवार, 8 अगस्त 2024

ग़ज़ल 416[32 अ] : रखें इलजाम हम किस पर

 ग़ज़ल 416 [ 32 अ ] -ओके

1222---1222---1222---1222


रखें इलजाम हम किस पर, वतन से बेवफ़ाई का ।
सभी परचम बुलंद रखते, सियासत की लड़ाई  का   
 
छुपा कर है रखा ख़ंज़र, मुनक्क़िस1 है, मुनाफ़िक2 है
करे दावा हमेशा वह क़राबत3 आशनाई  का । 
 
मिला कर हाथ दुश्मन से, वो ग़ैरों से रहे मिलते
किए चर्चा सरे महफ़िल, हमारी बेवफ़ाई का । 
 
क़दम दो-चार भी जो रख न पाए घर से हैं बाहर
उन्हे समझा गया मालिक हमारी रहनुमाई का । 
 
पला करता है गमलों में, घरौदों में, जो साए में 
उसे यह बदगुमानी है , वो है मालिक ख़ुदाई का। 
 
बदल देता है जो अपनी गवाही चन्द सिक्कों पर
यकीं कैसे करे कोई भला उसकी दुहाई  का ।
 
ज़माने के मसाइल पर नहीं वो बोलते ’आनन’
सुनाते हैं हमेशा ही वो किस्सा ख़ुदसिताई का ।
 


-आनन्द पाठक- 

मंगलवार, 6 अगस्त 2024

ग़ज़ल 415 [63 A] : हमेशा क्यों किया करते हो बस --

 ग़ज़ल 415 [63 A] -OK

1222---1222---1222---1222

 

हमेशा क्यों किया करते हो बस तलवार की बातें
कभी तो कर लिया करते दिल--दिलदार की बातें ।
 
लकीरे हैं जो सरहद की, न उनको खीचिए दिल पर
सभी मिट जाएँगी करते रहें कुछ प्यार की बातें ।
 
सियासत तक दहल जाती, लिए जब हाथ में परचम
उतर सड़को पे जनता जब करे ललकार की बातें
 
लगा कर आग नफ़रत की जला दोगे अगर गुलशन
करेगा कौन फिर बोलॊ गुल-ओ-गुलजार की बातें ।
 
बहस करनी अगर हो तो करो मुफ़लिस की रोटी पर
न टी0वी0 पर करो बस बैठ कर बेकार की बातें ।
 
यहीं जीना, यहीं मरना, यहीं रहना है हम सबको ,
करे फिर किसलिए हम सब अबस तकरार की बातें।
 
बहुत अब हो चुकी ’आनन’ ये मंदिर और मसज़िद की
सुनो अब तो ग़रीबों की , सुनो लाचार की बातें  ।
 

 

-आनन्द.पाठक- 

शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

ग़ज़ल 410 [64 A] : खुलने दो खिड़कियों को ,--

 ग़ज़ल 410 [64 A]--OK

221---2122---// 221---2122


 

खुलने दो खिड़कियों को, ताजी हवा तो आए
महका हुआ है गुलशन, नग़्मे नए सुनाए ।
 
माना कि पर कटे हैं, दिल में तो हौसले हैं .
कह दो ये आसमाँ से, हमको न आजमाए ।
 
हर शाम राह देखी , रख्खे दिए जला कर ,
अब याद भी नहीं है, कितने दिये जलाए ।
 
दीदार का सफ़र भी, आसान तो नहीं था
दीवानगी ने मुझकॊ, क्या क्या न दिन दिखाए ।
 
चेहरे तमाम चेहरे , सब एक-से हैं दिखते ।
किसको सही कहे दिल. किसको ग़लत बताए।
 
महफ़िल सज़ा करेगी , कुछ लोग जब न होंगे ,
उनको भी याद करना , जो लौट कर न आए ।
 
शायद समझ गया वो, अंजाम-ए-इश्क़ क्या है,
जब प्यार में हम ’आनन’, ख़ुद को मिटा के आए ।

 

 

 

 

 

 

 


-आनन्द.पाठक-

गुरुवार, 1 अगस्त 2024

ग़ज़ल 409 [ 33 A] : लोग चले हैं प्यास बुझाने --

 ग़ज़ल 409 [ 33 A]  -ओके

21-121-121-122//21-121-121-121-122


लोग चले है प्यास बुझाने, बिन पानी तालाब जिधर है ,
ढूँढ रहे सब साया अपना, जिस जानिब ना एक शजर है।
 
दीप जलाने वाले कम हैं, और बुझाने वाले कितने
रहबर ही रहजन बन बैठा, सहमी सहमी आज डगर है।
 
आदर्शों की बाद मुसाफिर रख लो तुम अपनी झोली में
कौन सुनेगा बात तुम्हारी, बहरा जब हर एक बशर है ।
 
कितने दिन तक रह पाओगे. शीशे की दीवारों में तुम
आज नहीं तो कल टूटेंगी  सबके हाथों में पत्थर है ।
 
दरवाजे सब बंद किए हैं, बैठे हैं कमरे के भीतर
क्या खोलें हम खिड़की कोई, बाहर ख़ौफ़ भरा मंज़र है ।
 
सीने में बारूद भरे हैं, हाथों में माचिस की डिब्बी
निकलूँ भी तो कैसे निकलूँ, सबके हाथों में ख़ंज़र है ।
 
सूरज की किरणों को ’आनन’ लाने को जो लोग गए थे,
अँधियारे लेकर लौटे हैं, घोटालों में क़ैद सहर है ।

 

-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 31 जुलाई 2024

ग़ज़ल 408 [34 A] : किन किन ख़याल-ओ-ख़ाब में

 ग़ज़ल 408 [34 A]-ओके

2212---1212---2212---12


किस किस ख़याल-ओ-ख़्वाब में जीता है आदमी
कितनी जगह से जुड़ के भी टूटा है आदमी ।
 
कितने सवाल हैं यहाँ जीने के नाम पर ,
हर इक सवाल में यहाँ उलझा है आदमी ।
 
हालात-ए-ज़िंदगी से कुछ ऐसे जकड़ गया ,
हँसता न आदमी है, ना रोता है आदमी ।
 
जो भी गया है आज तक, इस राह से कभी
जा कर, अदम से फिर नहीं लौटा है आदमी।
 
आवाज़ आप दें उसे, बोलेगा वह ज़रूर
अन्दर जो दिल में आप के बैठा है आदमी ।
 
कहने को आदमी हैं यहाँ बेशुमार पर
अब आदमी में भी नहीं दिखता है आदमी ।
 
गो, मुशकिले तमाम है ’आनन’ ये मान लो
ज़िंदा है हौसला तो फिर ज़िंदा है आदमी ।
 


-आनन्द.पाठक- 


मंगलवार, 30 जुलाई 2024

ग़ज़ल 407 [35 A] : आप अपने आप को भी तोलिए--

 ग़ज़ल 407 [35 A]-ओके

2122---2122---212


आप अपने आप को भी तोलिए
आदमी को आदमी से जोड़िए
 
अपनी पलकॊ पर बिठा रखते हैं लोग
प्यार से जब आप उनसे बोलिए
 
तीरगी का आप चाहे जो करें
रोशनी को तो भला मत रोकिए,
 
देखिए कैसे बदलती है फ़ज़ा
दिल से दिल को जोड़ कर तो देखिए
 
कौन जाने कब जले बस्ती किधर
आप नफ़रत और तो मत घोलिए ।
 
सामने आने लगे मंज़र नए
अब पुराना राग अपना छोड़िए ।
 
बस गले मिलना ही ”आनन’ जी, नहीं
दिल की गाँठें भी ज़रा तो खोलिए
 

-आनन्द.पाठक-

ग़ज़ल 406[36 A] : रास्ते अब भी मिलेंगे ,आप चलिए तो सही

 ग़ज़ल 406[ 36 A]-ओके

2122---2122---2122---212


रास्ते अब भी मिलेंगे, आप चलिए तो सही ,
हौसले से दो क़दम खुद आप रखिए तो सही ।
 
लोग जो पत्थर से हैं वो ख़ुद बख़ुद गल जाएँगे,
बाँहों में भर कर गले से, आप लगिए तो सही ।
 
आदमी ज़िंदा कि मुर्दा चल पड़ेगा एक दिन ,
इन्क़लाबी जोश में कुछ आग भरिए तो सही ।
 
सोचते जो रह गए, बैठे हुए हैं आज तक ,
शीश ख़ुद परबत झुकाए, आप चढ़िए तो सही ।
 
गुनगुनाती बह चलेगी पत्थरों से निर्झरी 
दर्द कुछ अपनी ग़ज़ल में आप भरिए तो सही ।
 
इन अँधेरों की चुनौती तो नहीं इतनी बड़ी
प्यार का दीपक जला कर आप रखिए तो सही ।
 
हज़रत-ए-आनन ज़रा आँखें तो अपनी खोलिए
देश के हालात पर कुछ आप कहिए तो सही ।


-आनन्द.पाठक-

गुरुवार, 18 जुलाई 2024

ग़ज़ल 402[ 59-A] : हर दर्द नागहाँ हो

 ग़ज़ल 402 [ 59-A ]-ओके
[ 221-2122—221—2122]
Bahr-e-Muzaare-musamman Akharab saalim akharab mahazoof
 
हर दर्द नागहाँ हो, यह भी तो सच नहीं है
आँखों से ही बयाँ हो, यह भी तो सच नहीं है ।
 
इलजाम जिसके सर पर, कहता कि झूठ है सब ,
बिन आग का धुआँ हो, यह भी तो सच नहीं है।
 
माखन न तुमने खाया, बस दूध के धुले हो
चेहरे से ना अयाँ हो, यह भी तो सच नहीं है ।
 
जब हाशिए पे आए , साजिश बता रहे हो
तुम इतने नातवाँ हो, यह भी तो सच नहीं है
 
’दिल्ली’ में बारहा जो , मजमा लगा रहा हो
तुम मीर-ए-कारवाँ है, यह भी तो सच नहीं  ।
 
काजल की कोठरी में, बेदाग़ तुम नहीं हो
मासूम बेज़ुबाँ हो ,यह भी तो सच नहीं है ।
 
इतनी बड़ी नहीं  है, हस्ती तुम्हारी ’आनन’
ख़ुद ही तुम आसमाँ हो, यह भी तो सच नहीं ।               
 
 -आनन्द.पाठक-
 
 
 
    
 
 

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ग़ज़ल 401[43-A] : जो गीत दर्द के गाते नहीं तो---

 ग़ज़ल 401 [43-A ] ओके

1212---1122---1212---22


जो गीत दर्द के गाते नहीं, तो क्या करते 
तमाम उम्र सुनाते नहीं, तो क्या करते ।
 
कड़ी थी शर्त हमेशा ही ज़िंदगी की मगर 
उसे भी हम जो निभाते नहीं, तो क्या करते !
 
हमेशा क़ैद थी आइद हमारे ख़्वाबों पर
हर एक ख़्वाब मिटाते नहीं, तो क्या करते।
 
उमीद थी कि वो आएँगे खुद बख़ुद चल कर
पयाम दे के बुलाते नहीं, तो क्या करते ।
 
तमाम लोग थे ईमाँ खरीदने निकले-
ज़मीर अपना बचाते नहीं, तो क्या करते ।
 
शरीफ़ लोग भी बातिल के साथ साथ खड़े
अलम जो सच का उठाते नहीं, तो क्या करते
 
हर एक मोड़ पे नफ़रत की तीरगी ’आनन’
चिराग़-ए-इश्क़ जलाते नहीं, तो क्या करते ।

-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

आइद थे = लागू थे

पयाम दे के = संदेश भेज कर

बातिल के साथ = झूठ के साथ

तीरगी   = अँधेरा

अलम = झंडा





बुधवार, 17 जुलाई 2024

ग़ज़ल 400 [ 42-A] : खोटे सिक्के हाथों में ले---

 ग़ज़ल 400 [42-A] --ओके

21---121---121--122  // 21---121--121--122


 

खोटे सिक्के ले हाथों में, मोल लगाने लोग खड़े हैं
घड़ियाली आँसू से पूरित, दर्द जताने लोग खड़े हैं ।
 
आज धुँआ फिर से उठ्ठेगा, झुग्गी झोपड़पट्टी से ही 
कल जैसा ही दुहराने को, आग लगाने लोग खड़े हैं ।
 
बेच दिए रामायण-गीताआदर्शों की बात भुला कर
वाचन करने को तत्पर हैं, अर्थ बताने लोग खड़े हैं ।
 
दीन-धरम है बाक़ी अब भी  कुछ लोगों के दिल के अंदर
आग लगाने वालों सुन लो, आग बुझाने लोग खड़े हैं ।
 
दुनिया भर की बात करेंगे, चाँद सितारे हैं मुठ्ठी में
करना धरना एक नही कुछ, गाल बजाने लोग खड़े हैं  ।
 
शर्म--हया की बात कहाँ अब,जिस्म नुमाइश का फ़ैशन है
वाजिब है कुछ की नजरों मे, आज बताने लोग खड़े हैं।
 
आननतुम भी कैसी कैसी, झूठी बातों में आते हो
झूठे वादों से जन्नत की, सैर कराने लोग खड़े हैं ।

 

 

 

 

 

-आनन्द पाठक-



मंगलवार, 16 जुलाई 2024

ग़ज़ल 398 [41 A] : सूरज को गिरवी रख रख कर

 ग़ज़ल 398 [41 A]  -ओके

21---121--121---122 // 21---121---121--12

सूरज को गिरवी रख रख कर, खुद ही वो दिनमान बने
जिनके अन्तर्मन थे काले, सत्ता के सोपान  बने  ।
 
टेढी टेढ़ी, चाल है उनकी, चार दिनों की शान यहाँ,
आकर इस फानी दुनिया में ,क्यों तुम नाफरमान बने
 
तुमको क्या लेना-देना है, आदर्शों के मेले से-
गैरत अपनी बेच रहे हैं, ख़ुद अपना उन्वान बने ।
 
’राम-कथा’ कहते फ़िरते थे, गाँव-गली में वाचक बन 
’दिल्ली’ जाकर ही जाने क्यों, ’रावण’ की पहचान बने ।
 
कल तक जिनके हाथों में थे, दंड, कमंडल, माला भी
आज वही उनके हाथों में, खंजर, तीर-कमान बने ।
 
खोज रहे थे कल जो खुद को, संबंधों की दुनिया में
गिरगिट-सा कुछ रंग बदल कर, आज वही अनजान बने ।
 
बात जहाँ यह तय होनी थी, चेहरे पर कितने चेहरे ,
जो चेहरे ’उपमेय’ नहीं थे, वो चेहरे ’उपमान’ बने ।
 
दुनिया मे क्या करने आए, और भला क्या कर डाला,
’ढाई-आखर’ पढ़ कर” आनन’, क्यों ना तुम इन्सान बने?
 


-आनन्द पाठक-