गुरुवार, 4 जून 2026

कविता 034 : वही ढाक के तीन पात है

 कविता 034: वही ढाक के तीन पात हैं । 

[03 जून 2026 , नई दिल्ली ,मालवीय नगर इलाके के एक होटल में आग लगी और 21-22 आदमी
जल कर मर गए, कुछ झुलस गए। उस पर भी दुखद यह कि एक ही परिवार के 8-सदस्यों
की भी मृत्यु हो गई। व्यवस्था की लापरवाही का एक और उदाहरण । मामले की लीपा पोती, आश्वासनॊ का दौर
किसी को बख़्शा नही जाएगा --वही घिसे पिटे जुमले। यह दुर्घटना न पहली है न आख़िरी है ।
इस घटना पर उपजा एक सहज आक्रोश,  एक वेदनात्मक अनुभूति-एक कविता---।]


  कविता 034: वही ढाक के तीन पात है ।

आग लगी जब.
नीद खुली तब ।
मरने वाले मर गए, 
जलने वाले जल गए
कुछ झुलस गए ।

हम कुर्सी पर बैठे बैठे 
ढूँढ रहे हैं।
इसकी ग़लती, उसकी ग़लती
इसकी टॊपी, उसके सर
असर नहीं मोटी चमड़ी पर।
फोड़ ठीकरा औरों के सर।

कुछ न होगा।
चन्द दिनों तक शोर मचेगा
और बाद में धुँआ छँटेगा ।
हर घटना मे वही बात है।
वही ढाक के तीन पात हैं।

-आनन्द. पाठक ’आनन’-
 880092 7181