कविता 034: वही ढाक के तीन पात हैं ।
[03 जून 2026 , नई दिल्ली ,मालवीय नगर इलाके के एक होटल में आग लगी और 21-22 आदमी
जल कर मर गए, कुछ झुलस गए। उस पर भी दुखद यह कि एक ही परिवार के 8-सदस्यों
की भी मृत्यु हो गई। व्यवस्था की लापरवाही का एक और उदाहरण । मामले की लीपा पोती, आश्वासनॊ का दौर
किसी को बख़्शा नही जाएगा --वही घिसे पिटे जुमले। यह दुर्घटना न पहली है न आख़िरी है ।
इस घटना पर उपजा एक सहज आक्रोश, एक वेदनात्मक अनुभूति-एक कविता---।]
की भी मृत्यु हो गई। व्यवस्था की लापरवाही का एक और उदाहरण । मामले की लीपा पोती, आश्वासनॊ का दौर
किसी को बख़्शा नही जाएगा --वही घिसे पिटे जुमले। यह दुर्घटना न पहली है न आख़िरी है ।
इस घटना पर उपजा एक सहज आक्रोश, एक वेदनात्मक अनुभूति-एक कविता---।]
कविता 034: वही ढाक के तीन पात है ।
आग लगी जब.
नीद खुली तब ।
मरने वाले मर गए,
मरने वाले मर गए,
जलने वाले जल गए
कुछ झुलस गए ।
हम कुर्सी पर बैठे बैठे
ढूँढ रहे हैं।
इसकी ग़लती, उसकी ग़लती
इसकी टॊपी, उसके सर
असर नहीं मोटी चमड़ी पर।
फोड़ ठीकरा औरों के सर।
कुछ न होगा।
चन्द दिनों तक शोर मचेगा
और बाद में धुँआ छँटेगा ।
और बाद में धुँआ छँटेगा ।
हर घटना मे वही बात है।
वही ढाक के तीन पात हैं।
-आनन्द. पाठक ’आनन’-
880092 7181
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