गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

गीत 68 : नए वर्ष का स्वागत वन्दन--

 [ शनै: शनै: हम आ ही गए ,आगत और अनागत के मुख्य द्वार पर,जहाँ जाने वाले वर्ष की

कुछ विस्मरणीय स्मृतियाँ हैं तो आने वाले नववर्ष से कुछ आशाएँ हैं। इसी सन्दर्भ में प्रस्तुत है

एक गीत--- 

नए वर्ष पर एक गीत : आशाओं की नई किरण से---
आशाओं की नई किरण से, नए वर्ष का स्वागत -वन्दन ,
नई सुबह का नव अभिनन्दन।
ग्रहण लग गया विगत वर्ष को 
उग्रह अभी नहीं हो पाया  ।
बहुतों ने खोए  हैं परिजन ,
"कोविड’ की थी काली छाया ।
इस विपदा से कब छूटेंगे, खड़ी राह में बन कर अड़चन ।
नई सुबह का नव अभिनन्दन।
देश देश आपस में उलझे
बम्ब,मिसाइल लिए खड़े हैं ।
बैठे हैं शतरंज बिछाए ,
मन में झूठे दम्भ भरे हैं ।
ऐसा कुछ संकल्प करें हम, कट जाए सब भय का बन्धन ।
नई सुबह का नव अभिनन्दन।
धुंध धुआँ सा छाया जग पर
साफ़ नहीं कुछ दिखता आगे ।
छँट जाएँगे काले बादल ,
ज्ञान-ज्योति जब दिल में जागे ।
हम सब को ही एक साथ मिल ,करना होगा युग-परिवर्तन ।
नई सुबह का नव अभिनन्दन।
मानव-पीढ़ी रहेगी ज़िन्दा ,
जब तक ज़िन्दा हैं मानवता ।
सत्य, अहिंसा ,प्रेम, दया का
जब तक दीप रहेगा जलता ।
महकेगा यह विश्व हमारा ,जैसे महके चन्दन का वन ।
नई सुबह का नव अभिनन्दन।
-आनन्द.पाठक--


गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

चन्द माहिए : क़िस्त 90

 क़िस्त 90


1

रह-ए-इश्क़ से जो गुज़रा

दीवाना हो कर

फिरता सहरा सहरा


2

जाने अनजाने में 

उम्र गुज़र जाती

सपनों को सजाने में 


3

जीना आसान नहीं

कौन यहाँ ऐसा 

जो है परेशान  नहीं


4

दो दिल के बन्धन से

अमरित भी निकले

जीवन के मन्थन से


5

इस दिल में उतर आओ

महकेगा तन-मन

अब और न तड़पाओ 


चन्द माहिए : क़िस्त 89

 

क़िस्त 89


1

वो जख़्म अगर देता

कौन सा जख़्म भला

जो वक़्त न भर देता 


2

आया है मेरा हमदम

बात मेरी उस ने

रख्खा तो कम से कम 


3

इतना ही काफी है

कोई ख़यालों में 

जीवन का साथी है


4

दुनिया के मेले में 

जाने क्या गाता

यह दिल है अकेले में 


5

उतरा है कोई मन में

फूल खिले मेरे

सुधियों के उपवन में 


शनिवार, 19 दिसंबर 2020

चन्द माहिए : क़िस्त 88

 क़िस्त 88


1

अच्छा ही किया तुमने

गिरने से पहले

जो रोक लिया तुमने


2

यादों में बसा रखना

अपनी दुआओं में 

मेरी भी दुआ रखना


3

पहले न कभी पूछा

भूल गया हूँ मैं ?

ऐसा क्योंकर सोचा ?


4

कुछ बात अभी बाक़ी

अब भी आ जाओ

यह रात अभी बाक़ी


5

सब याद है जान-ए-जिगर

तुम ने निभाया जो

एहसान मेरे सर पर 


-आनन्द.पाठक--

-------


शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

चन्द माहिए : क़िस्त 87

 


क़िस्त 87


1

यूँ रूठ के चल देना

हौले से हँस कर

फिर बात बदल  देना


2

अबतक क्या कम भोगा ?

उल्फ़त में तेरे

जो होना है होगा


3

ख़ामोश ही क्यों रहती

पहलू में आ कर

कुछ तुम भी तो कहती 


4

ये राज़ न खोलेगा

पूछ रही हो क्या

दरपन क्या बोलेगा


5

लहरा कर चलती हो

खुद से ही छुप कर 

जब छत पे टहलती हो

-----

-आनन्द.पाठक-


चन्द माहिए : क़िस्त 86

 क़िस्त 86


1

आँखें कुछ कहती हैं

पढ़ जो सको पढ़ लो

ख़ामोश क्यूँ रहती हैं


2

वादा न निभाते हो

तोड़ ही जब देना

क्यों क़स्में खाते हो


3

दिल से दिल की दूरी

तुम ने बना रख्खी

क्या है वो मजबूरी


4

आँखें कुछ कहती हैं

राज़ की बातॊं पर

ख़ामोश क्यों रहती हैं


5

साने से ढला आँचल

कुछ तो कहता है

कुछ समझा कर, पागल !


-आनन्द.पाठक-

रविवार, 29 नवंबर 2020

ग़ज़ल 157 : सारी ख़ुशियाँ इश्क़-ए-कामिल

 ग़ज़ल 157 


मूल बह्र 21--121--121--122 =16

सारी ख़ुशियाँ इश्क़-ए-कामिल
होती हैं कब किसको  हासिल

जब से तुम हमराह हुए हो
साथ हमारे खुद  ही मंज़िल

और तलब क्या होगी मुझको
होंगी अब क्या राहें मुश्किल

प्यार तुम्हारा ,मुझ पे इनायत
वरना यह दिल था किस क़ाबिल

इश्क़ में डूबा पार हुआ वो
फिर क्या दर्या फिर क्या साहिल

शेख ! तुम्हारी बातें कुछ कुछ
क्यों लगती रहतीं है  बातिल

लौट के आजा ”आनन’ अब तो
किस दुनिया में रहता गाफ़िल 

-आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 156 : फिर वही इक नया बहाना है


बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़
2122---1212---22


फिर वही इक नया बहाना है
जानता हूँ न तुम को आना है

छोड़िए दिल से खेलना  मेरे
ये खिलौना भी टूट  जाना है

तुम भी आते तो बात बन जाती
आज मौसम भी आशिकाना है

छोड़ कर दर तिरा कहाँ जाऊँ
हर जगह सर नहीं  झुकाना है

आप से और क्या करूँ पर्दा
क्या बचा है कि जो छुपाना है

जिस्म का ये कबा न जायेगा
बाद इसको भी छोड़ जाना है

कौन रुकता है याँ किसी के लिए
एक ही राह सबको जाना है

आज तुमको हूँ अजनबी ’आनन’
राब्ता तो मगर पुराना है 

-आनन्द.पाठक--

कबा = चोला ,लबादा
राब्ता /राबिता= संबंध

गुरुवार, 26 नवंबर 2020

चन्द माहिए : क़िस्त 85

 क़िस्त 85


1

भँवरों की बात चली

कलियों को लगती

उनकी हर बात भली 


2

तुम छोड़ गए जब से 

सूनी हैं रातें

दिल रोता है तब से


3

हर हर्फ़ उभर आया

दिल पर कल मेरे

खोया था ख़त ,पाया


4

दो शब्द में सौ बातें

कितने ख़यालों से

गुज़री होंगी रातें 


5

एहसास् तो मुझको है

जितना है मुझको

क्या उतना तुझ् को है ?



चन्द माहिए : क़िस्त 84

 क़िस्त 84


1

कहने में हिचक क्या है !

यूँ न दबा रख्खो

इतनी भी झिझक क्या है !


2

जो कहनी था कह दी

समझो ना समझो

बातें मेरे मन की


3

लिखने में अड़चन थी

मुझसे कह देते

मन में जो उलझन थी


4

उलफ़त का तक़ाज़ा है

धीरे से खुलता

दिल का दरवाज़ा है 


5

भँवरा तो भँवरा है

एक कली पर वो

रहता कब ठहरा है 



सोमवार, 9 नवंबर 2020

गीत 67 : आज दीपावली की है पावन घड़ी

 एक गीत : दीपावली पर-2020


आज दीपावली की है पावन घड़ी

प्रेम का दीप जलता  रहे उम्र भर


दिल में खुशियाँ हैं,उल्लास है,प्यार है

रात भी रोशनी  से नहाई  हुई

और तारे गगन में परेशान हैं

चाँद -सी कौन है,छत पे आई हुई ?


लौ लगी है तो बुझने न पाए कभी

मैं भी  रख्खूँ नज़र,तुम भी रखना नज़र


दीप महलों में या झोपड़ी में जले

एक सी रोशनी सबको मिलती सदा

एक दीपक जला कर रखो राह में

सब को मिलता रहे रोशनी का पता


हो अँधेरा जहाँ ,दीप रखना वहीं

हर गली मोड़ पर हर नगर हर डगर


द्वेष ,नफ़रत की दिल में लगी आग हो

तो जलाती रहेगी तुम्हे उम्र भर 

यह अँधेरा मिटेगा क्षमा प्यार से -

प्रीति की ज्योति दिल में जला लो अगर


प्रेम,करुणा, दया दिल में ज़िन्दा रहे

और चलता रहे रोशनी का सफ़र


 आज दीपावली की है पावन घड़ी, प्रेम का दीप जलता  रहे उम्र भर


-आनन्द.पाठक-




शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2020

डायरी 02

-1-  
कफ़न फाड़ कर मुर्दा बोला -
--श्याम नन्दन किशोर जी की यह एक लम्बी कविता है । 

चमड़ी मिली खुदा के घर से
दमड़ी नहीं समाज दे सका
गजभर भी न वसन ढँकने को
निर्दय उभरी लाज दे सका

मुखड़ा सटक गया घुटनों में
अटक कंठ में प्राण रह गये
सिकुड़ गया तन जैसे मन में
सिकुड़े सब अरमान रह गये

मिली आग लेकिन न भाग्य-सा
जलने को जुट पाया इंधन
दाँतों के मिस प्रकट हो गया
मेरा कठिन शिशिर का क्रन्दन

किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया

श्वेत माँग-सी विधवा की,
चदरी कोई इन्सान दे गया
और दूसरा बिन माँगे ही
ढेर लकड़ियाँ दान दे गया

वस्त्र मिल गया, ठंड मिट गयी,
धन्य हुआ मानव का चोला
कफन फाड़कर मुर्दा बोला।

कहते मरे रहीम न लेकिन,
पेट-पीठ मिल एक हो सके
नहीं अश्रु से आज तलक हम,
अमिट क्षुधा का दाग धो सके

खाने को कुछ मिला नहीं सो,
खाने को ग़म मिले हज़ारों
श्री-सम्पन्न नगर ग्रामों में
भूखे-बेदम मिले हज़ारों

दाने-दाने पर पाने वाले
का सुनता नाम लिखा है
किन्तु देखता हूँ इन पर,
ऊँचा से ऊँचा दाम लिखा है

दास मलूका से पूछो क्या,
'सबके दाता राम' लिखा है?
या कि गरीबों की खातिर,
भूखों मरना अंजाम लिखा है?

किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया।

जुटा-जुटा कर रेजगारियाँ,
भोज मनाने बन्धु चल पड़े
जहाँ न कल थी बूँद दीखती,
वहाँ उमड़ते सिन्धु चल पड़े

निर्धन के घर हाथ सुखाते,
नहीं किसी का अन्तर डोला
कफ़न फाड़कर मुर्दा बोला।

घरवालों से, आस-पास से,
मैंने केवल दो कण माँगा
किन्तु मिला कुछ नहीं और
मैं बे-पानी ही मरा अभागा

जीते-जी तो नल के जल से,
भी अभिषेक किया न किसी ने
रहा अपेक्षित, सदा निरादृत
कुछ भी ध्यान दिया न किसी ने

बाप तरसता रहा कि बेटा,
श्रद्धा से दो घूँट पिला दे
स्नेह-लता जो सूख रही है
ज़रा प्यार से उसे जिला दे

कहाँ श्रवण? युग के दशरथ ने,
एक-एक को मार गिराया
मन-मृग भोला रहा भटकता,
निकली सब कुछ लू की माया

किन्तु अचानक लगा कि यह,
घर-बार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी,
मरने पर उपकार हो गया

आश्चर्य वे बेटे देते,
पूर्व-पुरूष को नियमित तर्पण
नमक-तेल रोटी क्या देना,
कर न सके जो आत्म-समर्पण!

जाऊँ कहाँ, न जगह नरक में,
और स्वर्ग के द्वार न खोला!
कफ़न फाड़कर मुर्दा बोला।

-श्याम नन्दन किशोर-
-------------------

शनिवार, 26 सितंबर 2020

चन्द माहिए : क़िस्त 05


क़िस्त 05

 

:01:

जब बात निकल जाती

लाख जतन कर लो

फिर लौट के कब आती ?

 

:02:

उनकी ये अदा कैसी ?

ख़ुद से छुपते  हैं

देखी न सुनी  ऐसी

 

:03:

ऐसे न चलो हमदम !

लहरा कर जुल्फ़ें

आवारा है मौसम

 

:04:

जीवन का सफ़र मुश्किल

होता है आसां

मिलता जब दिल से दिल

 

:05:

जब क़ैद ज़ुबाँ होती

बेबस आँखें तब

अन्दाज-ए--बयाँ  होती


 सं 21-10-20


गुरुवार, 24 सितंबर 2020

डायरी 01


आँख जब भी मिले ,प्यार में ही ढले
हाथ जब भी बढ़े  दोस्ती के लिए
आदमी में अगर आदमियत न हो 
है ज़हर आदमी ,आदमी  के लिए   --[नामालूम ]
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भीलन लूटीं गोपियाँ ,वही अर्जुन वही बान
मनुज बली नहीं होत है ,समय होत बलवान    [ना मालूम ]
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क्या गेहूँ चावल मोठ मटर
क्या आग धुआँ क्या अंगारा
सब ठाठ पड़ा रह जाएगा
जब लाद चलेगा  बंजारा  ----                                 -नज़ीर अकबराबादी -[ बंजारानामा से ]
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रहिमन जिह्वा  बावरी ,कह गई सुरग पताल
आपहि कहि अन्दर हुई ,जूती खाय कपाल --             -रहीम -
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वह ख़ुद ही जान जाते हैं ,बुलन्दी आसमानों की
परिंदों को नहीं दी जाती तालिम उड़ानॊं  की                 ना मालूम
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यह आइना है सदाकत बयान करता है
कि इसके आगे अदाकारियां नहीं चलती                  -मंज़र भोपाली-
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तुम तकल्लुफ़ को भी इखलास समझते हो ’फ़राज़’
दोस्त होता नहीं हर हाथ  मिलाने  वाला                  - फ़राज़ अहमद ’फ़राज़’-
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अपने हर लफ़्ज़ से ख़ुद आइना हो जाऊँगा
उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा            -वसीम बरेलवी-
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      --वन्दे मातरम--
नोट : प्रथम दो पद संस्कृत में हैं और शेष ’बंगला भाषा " में है ।

वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलाम्
मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलाम्
मातरम्।

शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम्॥ १॥

कोटि कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
अबला केन मा एत बले।
बहुबलधारिणीं
नमामि तारिणीं
रिपुदलवारिणीं
मातरम्॥ २॥

तुमि विद्या, तुमि धर्म
तुमि हृदि, तुमि मर्म
त्वम् हि प्राणा: शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गडी मन्दिरे-मन्दिरे॥ ३॥

त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादायिनी,
नमामि त्वाम्
नमामि कमलाम्
अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलाम्
मातरम्॥४॥

वन्दे मातरम्
श्यामलाम् सरलाम्
सुस्मिताम् भूषिताम्
धरणीं भरणीं
मातरम्॥ ५॥

--बंकिम चन्द्र  चटर्जी--
--------------------

शे’र

अब मैं समझा तेरे रुखसार पर तिल का मतलब
दौलत-ए-हुस्न पर  पहरेदार बिठा रखा  है 

-नामालूम-
--------
जब वन में आग लग गई तो--

पेड़ ने हंस से कहा--

आग लगी वन-खंड में ,दाझै  चन्दन  वंश
मैं तो दांझा पंख बिन ,तू  क्यों  दाझै  हंस

हंस ने पेड़ से कहा--

पान मरोडिया  फल भख्या ,बैठ्या एकल डाल
तू दाझै मैं उड़ चलूँ ? जीणौ  कितने  साल 

------------------

पेड़ के वो पत्ते नहीं जो गिर जाए हम 
आँधियों से कह तो  औक़ात में  रहें
-----

निगाहों में मंज़िल थी गिरे और गिर कर सँभलते रहे
हवाओं ने कोशिश बहुत की मगर ,चिराग़ आँधियों में चलते रहे

-----

परिन्दों को मंज़िल मिलेगी यक़ीनन
ये  फैले हुए उनके पर बोलते हैं
वो लोग रहते हैं ख़ामोश अकसर
ज़माने  में जिनके हुनर बोलते हैं

-ना मालूम -
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जब भी पिया है पत्थरों को तोड क  पिया है
ऎ समन्दर तेरा बूँद भर भी एहसान नहीं मुझ पर
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फ़लक़ को जिद है जहाँ बिजलियाँ गिराने की
हमें भी जिद है  वहीं आशियाँ  बनाने  की
------

ज़िन्दगी की असली उड़ान बाक़ी है
ज़िन्दगी के कई इम्तिहान बाक़ी  है
अभी तो नापी है मुठ्ठी भर ज़मीन हमने
अभी तो सारा आसमान  बाक़ी है

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जब से मैं चला हूँ मंज़िल पर है नज़र
कभी रास्ते में मील का पत्थर नहीं देखा

-बशीर बद्र-
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क़ातिल की यह दलील भी मुंसिफ़ ने मान ली
मक़्तूल ख़ुद गिरा था ख़ंज़र  की नोक  पर 

-नामालूम-
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प्रिय वाक्य  प्रदानेन ,सर्वे तुष्यन्ति जन्तव :
तस्मात देव वक्तव्यं , "वचने किम दरिद्रता"
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ऐसा माना जाता है कि उर्दू में सबसे पहला माहिया चिराग़ हसन
’हसरत; मरहूम साहब ने लिखा था [ 1937 में ] 

बागों में पड़े झूले
तुम भूल गए हम को
हम तुम को नहीं भूले

[स्रोत : फ़ाइलात -उर्दू अरूज़ का नया निज़ाम [प-216] - द्वारा 
मुहम्मद याकूब ’आसी’ ]
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सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िन्दगानी फिर कहाँ
ज़िन्दगानी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ

--ख़्वाज़ा मीर ’दर्द’--
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मैं क़तरा हो कर समन्दर से जंग लेती हूँ
मुझे बचाना समन्दर की जिम्मेदारी है
दुआ करो कि सलामत रहे हिम्मत मेरी
यह इक चिराग़ कई आँधियो पे भारी है

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मज़िल पर जो पँहुच गए ,उन्हें नाज़-ए-सफ़र तो कोई नहीं
दो-चार क़दम जो चले नहीं रफ़्तार की बातें करते हैं
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ऎ मेरे रहबर बता ,मेरा कारवाँ क्योंकर लुटा ?
मुझे रहजनों से गिला नहीं ,तेरी रहबरी का सवाल है 

--- 
जिसके आँगन में उमीदी का शजर लगता है
उसका हर ऎब ज़माने को हुनर  लगता है
                              - परवीन शाकिर--
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कैसे बताऊँ क्या हुई जीने की आरज़ू
इक हादसे में आप अपनी मौत मर गई
                           -सरवर आलम ’राज़’ सरवर
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 ’अज़्म’ यह जब्त की आदाब कहाँ से सीखी
तुम तो हर रंग में लगते थे बिखरने वाले ।
                        - अज़्म बेहजाद -
      





रविवार, 20 सितंबर 2020

चन्द माहिए : क़िस्त 83

 क़िस्त 83

1

क्या जीना अब तुम बिन !

आस यही मन में 

तुम आओगे इक दिन


2

खिंचता जाए मन है

तेरी आँखों में

कैसा आकर्षन है


3

पीड़ा अनजानी है

एक सी क्यों लगती

दोनों की कहानी है


4

कह दो जो कहना है

वक़्त बहुत कम है

कितने दिन रहना है 


5

स्वागत अभिनन्दन है

आप यहाँ आए 

यह स्नेह का बन्धन है 


चन्द माहिए : क़िस्त 82

 क़िस्त 82


1

गुलशन में है हलचल 

लहराया तुम ने

जब से अपना आँचल


2

मुझको तो भुला दोगे

पर मेरी यादें

तुम कैसे मिटा दोगे ?


3

कैसे है शरमाना 

तुम से ही सीखा

कलियों ने इतराना


4

नैनों  में बसा कोई

प्यार नहीं सच्चा

जब दिल में रचा कोई


5

गिन गिन कर रातें की

तनहाई में फिर

तसवीर से बातें की 


सं 21-10-20


चन्द माहिए : क़िस्त 81

 क़िस्त 81


1

इतना न झुकाओ सर

ध्यान रहे इतना

दस्तार रहे सर पर 


2

हलचल सी है मन में 

महकीं फिर यादें

मन के इस उपवन में 


3

कुछ लुत्फ़-ओ-इनायत भी

होती उल्फ़त में 

कुछ शिकवा शिकायत भी


4

खट्टी मीठी यादें

सोने कब देतीं

देतीं हैं आवाज़ें


5

बदरा बरसै  झम झम

नाचै मन मोरा

पायल बोले  छम छम 


चन्द माहिए : क़िस्त 80

 1

यूँ रस्म-ए-वफ़ा सब से

रहती है उन की

हम से  हैं ख़फ़ा कब से 


2

ऐसी भी अयादत क्या

ग़ैरों से पूछो

’आनन’ की हालत क्या ?


3

ग़ैरों से रफ़ाक़त है

लेकिन मुझ से ही

बस उनको शिकायत है


"झूठी यह कहानी है "

हँस देती हो तुम 

जाओ , न सुनानी है 


5

 कलियों पर जब छलके

मदमाता  यौवन

गुलशन गुलशन महके


चन्द माहिए : क़िस्त 79

 क़िस्त 79


1

अपना ग़म ढो लेंगे

पूछोगी जब तुम

"अच्छा हूँ’-बोलेंगे


2

माना जख़्मी है दिल

कैसे समझे तुम 

ये इश्क़ के नाक़ाबिल ?


3

ये कैसी शरारत है 

चिलमन में छुप कर

करता वो इशारत है 


4

ग़म अपना दबा रखना

कम तो नहीं ’आनन’ 

जख़्मों को छुपा रखना


5

यह नूर जो छिटका है

उजड़े चमन में भी

यह जादू किसका  है ?


-आनन्द पाठक-


गुरुवार, 27 अगस्त 2020

ग़ज़ल 155 : बेज़ार हुए क्यों तुम ---

221---1222--//221---1222
मफ़ऊलु--मुफ़ाईलुन // मफ़ऊलु--मफ़ाईलुन
बह्र  हज़ज मुसम्मन अख़रब
या
हज़ज मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ मुखन्निक़ सालिम अल आख़िर 
---------------------
एक ग़ज़ल : बेज़ार हुए तुम क्यों --

बेज़ार हुए तुम क्यों, ऐसी भी  शिकायत क्या?
मै अक्स तुम्हारा हूँ, इतनी भी हिक़ारत क्या!   

हर बार पढ़ा मैने, हर बार सुना तुमसे ,
पारीन वही किस्से, नौ हर्फ़-ए-हिक़ायत क्या?   

जन्नत की वही बातें, हूरों से मुलाक़ातें,
याँ हुस्न पे परदा है, वाँ  होगी इज़ाजत क्या?

तक़रीर तेरी ज़ाहिद, मुद्दत से वही बातें,
कुछ और नया हो तो, वरना तो समाअत क्या!

हर दिल में निहाँ हो तुम ,हर शै में फ़रोज़ां  हो,
ऎ दिल के मकीं मेरे! यह कम है क़राबत क्या!

दिल पाक अगर तेरा ,क्यों ख़ौफ़जदा  बन्दे!
सज़दे का दिखावा है? या हक़ की इबादत, क्या?

मसजिद से निकलते ही, फिर रिन्द हुआ ’आनन’,
इस दिल को यही भाया, अब और वज़ाहत क्या!

-आनन्द.पाठक--

 शब्दार्थ
अक्स = परछाई ,प्रतिबिम्ब
हिक़ारत = घॄणा ,नफ़रत
पारीन:   = पुराने
नौ हर्फ़-ए-हिक़ायत = कहानी में कोई नई बात
रिन्द   =  शराबी
तक़रीर = प्रवचन
समाअत  = सुनना
फ़ुरोज़ाँ   = प्रकाशमान,रौशन
क़राबत = नजदीकी
दिल के मकीं  = दिल के मकान में रहने वाला
वज़ाहत = स्पष्टीकरण

ग़ज़ल 154 : ज़िन्दगी से हमेशा -बग़ावत रही



212----212----212----212
फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन-फ़ाइलुन
बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम
----------------------------------

ग़ज़ल 154  : ज़िन्दगी से हमेशा ---

ज़िन्दगी से हमेशा   बग़ावत रही
ज़िन्दगी को भी मुझ से शिकायत रही

कौन-सी शर्त थी जो निभाई नही ?
मेरे ख़्वाबों से फिर क्यूँ अदावत रही ?

राह कोई मुकम्मल न हासिल हुई
मोड़ हर मोड़ पर बस कबाहत रही

अर्श से फ़र्श पर गिर के ज़िन्दा रहे
ज़िन्दगी ये भी तेरी इनायत  रही

रंज-ओ-ग़म हो ख़ुशी हो  कि हो दिल्लगी
मुख़्तसर ज़िन्दगी की हिकायत रही

पास आकर ज़रा बैठ ,ऎ ज़िन्दगी !
उम्र भर तुझ से मिलने की चाहत रही

राह-ए-हक़ पर जो चलना था ’आनन’ तुझे
बुतपरस्ती मगर तेरी आदत रही

-आनन्द.पाठक--

हिकायत = कहानी
कबाहत  = परेशानी
राह-ए-हक़  पर= हक़ीक़ी मार्ग पर
बुतपरस्ती  = सौन्दर्य पूजन ,

ग़ज़ल 145 : लगे दाग़ दामन पे --

फ़’लुन--फ़े’लुन---फ़े’लुन --फ़े’लुन
122---122------122----122
बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम
-------------------
ग़ज़ल 145 : लगे दाग़ दामन पे--

लगे दाग़ दामन पे , जाओगी कैसे ?
बहाने भी क्या क्या ,बनाओगी कैसे ?

चिराग़-ए-मुहब्बत बुझा तो रही हो
मगर याद मेरी मिटाओगी  कैसे ?

शराइत हज़ारों यहाँ ज़िन्दगी  के
भला तुम अकेले निभाओगी कैसे ?

नहीं जो करोगी  किसी पर भरोसा
तो अपनो को अपना बनाओगी कैसे ?

रह-ए-इश्क़ मैं सैकड़ों पेंच-ओ-ख़म है
गिरोगी तो ख़ुद को उठाओगी कैसे ?

कहीं हुस्न से इश्क़ टकरा गया तो
नज़र से नज़र फिर मिलाओगी कैसे ?

कभी छुप के रोना ,कभी छुप के हँसना
ज़माने से कब तक  छुपाओगी कैसे ?

अगर पास में हो न ’आनन’ तुम्हारे
तो शाने पे सर को टिकाओगी कैसे ?

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 15 अगस्त 2020

चन्द माहिए : क़िस्त 78 [ 15-अगस्त पर--]



चन्द माहिए : 15-अगस्त पर

1
यह पर्व है जन-जन का 
करना है अर्पण
अपने तन-मन-धन का

2
सौ बार नमन मेरा
वीर शहीदों को
जिनसे है चमन मेरा

3
हासिल है आज़ादी
रंग तिरंगे का 
क्यों आज है फ़रियादी ?

4
जब तक सीने में दम
झुकने मत देना
भारत का यह परचम

5
इस ध्वज का मान रहे 
लहराए नभ में
भारत की शान रहे 

-आनन्द.पाठक-

सोमवार, 10 अगस्त 2020

गीत 66 : एक प्रणय गीत --खोल कर यूँ न ज़ुल्फ़ें --

एक प्रणय गीत --

खोल कर यूँ न ज़ुल्फ़ें चलो बाग़ में
प्यार से है भरा दिल,छलक जाएगा

ये लचकती महकती हुई डालियाँ
झुक के करती हैं तुमको नमन, राह में
हाथ बाँधे हुए सब खड़े फ़ूल  हैं
बस तुम्हारे ही दीदार  की  चाह में

यूँ न लिपटा करों शाख़  से पेड़  से
मूक हैं भी तो क्या ? दिल धड़क जायेगा

एक मादक बदन और उन्मुक्त मन
बेख़ुदी में क़दम लड़खड़ाते हुए
एक यौवन छलकता चला  आ रहा
होश फूलों का कोई उड़ाते हुए

यूँ न इतरा के बल खा चला तुम करो
ज़र्रा ज़र्रा चमन का  महक जाएगा

आसमाँ से उतर कर ये कौन आ गया ?
हूर जन्नत की या अप्सरा या परी  ?
हर लता ,हर कली ,फ़ूल पूछा किए
यह हक़ीक़त है या रब की जादूगरी ?

देख ले जो कोई मद भरे दो नयन
आचमन के बिना ही बहक जाएगा

  तुमको देखा तो ऐसा लगा क्यों मुझे
ज़िन्दगी आज अपनी सफल हो गई
मन खिला जो तुम्हारा कमल हो गया
और ख़ुशबू बदन की ग़ज़ल हो गई

लाख कोशिश करूँ पर रुकेगा नहीं
दिल है मासूम मेरा भटक जाएगा ।

खोल कर यूँ न ज़ुल्फ़ें चलो बाग़ में ,-प्यार से  दिल भरा है ---

-आनन्द,पाठक--

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

ग़ज़ल 153 : दीदार-ए-हक़ में ---

बह्र  मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु---फ़ाइलातु----मफ़ाईलु----फ़ाइलुन
221   -----2121-------1221-------212
------------------
एक ग़ज़ल : दीदार-ए-हक़---

दीदार-ए-हक़ में दिल कोअभी ताबदार कर
दिल-नातवाँ को और ज़रा बेक़रार  कर

गुमराह हो रहा है भटक कर इधर उधर
इक राह-ए-इश्क़ भी है वही इख़्तियार कर

कब तक छुपा के दर्द रखेगा तू इस तरह
अब वक़्त आ गया है इसे आशकार  कर

कजरौ ! ये पैरहन भी इनायत किसी की है
हासिल हुआ है गर तुझे तो आबदार कर

हुस्न-ए-बुताँ की बन्दगी गर जुर्म है ,तो है
ऎ दिल ! हसीन  जुर्म  ये  तू बार बार कर

ऐ शेख ! सब्र कर तू , नसीहत न कर अभी
आता हूँ मैकदे से ज़रा इन्तिज़ार  कर

दुनिया हसीन है ,कभी तू देख तो सही
’आनन’ न ख़ुद को हर घड़ी तू अश्कबार कर

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ --


आशकार      = ज़ाहिर
कज रौ = ऎंठ कर चलनेवाला
पैरहन = लिबास
आबदार =चमकदार /पानीदार
हुस्न-ए-बुताँ की = हसीनों की
नासेह = नसीहत करने वाला
अश्कबार          = आँसू बहाना

गुरुवार, 2 जुलाई 2020

ग़ज़ल152 : चाहे ग़म था ,ख़ुशी थी ,कटी ज़िन्दगी---

बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालि,
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़ाइलुन  -फ़ाइलुन
21 2-------212------212-------212-

चाहे ग़म था ,ख़ुशी थी ,कटी ज़िन्दगी
लड़खड़ाती संभलती  रही ज़िन्दगी 

दाँव पर दाँव चलती रही ज़िन्दगी
शर्त हारे कभी हम ,कभी  ज़िन्दगी 

वक़्त ने कब नहीं आजमाया मुझे
साथ छोड़ी नहीं  पर कभी  ज़िन्दगी 

तेरे आदाब क्या हैं ,पता ही नहीं
आज तू ही बता दे मेरी ज़िन्दगी 

अपनी हिम्मत को हमने न मरने दिया
आंधियॊ से भी लड़ती रही ज़िन्दगी 

तेरे घर तक को जाने के सौ  रास्ते 
प्यार की राह बस चल पड़ी ज़िन्दगी

हैफ़ ! ’आनन’ तू ख़ुद से ही गाफ़िल रहा
वरना हर रंग में थी रँगी ज़िन्दगी   

-आनन्द.पाठक-


हैफ़ = अफ़सोस

सोमवार, 29 जून 2020

चन्द माहिए : क़िस्त 77

क़िस्त 77

1
जब जान ही है लेना
और तरीक़े भी
बस रूठ के हँस देना

2
तुम पर न अगर मरता
तुम ही कहों जानम
दिल आख़िर क्या करता ?


3
कुछ चाह नहीं दिल में
तुम को ही देखूँ
बस माह-ए-कामिल में

4
इक प्यार को पा लेना
जैसे काँटॊं को
पलको से उठा लेना

5
दुनिया है सियह्खाना
शर्त रही ये भी
बेदाग़ निकल आना

-आनन्द.पाठक- 

चन्द माहिए : क़िस्त 76

क़िस्त 76

1
पूछो मत सब बातें
कैसे कटती हैं
तुम बिन मेरी रातें

2
सपने तो सुला देंगे
याद तुम्हारी सब
हम कैसे भुला देंगे ?

3
वादा न निभाओगी
झूठी कसमें क्यों ?
खा कर भी न आओगी

4
तनहा तनहा रातें
कोई नहीं जिससे
कर लें दिल की बातें

5
इतने न भले हो तुम
जैसे दिखते हो
भीतर से जले हो तुम

-आनन्द.पाठक-

चन्द माहिए : क़िस्त 75

क़िस्त 75

1
क्या वस्ल की रातें थीं
और न था कोई
हम तुम थे,बातें थीं

2
बागों में बहार आई
जब जब ली तू ने
बेपरवा अँगड़ाई

3
साँसों में घुली हो तुम
सिमटी रहती हो
अबतक न खुली हो तुम

4
रौनक है महफ़िल की
एक हँसी तेरी
जीनत है हर दिल की

5
ख़ामोश निगाहों में
दर्द भरा किसने
हँसती हुई राहों में

-आनन्द पाठक-

चन्द माहिए : क़िस्त 74

क़िस्त 74

1
इक हुस्न-ए-क़यामत है
जान पे बन आई
आँखों की शरारत है

3
अब ज़ौर के क़ाबिल है
मान लिया तुम ने
मक़्रूज़ हुआ  दिल  है 


2
रुखसार पे काला तिल
लगता है जैसे
तुम से भी बड़ा क़ातिल


4
आँखों का नशा क्या है ?
जानेगा कैसे ?
जीने का मज़ा क्या है ?

5
फूलों सा बदन तेरा
उस पर से बोझिल
खुशबू का वज़न तेरा

-आनन्द पाठक-

रविवार, 28 जून 2020

चन्द माहिए : क़िस्त 73


क़िस्त 73

1
सुख दुख न ठहर पाता
चाहे जैसा हो
हर वक़्त गुज़र जाता

2
जीवन के सफ़र में ग़म
आते जाते हैं
क्यों करता आँखें  नम

3
क्या क्या न पड़ा सहना
क़ायम है लेकिन
ईमान मेरा अपना

4
ग़मनाक है क्यों ऐ दिल !
राह अलग सब की
सब की अपनी मंज़िल

5
करनी भी शिकायत क्या
तुम ने कब समझा
इस दिल की चाहत क्या