गुरुवार, 26 नवंबर 2020

चन्द माहिए : क़िस्त 84

 क़िस्त 84 ओके
1
कहने में हिचक क्या है !
यूँ न दबा रख्खो
इतनी भी झिझक क्या है !

2
जो कहनी था कह दी
समझो ना समझो
तुम बात  मेरे मन की

3
लिखने में अड़चन थी
मुझसे कह देते
मन में जो उलझन थी

4
उलफ़त का तक़ाज़ा है
धीरे से खुलता
दिल का दरवाज़ा है 

5
भँवरा तो भँवरा है
एक कली पर वो
कब रहता ठहरा है 
-आनन्द.पाठक-

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