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शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

गीत 094: 26-जनवरी गणतन्त्र दिवस

 26 जनवरी-गणतन्त्र दिवस

है मुक्त गगन, अपना विहान,
भरते रहते नित नव उड़ान ,गणतन्त्र दिवस, गणतन्त्र दिवस।

 हम नई चेतना के वाहक,
हम विश्व शान्ति के पोषक हैं
हम संविधान के निर्माता,
हम संविधान के रक्षक हैं ।

पावन है अपना संविधान,
 सबसे न्यारा सबसे महान ,गणतन्त्र दिवस, गणतन्त्र दिवस।--

जन जन की आशा का प्रतीक,
बहती विकास की धारा है
सबके इसमे अपने सपने,
यह भारत देश हमारा  है ।

भारत की रख्खे आन-बान,
नित रचा करे नव कीर्तिमान,गणतन्त्र दिवस, गणतन्त्र दिवस।---

उत्तर से लेकर दक्षिण तक,
पूरब से लेकर पश्चिम तक 
हम एक सूत्र में बँधे हुए,
अग्रिम से लेकर अन्तिम तक

नारों से गूँजे आसमान,
जय ’जय जवान’ जय  ’जय किसान, गणतन्त्र दिवस, गणतन्त्र दिवस।

-आनन्द.पाठक ’आनन’


शनिवार, 27 दिसंबर 2025

गीत 093 : आँकड़ो का खेल जारी है--

 एक नवगीत 

2122---2122--2 =16

आँकड़ों का खेल जारी है, सच दबा है, झूठ भारी है ।

भीड़ देखी हो गए गदगद

तालियों की भीख माँगे हैं ।

रोशनी चुभती उन्हे हरदम

पास उनके सौ बहाने हैं ।

भाषणों में नौकरी तो है, अस्ल में बेरोजगारी है ।

आँकड़ों का खेल जारी है ------


हाथ जोड़े आ रहे है हो जो

सर झुका कर ’वोट’ माँगोगे ।

सैकड़ों सपने दिखा कर तुम’

बाद सब कुछ भूल जाओगे ।

वायदों पर वायदे करना, भूलना आदत तुम्हारी है ।

आँकड़ों का खेल जारी है ------


मुफ़्त की है रेवड़ी सबको,

एक धेला भी नहीं देना ।

बात लाखों की, हज़ारों की

बस उन्हे तो ’वोट’ है लेना।

बात में जादूगरी उनकी, सोच में भी होशियारी है ।

आँकड़ों का खेल जारी है ------


-आनन्द.पाठक ’आनन’-


गुरुवार, 21 अगस्त 2025

गीत 092 : स्वर्ग यहीं है, नर्क यहीं है-

 गीत 092 : स्वर्ग यहीं है, नर्क यहीं है

स्वर्ग यहीं है , नर्क यहीं है
बाक़ी सव प्रवचन की बातें ।

            मोह पाश में जकड़ा प्राणी
            तीरथ तीरथ घूम रहा है ।
            मन की व्यथा प्रबल है इतनी
            पत्थर पत्थर चूम रहा है ।
मन के अंदर ज्योति जगा ले
कट जाएँगी काली  रातें ।

            एक भरोसा रख तो मन में ,
            क्यों रखता है मन में उलझन ?
             वह तेरा आराध्य अगर है
            फिर क्यों रहता है विचलित मन।
जीवन है तो आएँगे ही
आँधी, तूफ़ाँ झंझावातें ।

            सुख दुख तो जीवन का क्रम है
            उतरा करते हैं आँगन में ।
            कभी अँधेरा , कभी उजाला ,
            नदियाँ भी सूखीं  सावन में ।
अपना अपना दर्द सभी का
अपनी अपनी हैं सौगातें ।

-आनन्द.पाठक- 

शुक्रवार, 30 मई 2025

गीत 091 : चंदन वन की शीतल मंद सुगंध हवाएँ

 गीत 091: चंदन वन की शीतल मंद सुगंध हवाएँ


चंदन वन की शीतल मंद सुगन्ध हवाएँ
वातायन तक आती हैं तो आने दो ।

        उपवन उपवन फूल खिलेंगे हर घर में
        सत्कर्मों सदभावों से जब सीचोंगे ।
        फिर बसंत हरियाली लेकर आएगा
        जब नफ़रत के बीज नहीं तुम बोओगे।

 
नील गगन में  मुक्त कंठ से सोन चिरैया
गीत प्रेम का गाती है तो गाने दो ।

        हर मन में इक प्यास अधूरी रहती है
        जीने को मिल जाता एक सहारा है ।
        आजीवन बेचैन रहा करता है मन 
        ढूँढा करता अपना एक किनारा है ।

मत रोको इन  चंचल बहती नदियों को तुम
सागर से मिलने को जाती, जाने दो ।

        आज नही तो कल मौसम बदलेगा ही
        सूरज की किरणे प्राची से  निकलेंगी 
        छँटना है दुख का अँधियारा, सत्त्य यही
        नई हवा से नई फ़िज़ाएँ बदलेंगी ।


आसमान को नापेंगे ज़ाँबाज परिंदे
उड़ने को तैयार, इन्हें उड़ जाने दो ।

-आनन्द.पाठक-

इस गीत को मेरे यू-ट्यूब्चनेल चैनेल आवाज़ का सफ़र में सुने--






रविवार, 16 फ़रवरी 2025

गीत 090: बादलों के पंख पर

 गीत 090 : बादलों के पंख पर ---
2122---2122---2122---2122

बादलों के पंख पर मैं जब प्रणय के गीत लिखता
काल की निष्ठुर हवाएँ, क्यों मिटा देती हैं हँस कर

अब तो यादें शेष हैं बस, उन सुखद बीते दिनों की
जब कभी हम-तुम मिला करते थे मधुमय चाँदनी में
पूछती हैं अब लताएँ जो कभी साक्षी बनी थी 
" क्या हुई थी बात तुमसे उन दिनों की यामिनी में ?"

आशियाने पर ही मेरे क्यॊ गिरा करती है बिजली
हादिसे क्यों साथ मेरे ही हुआ करते हैं अकसर ।

क्यों नहीं भाता जगत को प्रेम की भाषा मनोहर
क्यों हमेशा देखता है प्रेम को दूषित नयन से ।
डाल पर बैठे हुए जब दो विहग दुख बाँटते हैं
सोचने लगती है दुनिया क्या न क्या अपने ही मन से

आँधियों से जूझ कर जब आ गई कश्ती किनारे
लोग साहिल पर खड़े क्यों हाथ में ले ईंट-पत्थर ।

छोड़ कर जब से गई तुम कुछ कहे बिन, कुछ सुने बिन
फिर न उसके बाद कोई स्वप्न जागा, चाह जागी
शून्य में जब ढूँढता हूँ मैं कभी चेहरा तुम्हारा
दूर तक जाती नज़र है, लौट कर आती अभागी ।

रात की तनहाइयों में जब कभी तुमको पुकारा
साथ देने आ गए तब चाँद-तारे भी उतर कर ।
बादलों के पंख पर जब----

-आनन्द.पाठक-


सोमवार, 16 दिसंबर 2024

गीत 89 : नव वर्ष 2025 --स्वागतम गीत

 
नव वर्ष 2025 --स्वागतम गीत
122---122---122---122

उमीदों भरा यह नया वर्ष आया 
नए वर्ष का स्वागतम  गीत गाएँ

विगत वर्ष के जो अधूरे सपन हैं
उन्हे हौसलों के नए पंख देंगे ।
किसी भी तरह की कमी रह गई थी
उन्हे पूर्ण करने की कोशिश करेंगे।

नया है सवेरा, प्रथम नव किरण से
नए स्वप्न फिर से चलो हम सजाएँ ।

नई मंज़िलों का नया लक्ष्य साधें
करें आज प्रण हम नई भावना से।
नियति मान कर बैठ जाना नहीं है
बदलनी नियति है सतत साधना से।

मिटाना अँधेरा, निराशा अगर है
हृदय में सदा ज्योति पावन जलाएँ ।

अनागत क्षणों में विजय श्री निहित है
उन्हे सत्प्रयासों से है प्राप्त करना ।
चलो आज संकल्प लेते हैं मिल कर
हमें है सदा सत्य की राह चलना ।

सभी जन के अंदर अतुल शक्तियाँ हैं
उन्हे हम नए वर्ष में फिर जगाएँ ।

नए वर्ष में ना करे ’युद्ध’ कोई 
सभी हों सुखी, चैन की ज़िंदगी हो।
न नफ़रत, न इर्ष्या, न कल्मष हॄदय में
दया की, क्षमा प्रेम की रोशनी हो ।

नए वर्ष के इस सुखद आगमन पर
अहिंसा का संदेश जग को सुनाएँ
नए वर्ष का स्वागतम गीत गाएँ ।
-आनन्द.पाठक-

मंगलवार, 3 सितंबर 2024

गीत 88 : इससे पहले कि हम रोशनी से जलें--

  गीत 88: गीत 14 [ अभी संभावना है ]

इससे पहले कि हम  रोशनी से जलें,’आदमी’ तो जगा आदमी में ।

आदमी से अजनबी हुआ आदमी
रंग के भेद में रंग गया आदमी ।
काल गोरे हो तन पर लहू एक रंग
जात और पात में बँट गया आदमी ।

इससे पहले कि हम धर्म अधूरा पढ़ें,"ढाई आख़र" पढ़े आख़िरी में ।

आदमी है खड़ा लेकर ’परमाणु-बम्ब’
आदमी बन गया साँप का तन-बदन ।
हर ज़हर से ज़हरीला हुआ आदमी 
आदमी बन गया एक सीलन घुटन ।

इससे पहले कहीं हम-नस्ल ना बचे, ’गाँधी-गौतम’ बचा आदमी ।

आदमी को निगलता हुआ आदमी
आदमी से उबलता हुआ आदमी ।
आदमी आदमी से परेशान है -
अग्नि-शलाका उगलता हुआ आदमी ।

इससे पहले कि हम पर अँधेरा हँसे, रोशनी तो जगा आदमी में ।

’गाँधी’ वह जो मिटे आदमी के लिए
’सुकरात’ वह जो ज़हर के प्याले पिए
आदमी ने ही सूली चढ़ाया उसे -
आदमी जो जिया आदमी के लिए ।

इससे पहले कि फिर कोई सूली चढ़े, एक "ईशा" जगा आदमी में ।
इससे पहले कि हम  रोशनी से जलें,’आदमी’ तो जगा आदमी में ।
-आनन्द.पाठक-



गीत 87 : वह नई रोशनी की फिर से बातें करते है --

 

गीत 87 [ अभी संभावना है]


वह नई रोशनी की फिर से  बातें करते हैं
मैं एक अँधेरा तब से अब तक भोग रहा हूँ ।

गलियों गलियों नुक्कड़ नुक्कड़ चौराहों पर
’सम्पूर्ण क्रान्ति" का नारा हमसे लगवाएँगे ।
पुन: सुनहले स्वप्न दिखा सूनी आँखों  में
सिंहासन सत्ता का हमसे हिलवाएँगे ।

तार तार हो गई मेरी विश्वास चदरिया
मैं पेबन्द पेबन्द तब से अब तक जोड़ रहा हूँ।

हम आज तलक है  खड़े उन्हीं चौराहों पर
कल हमे अकेला छोड़ कि "दिल्ली’ चले गए ।
सब सत्ता के बँटवारे  में आसक्त रहे 
                  कितने वर्षों हम उनके हाथों छले गए ।

वह आश्वासन का बोझ सौंप आश्वस्त हुए
मैं टुकड़ा-टुकड़ा अब तक जीवन जोड़ रहा हूँ ।

हर कोई एक मशाल लिए अपने हाथों में
" जे0पी0 बनने का दम्भ लिए फिरता रहता है।
हर रथी यहाँ अब स्वयं सारथी बन बैठा
हर नेता खुद को महारथी सोचा करता ।

वह शहर शहर में अश्वमेध की बातें करता
मैं बलिवेदी की तब से अब तक सोच रहा हूँ।


-आनन्द.पाठक-


मंगलवार, 13 अगस्त 2024

गीत 86[10] : जन्म दिन पर

 गीत 86 [10] : जन्म दिन पर--

जन्म दिन पर आज जीवन को नया आयाम दे दो ।

पुष्प बन विहसों कि तुम नवगंध बिखरे
हर बरस मंगलमय़ी व्यक्तित्व  निखरे ।

जन्म दिन की शुभ घड़ी, कोई नी पहचान दे दो ।
जन्म-दिन पर आज जीवन को--

आज पावन पर्व पर शुभकामनाएं~
’खुश रहो प्रिय !’ -बस यही है भावनाएँ ।

गीत अनगाए हमारे हो सके स्वरदान दे दो ।
जन्म-दिन पर आज जीवन को--

मधुर स्मृति सौंप कर इक वर्ष बीता 
संकल्प आगत औ’ अनागत कौन जीता?

आज यह संक्रान्ति क्षण को इक नया सा नाम दे दो ।
जन्म-दिन पर आज जीवन को--
-आनन्द.पाठक-

सोमवार, 25 मार्च 2024

गीत 85[09] : प्यास ही मर गई जब भरी उम्र में--

गीत 85[09] : प्यास ही मर गई जब

प्यास ही मर गई जब भरी उम्र में,
अब ये बादल भी बरसे न बरसे तो क्या !

उम्र भर है चला जो कड़ी धूप में
जिंदगी भर सफर का रहा सिलसिला
जिसको मंज़िल मिली ही नहीं आजतक
ख़ुद से करता भला वह कहाँ तक गिला

प्यार की छाँव जिसको मिली ही नहीं
बाद साया किसी का मिले भी तो क्या !

ज़िंदगी के सवालात थे सैकड़ों
जितना सुलझाया, उतनी उलझती गई
चन्द ख़ुशियाँ रहीं तितलियों की तरह 
और पीड़ा,  मेरे घर  ठहरती  गई  ।

दर्द की जब नदी में उतर ही गया
पार कश्ती लगे ना लगे भी तो क्या !

राह सबकी अलग सबकी मंज़िल अलग
कोई बैसाखियों से चला उम्र भर ।
पालकी भी किसी को न रास आ सकी
राह काँटों भरी , मैं चला उम्र भर ।

पाँव के आबलों में कहानी मेरी
लोग चाहे पढ़ें ना पढ़ें भी तो क्या !

    जो सफर मे रहेगा, गिरेगा वही
   खाट पर है जो लेटा वो गिरता कहाँ
    फूल खिलते वहीं दीप जलते वहीं
     खून बन कर पसीना है गिरता जहाँ

वाह की, दाद की क्या जरूरत उसे
मिल गया, मिल गया ना मिला भी तो क्या




-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 8 मार्च 2024

गीत 84[08]: फिर चुनाव का मौसम आया

 चुनावी गीत 84[08]

रंग बदलते नेताओं को ,देख देख गिरगिट शरमाया।
फिर चुनाव का मौसम आया ।

पलटी मारी, उधर गया था, पलटी मारी इधर आ गया
’कुर्सी’ ही बस परम सत्य है, जग मिथ्या है' समझ आ गया'

देख गुलाटी कला ’आप’ की, मन ही मन बंदर मुस्काया।
फिर चुनाव का मौसम आया ।

वही तमाशा दल बदली का, दल बदले पर दिल ना बदला
बाँट रहे हैं मुफ़्त ’रेवड़ी’, सोच मगर है गँदला ,गँदला ।

वही  घोषणा पत्र पुराना, पढ़ पढ़ जनता को भरमाया ।
फिर चुनाव का मौसम आया ।

आजीवन बस खड़ा रहेगा, अन्तिम छोर खड़ा है ’बुधना’
हर दल वाले बोल गए हैं, - "तेरा भी घर होगा अपना "

जूठे नारों वादों से कब किसका पेट भला भर पाया।
फिर चुनाव का मौसम आया ।

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

गीत 83 [07] : शरण में राम की आना [ भाग 2]

 

गीत 83 [07] : शरण में राम की आना---[भाग 2

कटॆ जब आस की डोरी, बिखर जाएँ सभी सपने
जीवन में हो कुछ पाना, शरण में राम की आना ।

जहाँ आदर्श की बातें, 
सनातन धर्म का प्रवचन
तुम्हारे सामने होगा-
प्रभु श्री राम का जीवन

स्वयं में राम को ढूँढो, विजय श्री प्राप्त होने तक
झलक श्री राम की पाना, शरण में राम की आना ।

वचन कैसे निभाते हैं,
कि क्या होती है मर्यादा
राजसी ठाठ को तज कर 
जिया जीवन सदा सादा ।

अगर कुछ सीखना तुमको कि जीने का तरीका क्या
स्वयं में राम दुहराना ,शरण में राम की आना ।

परीक्षा माँ सिया ने दी
प्रतीक्षा उर्मिला ने की
भरत ने राज आसन पर
प्रभू की पादुका रख दी ।

तपस्या त्याग क्या होती ,भरत सा आचरण करना।
समझ आए. समझ जाना, शरण में राम की आना

-आनन्द.पाठक-

गीत 082[01] -V: सरस्वती वंदना [2024]

 
गीत 082 [01] : सरस्वती वंदना

जयति जयति माँ वीणापाणी ,
मन झंकृत कर दे, माँ भारती वर दे !

तेरे द्वारे खड़ा अकिंचन. भक्ति भाव से है पुष्पित मन,
‘ सुर ना जानू, राग न जानू और न जानू पूजन अर्चन !
कल्मष मन में घना अँधेरा. ज्योतिर्मय कर दे,
माँ भारती वर दे !

छन्द छन्द माँ तुझे समर्पित, राग ताल से हो अभिसिंचित
जब भी तेरे गीत सुनाऊँ , शब्द शब्द हो जाएँ हर्षित ।
अटक न जाए कहीं रागिनी, स्वर प्रवाह भर दे ।
माँ भारती वर दे !

’सत्यम शिवम सुन्दरम ’-लेखन,बन जाए जन-मन का दरपन
गूँगों की आवाज़ बने माँ, क़लम हमारी करे नव-सॄजन  ।
शक्ति स्वरूपा बने लेखनी, शक्ति पुंज भर दे ।
माँ भारती वर दे !

मैं अनपढ़ माँ, अग्यानी मन, हाथ जोड़ कर, करता आवाहन,
गीत ग़ज़ल के अक्षर अक्षर तेरे हैं माँ तुझको अर्पन !
चरण कमल में शीश झुकाऊँ, भक्ति प्रखर कर दे।
माँ भारती वर दे ! 

-आनन्द.पाठक-
इस वंदना को मेरे स्वर में सुनें


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बुधवार, 10 जनवरी 2024

गीत 81[06] : शरण में राम की आना [ भाग-1]


1222---1222---1222---1222
श्री रामलला की  प्रतिष्ठा [ 22 जनवरी ] के पावन अवसर पर--श्री राम लला के पावन चरणों मे 
 एक अकिंचन भेंट ------

एक गीत 81[06]

उदासी मन  पे जब छाए , अँधेरा फैलता जाए ,
तनिक भी तुम न घबराना. शरण में राम की आना।

करें जब राम का सुमिरन
कटे बंधन सभी ,प्यारे !
हृदय में ज्योति जग जाए
लगें सब लोग तब न्यारे ।

अकेला मन भटक जाए, समझ में कुछ नही आए,
सही जब राह हो पाना, शरण में राम की  आना ।

राम के नाम की महिमा,
सदा नल-नील ने जानी ,
कि तरने लग गए पत्थर
झुका सागर भी अभिमानी

अहम जब सर पे चढ़ जाए, सभी बौने नज़र आएँ
पड़े तुमको न पछताना, शरण में राम की आना ।

जगत इक जाल माया का,
फँसा रहता तू जीवन भर
कभी तो सोच ऎ प्राणी !
है करना पार भव सागर ।

जगत जब तुमको भरमाए, कि माया तुमको ललचाए
धरम को भूल मत जाना, शरण में राम की  आना ।

-आनन्द.पाठक-

मंगलवार, 31 अक्टूबर 2023

गीत 80 [05]: ज्योति का पर्व है आज दीपावली

 गीत 80 [05]: दीपावली पर एक गीत

ज्योति का पर्व है आज दीपावली
हर्ष-उल्लास से मिल मनाएँ सभी

’स्वागतम’  में खड़ी अल्पनाएँ मेरी
आप आएँ सभी मेरी मनुहार पर
एक दीपक की बस रोशनी है बहुत
लौट जाए अँधेरा स्वयं  हार कर

जिस गली से अँधेरा गया ही नहीं
उस गली में दिया मिल जलाएँ सभी

राह भटके न कोई बटोही कहीं
एक दीपक जला कर रखो राह में
ज़िंदगी के सफ़र में सभी हैं यहाँ 
                एक मंज़िल हो हासिल इसी चाह में

खिल उठे रोशनी घर के आँगन में जब
फिर मुँडेरों पे दीए सजाएँ  सभी ।

आग नफ़रत की नफ़रत से बुझती नहीं,
आज बारूद की ढेर पर हम खड़े ।
युद्ध कोई समस्या का हल तो नहीं,
व्यर्थ ही सब हैं अपने ’अहम’ पर अड़े ।

आदमी में बची आदमियत रहे ,
प्रेम की ज्योति दिल में जगाएँ सभी।

स्वर्ग से कम नहीं है हमारा वतन,
आँख कोई दिखा दे अभी दम नहीं ।
साथ देते हैं हम आख़िरी साँस तक,
बीच में छोड़ दें हम वो हमदम नहीं ।

देश अपना हमेशा चमकता रहे ,
दीपमाला से इसको सजाएँ सभी ।
-आनन्द.पाठक-

रविवार, 20 अगस्त 2023

गीत 79 [04] : मिले पुराने यार हमारे, [ थीम सांग]

 
गीत 79 [04]
यह थीम सांग--[ Jab We Mer -UOR-77]
 मेरे रूड़की विश्वविद्यालय के 
’अलुमिनी मीट रूड़की" 2023 के अवसर पर पुराने मित्रों 
के आग्रह पर लिखा गया था ।
---------

मिले पुराने यार हमारे, झूमें नाचें गाएँ
वो भी दिन थे क्या मस्ती के, आज वही दुहराएँ
जम कर धूम मचाएँ, याराँ ! जम कर धूम मचाएँ

गंग नहर की लहरों में है अब भी वही जवानी
हम यारों में अब भी बाक़ी मस्ती और जवानी
कभी चाँदनी रात बिताई ’सोलानी’ क तट पर
मिल कर बैठेंगे, बाँटेंगे , यादें और कहानी ।

आसमान भी छोटा होगा उड़ने पर आ जाएँ
जम कर धूम मचाएँ, याराँ ! जम कर धूम मचाएँ

’रुड़की’ से जब निकले हम सब घर-संसार बसाए
बेटा-बेटी पढ़ा लिखा कर ,सच की राह लगाए
अब उनकी अपनी दुनिया है, मेरे संग देवी जी
बाक़ी बची ज़िंदगी अपनी हँसी-खुशी कट जाए

उतर गए जब बोझ हमारे मिल कर खुशी मनाएँ
जम कर धूम मचाएँ, याराँ ! जम कर धूम मचाएँ

सबकी अपनी मंज़िल, सबके नए सफ़र थे
जीवन की आपा-धापी में जाने किधर किधर थे
मुक्त गगन के पंछी अब हम, आसमान अपना है
कल तक हम सबके हिस्से थे , सबके नूर नज़र थे

वक़्त आ गया यारों के संग मिल कर समय बिताएँ
जम कर धूम मचाएँ, याराँ ! जम कर धूम मचाएँ

कभी कभी ऐसा भी होता, मन फ़िसला, सँभला है
कितनी बदल गई है ’रुड़की’, रंग नही बदला है
शान हमारी क्या थी क्या है मत पूछो यह प्यारे
हर इक साथी  ’रुड़की वाला’, नहले पर दहला है

इन हाथों के हुनर हमारे, दुनिया को दिखलाएँ
जम कर धूम मचाएँ, याराँ ! जम कर धूम मचाएँ
-आनन्द पाठक-

गीत 78[03] : सजनी ! तुम रनिंग कमेन्टरी हो


गीत 78[03] : एक हास्य गीत

सजनी ! तुम रनिंग कमेन्टरी हो दो पल को शान्त न होती हो ।

जब तुम हँसना शुरू कर दो, ’सिद्धू’ पा की हस्ती क्या
जब तुम ’बकना’ शुरु कर दो, छक्का लगने की मस्ती क्या
है कौन जो आऊट हो न सके, स्पीनिंग’ चाल तुम्हारी हो
जब ’किट्टी पार्टी ’ करती हो तो घर क्या है गॄहस्थी क्या ।

मेरे पेन्शन का कैश झपट, मुझे  ’कैच आउट’ कर देती हो ।
सजनी ! तुम रनिंग कमेन्टरी हो ---

तेरे बेलन का एक प्रहार ज्यों धोनी की बल्लेबाजी
मेरा गंजा सर ’बाल’ समझ. कुछ ठोंक गई बेलनबाजी
क्या होगी कही ’क्रिकेट’ जगत में तेरी मेरी जैसी जोड़ी
मेरा दौड़ दौड़ कर ’रन’ लेना, तेरी उचक,उचक ’कलछुल’ बाजी

मैके जाने की धमकी से,मुझे ’क्लीन बोल्ड’ कर देती हो ।
सजनी ! तुम रनिंग कमेन्टरी हो ----

क्या भगवन ऐसे पाप किए जो सास बनी है ’अम्पायर’
जीवन की गाड़ी चली कहाँ ,जब चारो पंचर हो ’टायर’
हम मैच में मैं ’इंजर्ड’ हुआ. हर ’इनिंग’ जीत हुई तेरी
तेरी फ़ील्डिंग’ तेरी ’बैटिंग’ क्यों मार रही ’कट-स्कवायर"

अपने गुस्से का रुप दिखा, घर से बाहर कर देती हो
सजनी ! तुम रनिंग कमेन्टरी हो -----
-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 12 अगस्त 2023

गीत 077[02] :जगह जगह है मारा-मारी,

 

एक गीत 077[ 02]

जगह जगह है मारा मारी, अब चुनाव की है तैयारी,

चूहे-बिल्ली एक मंच पर
साँप-छछूंदर इक कोटर मे
जब तक चले चुनावी मौसम
भगवन दिखें उन्हें वोटर में ।
नकली आँसू ढुलका ढुलका  , जता रहें हैं दुनियादारी
जगह जगह है मारा मारी----

मुफ़्त का राशन, मुफ़्त की ”रेवड़ी’
मुफ़्त में बिजली, मुफ़्त में पानी
"कर्ज तुम्हारा हम भर देंगे-"
झूठों की यह अमरित बानी ।
बात निभाने की पूछो तो, कह देते -" अब है लाचारी"
जगह जगह है मारा मारी

नोट-वोट की राजनीति में, 
आदर्शों की बात कहाँ है ?
धुआँ वहीं से उठता दिखता
रथ का पहिया रुका जहाँ है ।
ऊँची ऊँची बातें उनकी, उल्फ़त पर है नफ़रत भारी
जगह जगह है मारा मारी

नया सवेरा लाने निकले
गठबन्धन कर जुगनू सारे
अपने अपने मठाधीश की
लगा रहे है सब जयकारे
इक अनार के सौ बीमार हैं, गठबंधन की है दुश्वारी
जगह जगह है मारा मारी

सूरज का रथ चले रोकने
धमा-चौकड़ी करते तारे
झूठे नारे वादे लेकर --
साथ हो लिए हैं अँधियारे
वही ढाक के तीन पात है, जनता बनी रही दुखियारी
जगह जगह है मारा मारी, अब चुनाव की है तैयारी
-आनन्द पाठक-
-

मंगलवार, 29 नवंबर 2022

गीत 76: कौन यह निर्णय करेगा --

 गीत 76
2122---2122--2122

कौन यह निर्णय करेगा ?
कौन किसको दे गया है वेदनाएँ ।

कल तलक थे एक दूजे के लिए हम
       अब न वो छाया, न वो परछाइयाँ हैं 
वक़्त ने कुछ खेल ऐसा कर दिया है
एक मैं हूँ साथ में तनहाइयाँ हैं ।

कौन सुनता है किसी की,
ढो रहे हैं सब यहाँ अपनी व्यथाएँ

हर तुम्हारी शर्त को मैने निभाया
जो कहा तुमने वो मैने गीत गाया
बादलों के पंख पर संदेश भेंजे-
आजतक उत्तर मगर कोई न आया ।

क्या कमी पूजन विधा में-
क्यों नहीं स्वीकार होती अर्चनाएँ?

साथ रहने की सुखद अनुभूतियाँ थीं
याचना थी, चाहतें थीं. कल्पना थी
ज़िंदगी के कुछ सपन थे जग गए थे
प्रेम में था इक समर्पण, वन्दना थी।

कल तलक था मान्य सब कुछ
आज सारी हो गईं क्यों वर्जनाएँ ?

चाँद से भी रूठती है चाँदनी क्या !
फूल से कब रूठती है गंध प्यारी !
कुछ अधूरे स्वप्न है तुमको बुलाते
मान जाओ, भूल जाओ बात सारी

कह रहा है मन हमारा
लौट आने की अभी संभावनाएँ
कौन यह निर्णय करेगा .कौन किसको दे गया है वेदनाएँ ?
-आनन्द.पाठक-



शनिवार, 30 जुलाई 2022

गीत 75 : हर घर पर लहराए तिरंगा----[ 15-अगस्त 22 पर]

 एक गीत -15 अगस्त पर-
हर घर पर लहराए तिरंगा------

भारत माँ की शान तिरंगा, हर घर पर लहराए
विश्व शान्ति ,बलिदान त्याग का नव संदेश सुनाए

जन-गण-मन का प्रान तिरंगा
हम सब की पहचान तिरंगा
प्राण निछावर करने वालों-
का करता सम्मान  तिरंगा

हिमगिरि से भी ऊँची जिसकी कीर्ति-पताका जग में
’सत्यमेव जयते’- का निश दिन मंत्र सदा दुहराए 

इस झंडे के तले लड़े हम
चट्टानों से रहे खड़े हम
सत्य, अहिंसा, आदर्शों पर
नैतिकता पर रहे अड़े हम
 
इस झंडे का हम मान रखें, संकल्प यही करना है
आँच न इसपर आने पाए ,प्राण भले ही जाए

वीरों ने हुंकार भरा है 
दुश्मन का दिल सदा डरा है
आगे आगे ध्वजा हमारी
फिर पीछे जयघोष हुआ है

इस झंडे की मर्यादा में आन-बान की खातिर
हँसते हँसते वीर शहीदो ने है प्राण गँवाए

केसरिया रंग त्याग सिखाता
श्वेत- शान्ति का अनुपम नाता
हरा रंग मानो भारत की
समृद्धि का गीत सुनाता

तीन रंग से बना तिरंगा मेरा झंडा न्यारा
मानवता का पाठ पढ़ाए, राह नई दिखलाए

        गाँधी जी का त्याग भी देखा
        ’जलियाँवाला बाग’ भी देखा
        लाल रंग से रहे खेलते -
        वीरों का वह फाग भी देखा
      
 वीरॊं के बलिदानों का यह देता सदा गवाही
अमर रहे यह झंडा मेरा, कभी न झुकने पाए
भारत माँ की शान तिरंगा हर घर पर लहराए
-आनन्द.पाठक-