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मंगलवार, 11 अप्रैल 2023

ग़ज़ल 324[89ई] : इबादत में मेरी कहीं कुछ कमी है

 ग़ज़ल 324[89]
122---122---122---122


इबादत में मेरी कहीं कुछ कमी है
निगाहों में क्यों दिख रही बेरुखी है

तेरी शख़्सियत का मैं इक आइना हूँ
तो फिर क्यों अजब सी लगे ज़िंदगी है

नहीं प्यास मेरी बुझी है अभी तक
अजल से लबों पर वही तिश्नगी है

यक़ीनन नया इक सवेरा भी होगा
नज़र में तुम्हारी अभी तीरगी  है

बहुत दूर तक देख पाओगे कैसे
नहीं दिल में जब इल्म की रोशनी है

तुम आओगे इक दिन भरोसा है मुझको
उमीदो पे ही आज दुनिया टिकी है 

ये मुमकिन नहीं लौट जाऊँ मै ’आनन’
ये मालूम है इश्क़ ला-हासिली है ।

-आनन्द.पाठक-
अजल = अनादि काल से
ला-हासिली =निष्फल
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सोमवार, 10 अप्रैल 2023

ग़ज़ल 322(87E): न आए , तुम नहीं आए बहाना क्या !

ग़ज़ल 322(87E)

1222--------1222------1222

न आए , तुम नहीं आए, बहाना क्या
गिला शिकवा शिकायत क्या सुनाना क्या

कभी तोड़ा नही वादा लब ए दम तक
ये दिल की बात है अपनी बताना क्या

नफा नुकसान की बातें मुहब्बत में
इबादत मे तिजारत को मिलाना क्या

हसीं तुम हो, खुदा की कारसाजी है
तो फिर पर्दे मे क्यों रहना, छुपाना क्या

भरोसा क्यों नहीं होता तुम्हे खुद पर
मुहब्बत को हमेशा आजमाना क्या 

अगर तुमने नहीं समझा तो फिर छोड़ो
हमारा दर्द समझेगा जमाना क्या  

अगर दिल से नहीं कोई मिले 'आनन'
दिखावे का ये फिर मिलना मिलाना क्या 

-आनन्द पाठक-
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रविवार, 9 अप्रैल 2023

गजल 323(88E) निगाहों ने निगाहों से कहा

1222  1222   1222   1222
गजल 323(88E)

निगाहों ने निगाहों से कहा क्या था, खुदा जाने
कभी जब सामना होता लगे हैं अब वो शरमाने

 मिले दो पल को राहो में झलक क्या थी क़यामत थी
ये दिल मक्रूज है उनका  वो ख्वाबों मे लगे आने

नही मालूम है जिनको, मुहब्बत चीज क्या होती
वही तफसील से हमको लगे हैं आज  समझाने

इनायत आप की गर हो भले कागज की कश्ती हो
वो दर्या पार कर लेगी कोई माने नही माने
  
ये जादू है पहेली है कि उलफत है भरम कोई
कभी लगते हैं वो अपने कभी लगते है बेगाने

बड़ी मुशकिल हुआ करती, मैं जाऊँ तो किधर जाऊँ
तुम्हारे घर की राहों मे हैं मसजिद और मयखाने

अगर दिल साफ हो अपना तो पोथी और पतरा क्या
कि सीधी बात भी 'आनन' लगे हो और उलझाने

-आनन्द पाठक-
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शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

ग़ज़ल 321 [86इ] तुम्हारे चाहने से क्या हुआ है

ग़ज़ल  321[86इ] 

 1222---1222----122


तुम्हारे चाहने से क्या हुआ है
जो होना था वही होकर रहा है

बहुत रोका कि ये छलके न आँसू
हमारे रोकने से कब रुका है

भँवर में हो कि तूफाँ में सफीना
हमेशा मौज़ से लड़ता रहा है

हवाएँ साजिशें करने लगीं अब
चमन शादाब मुरझाने लगा है

हमारे हाथ में ताक़त क़लम की
तुम्हारे हाथ में खंज़र नया है

दरीचे खोल कर देखा न तुमने
तुम्हे दिखती उधर कैसी फ़ज़ा है

उजाले क्यों उन्हें चुभते हैं ’आनन’
अँधेरों से कोई क्या वास्ता  है ?

-आनन्द.पाठक-

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सोमवार, 3 अप्रैल 2023

गज़ल 320(85E) : गर्म आने लगी है हवाएँ इधर

गजल 320(85)
212---212---212---212

गर्म आने  लगीं है हवाएँ इधर
'कुछ जली बस्तियाँ' कल की होगी खबर

चल पड़े लीडराँ रोटियाँ सेंकने
सब को आने लगी अब है कुर्सी नजर

आग की यह लपट कब हैं पहचानतीं
यह है 'जुम्मन' का घर या 'सुदामा' का घर

लोग गुमराह करते रहेंगे तुम्हे
उनकी चालों से रहता है क्यों बेखबर

अपने मन का अँधेरा मिटाया नहीं
चाहते हो मगर तुम नई इक सहर

प्यार की बात क्यों लोग करते नहीं
 चार दिन का है जब जिंदगी का सफर

अपनी ग़ज़लों में 'आनन' मुहब्बत तो भर
तेरे नग़्मों का होगा कभी तो असर ।

- आनन्द पाठक-

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ग़ज़ल 319(84) : वो माया जाल फैला कर

ग़ज़ल 319(84)
1222---1222---1222---1222

वो माया जाल फैला कर जमाने को है भरमाता
हक़ीक़त सामने जब हो, मै कैसे खुद को झुठलाता

जिसे तुम सोचते हो अब कि सूरज डूबने को है
जो आँखें खोल कर रखते नया मंजर नजर आता

मै मह्व ए यार मे डूबी हुई खुद से जुदा होकर
लिखूँ तो क्या लिखूँ दिल की उसे पढ़ना नही आता

अजब दीवानगी उसकी नया राही मुहब्बत का
फ़ना है आखिरी मंजिल उसे यह कौन समझाता

मसाइल और भी तो हैं मुहब्बत ही नहीं केवल
कभी इक गाँठ खुलती है तभी दूजा उलझ जाता

दबा कर हसरतें अपनी तेरे दर से गुजरता हूँ
सुलाता ख़्वाब हूँ कोई, नया कोई है जग जाता

वही खुशबख्त है 'आनन' जिसे हासिल मुहब्बत है
नहीं हासिल जिसे वह दिल खिलौनों से है बहलाता

-आनन्द पाठक-
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मंगलवार, 28 मार्च 2023

गजल 318(83E) :फेंक कर जाल बैठे मछेरे यहाँ

 गजल 318( 83 E)

212---212---212---212

फेंक कर जाल बैठे मछेरे यहाँ
बच के जाएँ तो जाएँ मछलियाँ कहाँ

 ग़ायबाना सही एक रिश्ता तो है
जब तलक है यह क़ायम जमी-आस्माँ

मैं जुबाँ से भले कह न पाऊँ कभी
मेरे चेहरे से होता रहेगा बयाँ

प्यास दर्या की ही तो नहीं सिर्फ है
क्यों समन्दर की होती नही है अयाँ

वस्ल की हो खुशी या जुदाई का गम
जिंदगी का न रुकता कभी कारवाँ

सैकडो रास्ते यूँ तो मक़सूद थे
इश्क का रास्ता ही लगा जाविदाँ

जानता है तू 'आनन' नियति है यही
आज उजाला जहाँ कल अंँधेरा वहाँ


-आनन्द पाठक-

शब्दार्थ

ग़ायबाना  =अप्रत्यक्ष

मक़सूद =अभिप्रेत

जाविदाँ  = नित्य, शाश्वत

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रविवार, 26 मार्च 2023

ग़ज़ल 317 [82इ] : ख़त अधूरा लिखा उसका पूरा हुआ

 ग़ज़ल 317/82


212---212---212---212


ख़त अधूरा लिखा उसका पूरा हुआ

आँसुओं से कभी जब वो गीला हुआ


पढ़्ने वाले ने पढ़ कर समझ भी लिया

दर्द वह भी जो  खत में न लिख्खा हुआ


आप झूठी शहादत ही बेचा किए

यह तमाशा कई बार देखा हुआ


शोर ही शोर है बेसबब हर तरफ
कौन सुनता है किसको सुनाना हुआ


हर कली बाग़ की आज सहमी हुई

ख़ौफ़ का एक साया है फैला हुआ


अब परिन्दे भी जाएँ तो जाएँ कहाँ

साँप हर पेड़ पर एक बैठा हुआ


तुम भी ’आनन’ हक़ीक़त से नाआशना

सब की अपनी गरज़ कौन किसका हुआ


-आनन्द.पाठक-

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गुरुवार, 23 मार्च 2023

ग़ज़ल 316[81 इ] : सच से उसका कोई वास्ता भी नहीं

 ग़ज़ल 316[81]

212---212---212----212

सच से उस का कोई वास्ता भी नहीं,
क्या हक़ीक़त उसे जानना  भी नहीं ।

उँगलियाँ वो उठाता है सब की तरफ़
और अपनी तरफ़ देखता भी नहीं ।

रंग चेहरे क्यों उड़ गया आप का ,
सामने तो कोई आइना भी नहीं ।

पीठ अपनी सदा थपथपाते रहे ,
क्या कहें तुमको कोई हया भी नहीं ।

टाँग यूँ ही अड़ाते रहोगे अगर ,
तुम को देगा कोई रास्ता भी नहीं ।

आप दाढ़ी मे क्या लग गए खोजने ,
मैने 'तिनका' अभी तो कहा भी नहीं ।

रेवड़ी बाँटने  ख़ुद  चले आप थे
किसको क्या क्या दिया कुछ पता ही नहीं

राज-सत्ता भी ’आनन’ अजब चीज़ है
मिल गई , तो कोई छोड़ता भी नहीं

-आनन्द पाठक-

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बुधवार, 22 मार्च 2023

ग़ज़ल 315[80इ] : ये अलग बात है वो मिला तो नहीं--

 ग़ज़ल 315  [ 80इ]


212---212---212---212


ये अलग बात है वो मिला तो नहीं
दूर उससे मगर मैं रहा तो नहीं

एक रिश्ता तो है एक एहसास है
फूल से गंध होती जुदा तो नहीं

उनकी यादों मे दिल मुब्तिला हो गया
इश्क की यह कहीं इबतिदा तो नहीं

कौन आवाज़ देता है छुप कर मुझे
आजतक कोई मुझको दिखा तो नहीं 

ध्यान में और लाऊँ मैं किसको भला
आप जैसा कोई दूसरा तो नहीं

लाख ’तीरथ’ किए आ गए हम वहीं
द्वार मन का था खुलना, खुला तो नहीं

आप जैसा भी चाहें समझ लीजिए
वैसे ’आनन’ है दिल का बुरा तो नहीं


-आनन्द.पाठक-

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ग़ज़ल 314 [79 इ] : आप ने जो भी कुछ किया होगा

 ग़ज़ल 314[79]


2122---1212---22


आप ने जो भी कुछ किया होगा
हश्र में उसका फ़ैसला  होगा

चाह कर भी न कह सका उस से
उसने आँखों से पढ़ लिया होगा

ख़ौफ़ खाया न जो दरिंदो से
आदमी देख कर डरा  होगा

दिल पे दीवार उठ गई होगी
घर का आँगन भी जब बँटा होगा

अब भरोसा भी क्या करे  कोई
राहजन ही जो रहनुमा होगा

जाहिलों की जमात में अब वो
ख़ुद को आरिफ़ बता रहा होगा

रोशनी की उमीद में ’आनन’
आख़िरी छोर पर खड़ा होगा


-आनन्द पाठक-

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शुक्रवार, 10 मार्च 2023

ग़ज़ल 313[78] जब झूठ की ज़ुबान सभी बोलते रहे

 ग़ज़ल 313/78


221---2121---1221---212


जब झूठ की ज़ुबान सभी बोलते रहे
सच जान कर भी आप वहाँ चुप खड़े रहे

दिन रात मैकदा ही तुम्हारे खयाल में
तसबीह हाथ में लिए क्यों फेरते रहे

इन्सानियत की बात किताबों में रह गई
अपना बना के लोग गला काटते रहे

चेहरे के दाग़ साफ नजर आ रहे जिन्हे
इलजाम आइने पे वही थोपते रहे

क्या दर्द उनके दिल में है तुमको न हो पता
अपनी ज़मीन और जो घर से कटे रहे

कट्टर ईमानदार हैं जी आप ने कहा
घपले तमाम आप के अब सामने रहे

बस आप ही शरीफ़ हैं मजलूम हैं जनाब
मासूमियत ही आप सदा बेचते रहे

'आनन' को कुछ खबर न थी, मंजिल पे थी नजर
काँटे चुभे थे पाँव में या आबले रहे


-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ = नाम जपने की माला

मजलूम =पीड़ित

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इसी ग़ज़ल को मेरी आवाज़ में सुने---

शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 312[77इ] : चिराग़-ए-इल्म जिसका हो --

 ग़ज़ल 312


1222---1222---1222---1222


चिराग़-ए-इल्म जिसका हो, सही रस्ता दिखाता है
जहाँ होता वहीं से ख़ुद पता अपना बताता  है

शजर आँगन में, जंगल में कि मन्दिर हो कि मसज़िद मे
जो तपता ख़ुद मगर औरों पे वो छाया लुटाता है

समन्दर है तो क़तरा है, न हो क़तरा समन्दर क्या
ये रिश्ता दिल हमेशा ही निभाया है निभाता है

नज़र आता नहीं फिर भी तसव्वुर में है वह रहता
बहस मैं क्या करूँ इस पर नज़र आता, न आता है

हवेली माल-ओ-ज़र, इशरत जो जीवन भर जुटाते हैं
यही सब छोड़ कर जाते, कभी जब वह बुलाता है

इनायत हो अगर उनकी  तो दर्या रास्ता दे दे
करम उनका भला इन्साँ कहाँ कब जान पाता है

 जो संग-ए-आस्ताँ उनका हवा छूकर इधर आती 
मुकद्दस मान कर ’आनन’ ये अपना सर झुकाता है


-आनन्द.पाठक-

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शब्दार्थ

शजर = पेड़

माल-ओ-ज़र इशरत = धन संपत्ति, ऐश्वर्य वैभव

संग-ए-आस्ताँ  = चौखट

मुक़द्दस =पवित्र


मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 311[76इ] :दिखा कर झूठ के सपने हमें भरमा रहे हो

 1222---1222---1222--122


एक ग़ज़ल 311 [76इ]


दिखा कर झूठ के सपने हमें भरमा रहे हो
जो जुमले घिस चुके क्यों बारहा रटवा रहे हो

अकेले तो नहीं तुम ही जो लाए थे उजाले
यही इक बात हर मौके पे क्यों दुहरा रहे हो

दिखा कर ख़ौफ़ का  मंज़र जो लूटे हैं चमन को
उन्हीं को आज पलकों पर बिठाए जा रहे हो

अगर शामिल नहीं थे तुम गुजस्ता साजिशों में
नही है सच अगर तो किस लिए  घबरा रहे हो ?

सबूतों के लिए तुम बेसबब हो क्यों परेशाँ
खड़ा सच सामने जब है तो क्या झुठला रहे हो

ये मिट्टी का बदन है ख़ाक में मिलना है इक दिन
ये इशरत चार दिन की है तो क्यों इतरा रहे हो

तुम्हारी कैफ़ियत ’आनन’ यही है तो कहेँ क्या  
जहाँ पत्थर दिखा बस सर झुकाते जा रहे हो


-आनन्द पाठक-

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ग़ज़ल 310[75इ] : हमें कब से वह शिद्दत से


ग़ज़ल 310 [75इ]

1222---1222---1222--122


हमे कब से वो शिद्दत से यही बतला रहा है
लहू के रंग कितने हैं  हमें समझा  रहा है

उसे भाता नहीं सुख चैन मेरी बस्तियों का
हवा दे कर बुझे शोलों को वो भड़का रहा है

फ़रिश्ता बन के उतरेगा न कोई आसमाँ से
बचे हैं जो उन्हें सूली चढ़ाया  जा रहा है

जो बाँटी 'रेवड़ी' उसने, दिखे बस लोग अपने
ज़माने को वह असली रंग अब दिखला रहा है

वो कर के दरजनो वादे हुआ सत्ता पे काबिज़
निभाने की जो पूछी बात तो हकला रहा है ।

इधर पानी भरा बादल तो आता है यक़ीनन
पता चलता नहीं पानी किधर बरसा रहा है

वो मीठी बात करता सामने हँस हँस कर ’आनन’
पस-ए-पर्दा वो टेढ़ी चाल चलता जा रहा है


-आनन्द.पाठक-

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शनिवार, 18 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 309 [74इ] : अवाम जो भी सुनाए उसे सुना करिए

 ग़ज़ल 309


1212---1122--1212--22


अवाम जो भी सुनाए उसे सुना करिए
हवा का रुख भी ज़रा देखते रहा करिए

हुजूम आ गया सड़कों पे तख़्तियाँ लेकर
कभी तो हर्फ़-ए-इबारत जरा पढ़ा करिए

हर एक बात मेरी फूँक कर उड़ा देना
हुजूर दर्द सलीक़े से तो सुना करिए

ज़ुबान आप की है आप को मुबारक हो
जलील-ओ-ख्वार तो कम से न कम किया करिए

तमाशबीन ही बन कर न देखिए मंज़र
जनाब वक़्त ज़रूरत पे तो उठा करिए

चला किए है अभी तक किसी के पैरों से
उतर के पाँव पे अपने, कभी चला करिए

सही है बात बुरा मानना नहीं ’आनन’
बँधी हो आँख पे पट्टी, किसी का क्या करिए


-आनन्द.पाठक-

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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 308[73 इ] : इश्क़ क्या है, दो दिलों की बस्तगी है


ग़ज़ल 308

2122---2122---2122


इश्क़ क्या है? दो दिलों की बस्तगी है 
एक ने’मत है , खुदा की बंदगी  है

राह-ए-उलफ़त का सफ़र क्या तय करेगा
सोच में ही जब तेरी आलूदगी है

इश्क़ कब अंजाम तक पहुँचा हमारा
इक अधूरी सी कहानी ज़िंदगी है

लोग हैं खुशबख़्त जिनको प्यार हासिल
चन्द लोगों के लिए यह दिल्लगी है

आप का मैं मुन्तज़िर जब से हुआ हूँ
एक मैं हूँ इक मेरी शाइस्तगी है

दूसरा चेहरा नज़र आता नहीं अब
जब से मेरे दिल से उनकॊ लौ लगी है

आप आनन को भले समझे न समझें
दिल में मेरे आज भी पाकीजगी है ।


-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ

बस्तगी = लगाव खिंचाव

ने’मत = ईश्वरी कूपा

आलूदगी = खोट, मिलावट,अपवित्रता

मुन्तज़िर = प्रतीक्षक इन्तज़ार करने वाला

शाइस्तगी = शिष्टता शराफ़त

पाकीजगी =पवित्रता

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गुरुवार, 16 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 307[72इ] : बात मे उसके रही कब पुख्तगी है

 ग़ज़ल 307

2122--2122--2122

 

बात में उसकी  रही कब पुख्तगी  है
सोच में साजिश भरी है, तीरगी है

एक चेहरे पर कई चेहरे लगाता
पर चुनावों में भुनाता सादगी है

लग रही है कुछ निज़ामत में कमी क्यों
लोग प्यासे हैं लबों पर तिश्नगी है

घर के आँगन में उठीं दीवार इतनी
मर चुकी आँखों की अब वाबस्तगी है

रोशनी देखी नहीं जिसने अभी तक
जुगनुओं की रोशनी अच्छी लगी है

चन्द लोगों के यहाँ जश्न-ए-चिरागाँ
बस्तियों में दूर तक बेचारगी है

भीड़ में क्या ढूँढते रहते हो ’आनन’
अब न रिश्तों में रही वो ताजगी है ।


-आनन्द पाठक-

शब्दार्थ 

पुख्तगी = दृढ़ता, स्थायित्व

निज़ामत = शासन व्यवस्था

वाबस्तगी = लगाव खिंचाव

जश्न-ए-चिरागाँ = रोशनी का त्यौहार

तीरगी = अँधेरा

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बुधवार, 15 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 306[71इ] : मंज़िल पे है नज़र मुझे काँटों का डर नहीं

 ग़ज़ल 306 [71 इ]

221---2121--1221---212


मंज़िल पे  है नज़र, मुझे काँटों का डर नहीं
छाले पड़े हैं पाँव में कहता मगर नही

पत्थर के देवता से ही अब कुछ उमीद है
गो, आँसुओं का उस पे भी होता असर नहीं

यह तो मकान और किसी का मकीन तू
दो दिन का है क़याम यहाँ, तेरा घर नहीं

ठोकर लगा के आप ने दिल तोड़ क्यों दिया
 क्या दिल गरीब का अभी है मोतबर नहीं ?
 
गो, हादिसे तमाम तेरे सामने हुए
उस पर दलील यह कि तुझे कुछ ख़बर नहीं 

दो-चार लाइनों में सुनाऊँ तो किस तरह
ये दास्तान ज़िंदगी की मुख़्तसर नहीं

जब इन्तखाब तुमको निगाहों ने कर लिया”
आनन’ को दूसरा कोई आता नज़र नहीं


-आनन्द.पाठक-

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शनिवार, 11 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 305[70इ] : निज़ाम आया नया है

 ग़ज़ल 305 [ 70इ]


1222---122


निज़ाम आया नया है
बयाँ सच का मना है

उधर आँसू गिरे हैं
इधर पत्थर गला है

अगर तुम चुप रहोगे
तो फिर मालिक ख़ुदा है

अमीर-ए-कारवाँ बन
हमे फिर छल रहा है

मेरी ख़ामोशियों का
किसी को क्या पता है

दिया नन्हा सही, पर
अँधेरों से लड़ा  है

सवालों के मुक़ाबिल
इधर ’आनन’ खड़ा है 


-आनन्द.पाठक-

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