दरीचे लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दरीचे लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

ग़ज़ल 467 [41-जी] : तुम्हारे बिन हमारी ज़िंदगी

ग़ज़ल 467 [41-जी] :  तुम्हारे बिन हमारी ज़िंदगी

1222---1222---1222---1222


तुम्हारे बिन हमारी ज़िंदगी लगती अधूरी है ।
भले सब कुछ हमे हासिल, जिगर में नासबूरी है ।

कभी  हम पास थे इतने, बदन दो एक थी धड़कन
ख़ता क्या हो गई हमसे कि तुमसे आज दूरी है ?

वो आते भी तो क्यों आते, तुम्हारी तिश्नगी कमतर
तुम्हारी आरजू दिल की अभी आधी अधूरी है । 

नज़र आता रहेगा वो, जिसे तुम ढूँढते रहते-
कि जब तक पाक है दिल और जब तक रूह नूरी है।

भले तुम कुछ कहो ख़ुद को, सभी हैं जानते तुमको
अक़ीदा तो नहीं है ये, तुम्हारी जी हज़ूरी  है ।

न जाने लोग क्यों उसको यहाँ पागल समझते हैं
जो हक़ की बात करता है. उसे कहते फ़ितूरी है
 
चिराग़ों को डराती है हवा की साज़िशें अकसर
नताइज़ जो भी हो ’आनन’ मगर लड़ना ज़रूरी है ।

-आनन्द पाठक ’आनन’-
8800927181






सोमवार, 9 मार्च 2026

ग़ज़ल 466[40-जी] : मुक़ाबिल सच के होते ही---

 ग़ज़ल 466[40-जी] : मुक़ाबिल सच के होते ही---

1222----12222---1222---122


मुक़ाबिल सच के होते ही वो घबराने लगे हैं ।
अगर मैं सच भी बोलूँ, उनको अफ़साने लगे हैं ।

पले गमलों के ये पौधे चलेंगे धूप  में क्या !
ज़रा सी धूप लगते ही ये मुरझाने ल्गे हैं ।

गया मौसम, गई ख़ुशबू, गई रौनक चमन की
जो अपने लोग थे अब दूर वो जाने लगे है ।

किनारे बैठ कर कुछ लोग बस बातें बनाते
गुहरवाले समंदर में उतर जाने लगे हैं ।

न दुनिया की ख़बर जिनको, नहीं अपनी ख़बर हो
ज़माने को वही सब लोग दीवाने लगे हैं ।

परिंदो को कहाँ फ़ुरसत कि मुड़ कर फिर वो देखें
पुराने शाख, आँगन, पेड़ बेगाने लगे हैं ।

मुहब्बत को समझते जो बहुत आसान ’आनन’
निभाने पर जो आती बात, कतराने लगे हैं ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-





शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

मुक्तक 025 : होली पर

 मुक्तक 025

:1:

 मन से मैने तुमको
बस अपना माना है
मैं हूँ तेरी ’राधा’
तू मेरा ’कान्हा’ है ।

:2:
रंग अबीर गुलाल लगाए
होली के हैं शुभ दिन आए
भूल सभी रंजिश की बातें
दिल मस्ती  में झूमे गाए ।

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

ग़ज़ल 465[39-जी] : ये भी कैसा निज़ाम है साहिब

 

ग़ज़ल 465[39-जी] : ये भी कैसा निज़ाम है, साहिब !

2122---1212--22

ये भी कैसा निज़ाम है , साहिब!
इश्क़ का, दिल गुलाम है साहिब !

जिस्म बस नाम ही का मेरा है
साँस तो उनके नाम है साहिब !

ज़िंदगी इक ग़ज़ल अधूरी है
ना मुकम्मल कलाम है साहिब !

आप आएँ तो दिल मुकद्दस हो 
आप का एहतराम  है साहिब !

सब के दिल में हो लौ मुहब्बत की
एक ही बस पयाम है साहिब !

एक ही राह के मुसाफ़िर सब
आख़िरत ही मक़ाम है साहिब !

हैफ़! क्या है नसीब ’आनन’ की
सुबह होते ही शाम है साहिब !

-आनन्द पाठक ’आनन’
880092 7181




रविवार, 15 फ़रवरी 2026

ग़ज़ल 464[38-जी] : लहज़े में लताफ़त है---

 ग़ज़ल 464[38-जी] : लहज़े में लताफ़त है---

221---1222 // 221---1222


 लहज़े है में लताफ़त है, पर दिल में कबाहत है
मासूम से लगते वो, आँखों में शरारत है ।

मुद्दत से मुलव्विस है, साज़िश में, अदावत में
मालूम नहीं उसको, क्या चीज मुहब्बत है ।

खुद को वो समझता है, बस एक वही क़ाबिल
माहिर है करामाती , आलिम है ये ग़फ़लत है।

करना भी भरोसा क्या,अख़्लाक़ नहीं उसका
एहसान फ़रामोशी, उस शख़्स की आदत है ।

हर बात में नुक़्ता चीं, बस टाँग अड़ा देना ,
मिलता है सुकूँ उसको , करता वो शरारत है।

बेपर की उड़ा देना, बिन आग धुआँ करना 
उसका ये हुनर अपना, हासिल ये महारत है।

’आनन’ तू परिशाँ क्यों, लोगो के छलावों से
जीना है इसी में जब, काहे की शिकायत है ।

-आनन्द पाठक ’आनन’--
880092 7181


गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

कविता 033 : एक आदमी क़लम घिसता है --

कविता 033: एक आदमी क़लम घिसता है-- 

 स्व0] कवि धूमिल जी की प्रेरणा से,  क्षमा याचना सहित ]---

एक आदमी 
क़लम घिसता है ।
एक आदमी कवि मंच की
गणेश परिक्रमा करता है 
एक तीसरा आदमी भी है
जो न क़लम घिसता है, 
न आयोजकों की परिक्रमा करता है ।
वह जुगाड भिड़ाता है
जुगाड़ करता है 
और पुरस्कार बटोरता है।
मैं पूछता हूँ 
"यह तीसरा आदमी कौन है"
साहित्य सभा इस प्रश्न पर मौन है ।

-आनन्द पाठक ’आनन’-



======   =======  ===

आ0 [स्व0] धूमिल जी की मूल कविता पाठको के अवलोकनार्थ यहाँ लगा रहा हूँ
आप भी आनन्द उठाएँ

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।

--धूमिल -



मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

ग़ज़ल 463[37-जी] :तुम मेरी इयादत क्या करते

 ग़ज़ल 463[37-जी] : तुम मेरी इयादत क्या करते

221---1222---112/22

बह्र-ए-हज़ज मुसद्दसअख़रब अब्तर

तुम मेरी इयादत क्या करते
बातिल हो, इनायत क्या करते

सुनना ही नहीं है जब तुमको
हम तुमको नसीहत क्या करते ।

माना कि हमारे तुम न हुए
दुनिया से शिकायत क्या करते

अपने न हुए जो अपने थे 
ग़ैरों की हिमायत क्या करते

हर  शै में तुम्हारा अक्स निहाँ
हम शौक़-ए-जियारत क्या करते

यह हुस्न तुम्हारा लासानी
हम इसकी क़िताबत क्या करते।

’आनन’ को नहीं समझा तुम ने
हम और वज़ाहत क्या करते ।

-आनन्द पाठक ’आनन’-

बातिल हो = झूठे हो
इयादत   = हाल चाल पूछना
इनायत = मेहरबानी ,कृपा
लासानी = अद्वितीय , अनुपम
वज़ाहत = स्पष्टीकरण

बुधवार, 28 जनवरी 2026

ग़ज़ल 462[36-जी] : वह आदमी है ऐसा

 ग़ज़ल 462[36-जी] : वह आदमी है ऐसा---

221---2122  // 221---2122 

वह आदमी है ऐसा, ख़ुद को बड़ा बताता
बैठा जहाँ घड़ी भ, अपना ही गीत गाता ।

वह ख़ुदगरज़ है इतना, जब हाथ भी मिलाता
रिश्तों को अपने हक़ में, वह सीढ़ियाँ बनाता

ख़ामोशियाँ ये मेरी, कमज़ोरियाँ न समझो
अपनी ज़ुबाँ अदब की ,क्यों तुमको मुँह लगाता 

यह नौजवान नस्लें. अपनी पे जब हैं आतीं
हुंकार जब ये भरतीं, मुर्दा भी जाग जाता ।

अब वो चमन नहीं है, गुंचे हुए सयाने
माली को आजकल अब, ख़ातिर में कौन लाता?

बीती बहार कब की, अब तो ख़िज़ां का आलम
इन सूखी डालियों पर , कौन आशियाँ  बनाता !

कितना बचेगा ’आनन’, हर हाथ में है पत्थर
यह सरफ़िरों की बस्ती, क्यों आइना दिखाता ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-


सोमवार, 26 जनवरी 2026

ग़ज़ल 461[35-जी] : साफ़गोई हक़बयानी इक तरफ़

 ग़ज़ल  461[35-जी] : साफ़गोई हक़बयानी इक तरफ़

2122---2122--212

साफ़गोई हक़बयानी इक तरफ़
और उसकी लनतरानी इक तरफ़

गो हमारी गुल फ़िशानी इक तरफ़
और उसकी बदगुमानी इक तरफ़

बंदिशें दुनिया की चाहे लाख हों
इश्क़ की अपनी कहानी इक तरफ़

सौ मसाइब ज़िंदगी के दरमियाँ
दो घड़ी की शादमानी इक तरफ़

सद बलाएँ राह मेरी रोकती हैं
पर ख़ुदा की मिहरबानी इक तरफ़

आप का ज़ौर-ए-सितम अपनी जगह
दिल की मेरी नातवानी इक तरफ़

क्या हुआ ’आनन’ जो पीरी आ गई
दिल की अपनी नौजवानी इक तरफ़ 

-आनन्द पाठक ’आनन’

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

ग़ज़ल 460 [34-जी] : उसके ज़ौर-ओ-ज़फ़ा में वो शिद्दत नहीं

 ग़ज़ल 460 [34-जी]  : उसके ज़ौर-ओ-ज़फ़ा में वो शिद्दत नहीं

212---212---212--212

उसके ज़ौर--ज़फ़ा में वो शिद्दत नहीं ,
क्यों न समझूँ कि अब वो मुहब्बत नहीं ।

ज़िंदगी है अगर ,दिल तो ज़िंदा रखो ,
साँस लेना ही कोई अलामत नहीं ।

एक चेहरे पे चेहरे कई रंग के ,
आदमी में बची अब शराफ़त नहीं ।

पहले जैसी इनायत नहीं आप की
वो नवाज़िश नहीं , वो क़राबत नहीं ।

सबको मालूम है राज़ क्या, बात क्या ,
कह रहें आप जो वह हक़ीक़त नहीं ।

छोड़िए अब सफ़ाई में क्या है रखा
आप ने जो किया वो रफ़ाक़त नहीं ।

तुम भी ’आनन’ ज़ुबाँ से पलटने लगे
ऐसी कोई तुम्हारी थी आदत नहीं ।

-आनन्द पाठक ’आनन’




शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

गीत 094: 26-जनवरी गणतन्त्र दिवस

 26 जनवरी-गणतन्त्र दिवस

है मुक्त गगन, अपना विहान,
भरते रहते नित नव उड़ान ,गणतन्त्र दिवस, गणतन्त्र दिवस।

 हम नई चेतना के वाहक,
हम विश्व शान्ति के पोषक हैं
हम संविधान के निर्माता,
हम संविधान के रक्षक हैं ।

पावन है अपना संविधान,
 सबसे न्यारा सबसे महान ,गणतन्त्र दिवस, गणतन्त्र दिवस।--

जन जन की आशा का प्रतीक,
बहती विकास की धारा है
सबके इसमे अपने सपने,
यह भारत देश हमारा  है ।

भारत की रख्खे आन-बान,
नित रचा करे नव कीर्तिमान,गणतन्त्र दिवस, गणतन्त्र दिवस।---

उत्तर से लेकर दक्षिण तक,
पूरब से लेकर पश्चिम तक 
हम एक सूत्र में बँधे हुए,
अग्रिम से लेकर अन्तिम तक

नारों से गूँजे आसमान,
जय ’जय जवान’ जय  ’जय किसान, गणतन्त्र दिवस, गणतन्त्र दिवस।

-आनन्द.पाठक ’आनन’


शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

ग़ज़ल 459[ 33-जी ] : उतर जाए खुमार.ए.इश्क़ गर तो --

         ग़ज़ल 459 [ 33-जी]
1222---1222----1222----1222


उतर जाए ख़ुमार.ए.इश्क़ गर तो फिर नशा क्या है !
मुहब्बत में अगर तड़पे न दिल तो फिर मज़ा क्या है।

तुम्हे मालूम है सब कुछ हमारी आरज़ू , हसरत
 निगाह.ए.शौक़ से ज़ाहिर, छुपाने को बचा क्या है।

अभी से बेनियाज़ी, बेरुख़ी, ज़ौर.ओ.सितम मुझ पर
अभी आग़ाज़.ए.उल्फ़त है, अभी मैने कहा क्या है ।

तुम्हारा चाहने वाला खड़ा है सरनिगूँ कब से
ये पर्दे के तहत पर्दा. सनम ऐसी हया क्या है ।

बनाया ख़ाक से हमको, मिटाया ख़ाक में हमको
तसव्वुर आप ही का था, हमें फिर सोचना क्या है।

सरापा आप ही के हैं , भले हैं या बुरे हैं हम 
हमारे सामने अब रास्ता भी दूसरा क्या है ।

कहाँ रुकता कोई आशिक , ज़माना लाख समझाए
मरीजे.ए.इश्क की आख़िर कोई होती दवा क्या है।

नहीं चालाकियाँ चलती मुहब्बत में कभी ’आनन’
नहीं तू बाज़ आता है , इरादा फिर बता क्या है ?

-आनन्द.पाठक ’आनन’-
इस ग़ज़ल को आ0 विनोद जी उपाध्याय [ लखनऊ] के आवाज़ में 
यहाँ सुने
https://www.facebook.com/share/v/1Cx6ueh1bV/

रविवार, 4 जनवरी 2026

कविता 032 : राजनीति के जुमले हैं हम

 कविता : 032

राजनीति के जुमले हैं हम
हर "रैली’ के गमले से हम
जहाँ लगा दो, जहाँ सजा दो

हम सवर्ण है, हम शोषित हैं
हमी दलित हैं, हम वंचित हैं
हमी सनातनी, हमी ज़िहादी
फिरकों में बँटने के आदी
रंग लहू का एक बताते
खुद की मंशा नेक बताते

जाति-पाँत में बटे हुए हम
खाचें खाँचों में अँटे हुए हैं
वोट बैंक हम ।

सब कुछ हैं हम
लेकिन हम इंसान नहीं है
मानवता की पहचान नहीं है
" मुफ़्त रेवड़ी’-पर फ़िसलें  हम
राजनीति के जुमले हैं हम ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’
8800927181




बुधवार, 31 दिसंबर 2025

ग़ज़ल 458 [32-जी] : वह आदमी है ऐसा, --

ग़ज़ल 458 [32-जी] :  वह आदमी है ऐसा, 
 221---2122-// 221--2122

वह आदमी है ऐसा, ख़ुद को बड़ा दिखाता
बैठा जहाँ घड़ी भर, अपना ही गीत गाता ।

सब को बता रहा है, ख़ुद को वो इन्क़्लाबी 
सत्ता की सीढ़ियों पर जो पूँछ है हिलाता ।

मैने ये तीर मारा , मैने वो तीर मारा 
शेखी बघारता है, किस्सा वो जब सुनाता ।

वह बाँटता फिरे है, सौगात हर ’इलेक्शन’
जुमले नए नए गढ़, फिर ख़्वाब है दिखाता ।

खुद को समझ रहा है , सबसे बड़ा वो ज्ञानी
हर मामले में अपनी , बस टाँग है अड़ाता ।

बाते तमाम उसकी होती हवा हवाई -
कैसे करें भरोसा क्या सच कि वह बताता ।

’आनन’ बचाना ख़ुद को, बस दूर ही से मिलना
सुनते है उसका काटा, पानी न माँगता है ।

-आनन्द पाठक ’आनन’-

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

ग़ज़ल 457 [31-जी] : ख़्वाब में जब से देखा है --

 ग़ज़ल  457 [31-G]
212---212---212---212

ख़्वाब में जब से देखा है अक्स-ए-क़मर
जुस्तजू बस उसी का रहा उम्र भर ।

दिल जो होने लगे आरिफ़ाना अगर
तो समझना कि होने को है इक सहर ।

ख़ुशनुमा एक एहसास दिल में तो है 
वह भले ही न आता कहीं हो नज़र ।

जब तलक लौ लगी थी नहीं आप से
मन भटकता रहा बस इधर से उधर ।

बात कैसे सुनोगे, वह क्या कह रहा
दिल पे ग़ालिब तुम्हारे है जब शोर-ओ-सर ।

यूँ ही सजदे में रहने से क्या फ़ायदा
सर तो सजदे में है और तू बाख़बर ।

आख़िरत से तू ’आनन’ परेशान क्यों
राह-ए-हक़ में अगर है तो क्या ख़ौफ़ डर ।

-आनन्द पाठक ’आनन’-

अक्स-ए-क़मर = चाँद की छवि
ग़ालिब   = प्रभाव
शोर-ओ-सर = कोलाहल
आख़िरत से = परलोक से

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

गीत 093 : आँकड़ो का खेल जारी है--

 एक नवगीत 

2122---2122--2 =16

आँकड़ों का खेल जारी है, सच दबा है, झूठ भारी है ।

भीड़ देखी हो गए गदगद

तालियों की भीख माँगे हैं ।

रोशनी चुभती उन्हे हरदम

पास उनके सौ बहाने हैं ।

भाषणों में नौकरी तो है, अस्ल में बेरोजगारी है ।

आँकड़ों का खेल जारी है ------


हाथ जोड़े आ रहे है हो जो

सर झुका कर ’वोट’ माँगोगे ।

सैकड़ों सपने दिखा कर तुम’

बाद सब कुछ भूल जाओगे ।

वायदों पर वायदे करना, भूलना आदत तुम्हारी है ।

आँकड़ों का खेल जारी है ------


मुफ़्त की है रेवड़ी सबको,

एक धेला भी नहीं देना ।

बात लाखों की, हज़ारों की

बस उन्हे तो ’वोट’ है लेना।

बात में जादूगरी उनकी, सोच में भी होशियारी है ।

आँकड़ों का खेल जारी है ------


-आनन्द.पाठक ’आनन’-


शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

ग़ज़ल 456[30-जी] अब न मिलता कोई शख़्स है

 

ग़ज़ल 456 [30-जी] : अब न मिलता कोई शख़्स है--
212---212---212---212


अब न मिलता कोई शख़्स है मोतबर
जिस पे कर लूँ भरोसा मैं दिल खोल कर

तुमको खुशबू मिले जो कभी राह में
सोचना यह थी उनकी कभी रहगुज़र

तुम मिले क्या मुझे दिल ये रोशन हुआ
इक अंँधेरे में जैसे हुई हो सहर  ।

वक़्त ने क्या न ढाए हैं मुझ पर सितम
फिर भी बिखरा नहीं हूँ अभी टूट कर

तेरी चाहत जिधर ले के चल तू मुझे
तू ही रस्ता दिखा ऎ मेरे  राहबर ।

ढूँढता ही रहा , वो न हासिल हुआ
ख़्वाब में जो था चेहरा रहा उम्र भर

तेरे सजदे में होने से क्या फायदा
सर तो सजदे में  है और तू बाखबर ?

चल पड़े हो जो ’आनन’ रह-ए-इश्क़ में
कू-ए-जानाँ से आना नहीं लौट कर ।

-आनन्द पाठक ’आनन’

मोतबर = विश्वसनीय, जिस पर एतबार किया जा सके

कू-ए-जानाँ = प्रेयसी की गली 

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

ग़ज़ल 455[29-जी] : हज़ारों बार बातें हो चुकी

 ग़ज़ल 455[29-जी] : हज़ारों बार बातें हो चुकी-

1222---1222---1222---1222

हज़ारों बार बातें हो चुकीं, क्या उनको दुहराना ।

मसाइल हो चुके जो हल उन्हे क्यों फिर से उलझाना ।


तुम्हें शौक़-ए-अदावत है , मुझे शौक़-ए-मुहब्बत है

वफ़ा भी चीज कोई है , कभी तुमने नहीं माना ।


निगाहें क्या झुकीं पलभर, लबों पर क्या हुई ज़ुम्बिश

ये दुनिया भर की सरगोशी बना देती है अफ़साना ।


तुम्हारा मुंतज़िर हूँ मैं, तुम्हारी रहगुज़र में हूँ 

ख़याल-ओ-ख़्वाब में तुम हो, नहीं बच कर निकल जाना ।



पस-ए-पर्दा रहोगे तुम पहेली बन के यूँ कबतक

इधर बेचैन हैं आँखे ,ज़रा तुम सामने आना ।


सिफ़त क्या है मुहब्बत की, नहीं मालूम क्या तुमको ?

चले इस राह पर जब हो, नहीं अब लौट कर जाना ।


हवाओं के मुक़ाबिल तुम जलाते हो चिराग़ ’आनन’

बहुत मुशकिल हुआ करता चिराग़ों को बचा पाना ।


-आनन्द पाठक ’आनन’-

मसाइल = मसले, समस्यायें

मुंतज़िर = प्रतीक्षक
पस-ए-पर्दा = पर्दे के पीछे

सिफ़त = विशेष गुण

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

ग़ज़॒ल 454 [28-जी] बदज़ुबानी पर उतर आने लगा वो--


ग़ज़ल 454 [28-जी] : बदज़ुबानी पर उतर आने लगा वो--

  2122---2122---2122

बदज़ुबानी पर उतर आने लगा वो

पस्ती.ए.अख़्लाक़ दिखलाने लगा वो


जब से उसने छोड़ दी अपनी शराफ़त 

और भी नंगा नज़र आने लगा वो ।


खुद लिखा अपना क़सीदा ख़ुद पढ़ा जब

बेसबब खुद पर ही इतराने लगा वो ।


ख़ुद गरज़ था या कि कुछ मज़बूरियाँ थीं

सत्य की हर बात झुठलाने लगा वो ।


हाथ में उसके बग़ावत की क़लम है

गीत चारण की तरह गाने लगा वो ।


जब दलीलें थीं नहीं कुछ पास उसके

बेसबब मुझ पर ही चिल्लाने लगा वो ।


जब गिला शिकवा किए हम उस से ’आनन’

बारहा झूठी कसम खाने लगा वो ।


-आनन्द.पाठक ’आनन’

पस्ती ए अख़लाक़ = चारित्रिक पतन

रविवार, 14 दिसंबर 2025

ग़ज़ल 453 [ 27-जी] : नहीं छुपती छुपाने से

 ग़ज़ल 453 [ 27-जी] : नहीं छुपती मुहब्बत है जमाने में
1222---1222---1222---1222-

नहीं छुपती मुहब्बत है जमाने में छुपाने से  ।
बयां सब राज़ हो जाते निगाहों के झुकाने से ॥

समझ जाती है दुनिया यह, सही क्या है ग़लत क्या है
निगाहों की बयानी से, ज़ुबाँ के लड़खड़ाने से ।

हवा में गूँजती रहती, मुहब्बत के हैं अफ़साने
नहीं मरती कभी यादें किसी के दूर जाने से ।

मनाज़िल और भी तो हैं नहीं बस एक ही मंज़िल
उमीदे जाग जाती हैं ज़रा हिम्मत जगाने से ।

निकाब-ए-रुख उठा कर वह कभी आएँगे इस जानिब
इसी उम्मीद में बैठा हुआ हूँ, इक ज़माने से ।

मरासिम अब नहीं वैसे कि जैसे थे कभी पहले
कि दिल गुलज़ार था अपना तुम्हारे आने जाने से ।

अगर दिल पाक हो ’आनन’ अना की क़ैद ना हो तो
नहीं कुछ दूसरा बढ़ कर मुहब्बत के ख़ज़ाने से।

-आनन्द.पाठक ’आनन’--