तुम्हारे बिन हमारी ज़िंदगी लगती अधूरी है ।
भले सब कुछ हमे हासिल, जिगर में नासबूरी है ।
कभी हम पास थे इतने, बदन दो एक थी धड़कन
न जाने लोग क्यों उसको यहाँ पागल समझते हैं
-आनन्द पाठक ’आनन’-
8800927181
ग़ज़ल 466[40-जी] : मुक़ाबिल सच के होते ही---
1222----12222---1222---122
मुक्तक 025
:1:
ग़ज़ल 464[38-जी] : लहज़े में लताफ़त है---
221---1222 // 221---1222
कविता 033: एक आदमी क़लम घिसता है--
[ स्व0] कवि धूमिल जी की प्रेरणा से, क्षमा याचना सहित ]---
ग़ज़ल 463[37-जी] : तुम मेरी इयादत क्या करते
221---1222---112/22
बह्र-ए-हज़ज मुसद्दसअख़रब अब्तर
ग़ज़ल 460 [34-जी] : उसके ज़ौर-ओ-ज़फ़ा में वो शिद्दत नहीं
एक नवगीत
2122---2122--2 =16
आँकड़ों का खेल जारी है, सच दबा है, झूठ भारी है ।
भीड़ देखी हो गए गदगद
तालियों की भीख माँगे हैं ।
रोशनी चुभती उन्हे हरदम
पास उनके सौ बहाने हैं ।
भाषणों में नौकरी तो है, अस्ल में बेरोजगारी है ।
आँकड़ों का खेल जारी है ------
हाथ जोड़े आ रहे है हो जो
सर झुका कर ’वोट’ माँगोगे ।
सैकड़ों सपने दिखा कर तुम’
बाद सब कुछ भूल जाओगे ।
वायदों पर वायदे करना, भूलना आदत तुम्हारी है ।
आँकड़ों का खेल जारी है ------
मुफ़्त की है रेवड़ी सबको,
एक धेला भी नहीं देना ।
बात लाखों की, हज़ारों की
बस उन्हे तो ’वोट’ है लेना।
बात में जादूगरी उनकी, सोच में भी होशियारी है ।
आँकड़ों का खेल जारी है ------
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
मोतबर = विश्वसनीय, जिस पर एतबार किया जा सके
कू-ए-जानाँ = प्रेयसी की गली
ग़ज़ल 455[29-जी] : हज़ारों बार बातें हो चुकी-
1222---1222---1222---1222
हज़ारों बार बातें हो चुकीं, क्या उनको दुहराना ।
मसाइल हो चुके जो हल उन्हे क्यों फिर से उलझाना ।
तुम्हें शौक़-ए-अदावत है , मुझे शौक़-ए-मुहब्बत है
वफ़ा भी चीज कोई है , कभी तुमने नहीं माना ।
निगाहें क्या झुकीं पलभर, लबों पर क्या हुई ज़ुम्बिश
ये दुनिया भर की सरगोशी बना देती है अफ़साना ।
तुम्हारा मुंतज़िर हूँ मैं, तुम्हारी रहगुज़र में हूँ
ख़याल-ओ-ख़्वाब में तुम हो, नहीं बच कर निकल जाना ।
पस-ए-पर्दा रहोगे तुम पहेली बन के यूँ कबतक
इधर बेचैन हैं आँखे ,ज़रा तुम सामने आना ।
सिफ़त क्या है मुहब्बत की, नहीं मालूम क्या तुमको ?
चले इस राह पर जब हो, नहीं अब लौट कर जाना ।
हवाओं के मुक़ाबिल तुम जलाते हो चिराग़ ’आनन’
बहुत मुशकिल हुआ करता चिराग़ों को बचा पाना ।
-आनन्द पाठक ’आनन’-
मसाइल = मसले, समस्यायें
मुंतज़िर = प्रतीक्षक
पस-ए-पर्दा = पर्दे के पीछे
सिफ़त = विशेष गुण
ग़ज़ल 454 [28-जी] : बदज़ुबानी पर उतर आने लगा वो--
2122---2122---2122
बदज़ुबानी पर उतर आने लगा वो
पस्ती.ए.अख़्लाक़ दिखलाने लगा वो
जब से उसने छोड़ दी अपनी शराफ़त
और भी नंगा नज़र आने लगा वो ।
खुद लिखा अपना क़सीदा ख़ुद पढ़ा जब
बेसबब खुद पर ही इतराने लगा वो ।
ख़ुद गरज़ था या कि कुछ मज़बूरियाँ थीं
सत्य की हर बात झुठलाने लगा वो ।
हाथ में उसके बग़ावत की क़लम है
गीत चारण की तरह गाने लगा वो ।
जब दलीलें थीं नहीं कुछ पास उसके
बेसबब मुझ पर ही चिल्लाने लगा वो ।
जब गिला शिकवा किए हम उस से ’आनन’
बारहा झूठी कसम खाने लगा वो ।
-आनन्द.पाठक ’आनन’
पस्ती ए अख़लाक़ = चारित्रिक पतन
मनाज़िल और भी तो हैं नहीं बस एक ही मंज़िल
उमीदे जाग जाती हैं ज़रा हिम्मत जगाने से ।
मरासिम अब नहीं वैसे कि जैसे थे कभी पहले
कि दिल गुलज़ार था अपना तुम्हारे आने जाने से ।