ग़ज़ल 460 [34-जी] : उसके ज़ौर-ओ-ज़फ़ा में वो शिद्दत नहीं
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उसके ज़ौर--ज़फ़ा में वो शिद्दत नहीं ,
क्यों न समझूँ कि अब वो मुहब्बत नहीं ।
ज़िंदगी है अगर ,दिल तो ज़िंदा रखो ,
साँस लेना ही कोई अलामत नहीं ।
एक चेहरे पे चेहरे कई रंग के ,
आदमी में बची अब शराफ़त नहीं ।
पहले जैसी इनायत नहीं आप की
वो नवाज़िश नहीं , वो क़राबत नहीं ।
सबको मालूम है राज़ क्या, बात क्या ,
कह रहें आप जो वह हक़ीक़त नहीं ।
छोड़िए अब सफ़ाई में क्या है रखा
आप ने जो किया वो रफ़ाक़त नहीं ।
तुम भी ’आनन’ ज़ुबाँ से पलटने लगे
ऐसी कोई तुम्हारी थी आदत नहीं ।
ऐसी कोई तुम्हारी थी आदत नहीं ।
-आनन्द पाठक ’आनन’
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