"वह दिन" [उपन्यास]--एक समीक्षा
लेखक : संजीव गुप्ता
समीक्षक ; आनन्द पाठक ’आनन’
--- ---
पिछले वर्ष ,नवम्बर 2025 में, मैं अपने गॄह जिला ग़ाज़ीपुर [उ0प्र0] गया था संयोगवश उन्हीं दिनों ’ग़ाज़ीपुर लिटरेचर फ़ेस्टीवल’ भी चल रहा था। उसी दौरान स्थानीय साहित्यकारों से/साहित्यप्रेमियों से/ साहित्यानुरागियों से भी मुलाकात हुई और कुछ साहित्यिक चर्चा भी चली । उन्ही साहित्यकारों में एक थे-श्री संजीव गुप्ता जी।
संजीव गुप्ता जी कई किताबें लिख चुके है और किताबें चर्चित भी हो चुकी हैं।
उन्होने अपनी 4-किताबें बड़े ही प्रेम से मुझे सादर भेंट की।
1-आवा गावल जाय [ भोजपुरी गीत संग्रह]
2-मेरे शहर में [व्यंग्य संग्र्ह]
3-वह दिन [ उपन्यास]
4-भोजपुरी कहावतों की दुनिया
उनका उपन्यास- ’ वह दिन’ - आद्योपान्त पढ़ा जिस पर अपने कुछ विचार यहाँ व्यक्त कर रहा हूँ।
इस उपन्यास पर आ0 डा0 विवेकी राय जी, पहले ही अपने विचार व्यक्त कर चुके है है। जो हिंदी और भोजपुरी साहित्य के प्रेमी है और आंचलिक साहित्य से परिचित है [विशेषत: पूर्वांचल के] उन्हें विवेकी राय जी के बारे में बताने की कुछ ज़रूरत नही’।संभव हुआ तो कालान्तर में [स्व0] विवेकी राय जी अपना एक संस्मरण लिखूँगा।
इस उपन्यास के बारे मे विवेकी राय जी लिखते हैं--
-[वह दिन] एक ऐसी कथा जिसमें जमींदार का शोषक-उत्पीड़क रूप नहीं ,एक महान सहॄदय उदार और ग़रीब परवर जैसा चित्र सामने आता है।--- आरम्भ में आप को ’परती परिकथा 1’ की कथा में चित्रित एक अच्छा जमींदार मिलेगा तो अंत में ’आधा गाँव 2’ की भाँति जमींदारी टूटने के बाद वाला विक्षिप्त जमींदार मिलेगा।
संजीव गुप्ता जी के बारे में कुछ ज़ियादा कहने की ज़रूरत नहीं । उनका परिचय फ़्लैप पर दिया हुआ है। आप पढ़ सकते हैं।संक्षेप में बस इतना ही कि गुप्ता जी के अन्दर कई संजीव गुप्ता है। वह एक साथ एक लेखक ,एक इंजीनियर,एक बिजनेस मैन, एक समर्पित समाजसेवी, एक साहित्यानुरागी और सबसे बढ़ कर एक सहृदय सज्जन और प्रेमी आदमी हैं।
---- --- --
"वह दिन"-[उपन्यास]
-संजीव गुप्ता जी का यह एक चर्चित उपन्यास है जो ग़ाज़ीपुर के ही एक गाँव के एक अति ग़रीब परिवार के बालक ’रामू’ की कथा और तत्कालीन स्थानीय जमीदार बैकुंठ राय जी की कथा और उस समय के ब्रिटिश राज की कथा के आस पास घूमती है। उपन्यास का कथानक, भारत की स्वतन्त्रता 1947 के पहले जब ज़मींदारी प्रथा थी , अंग्रेजी शासन था से शुरु होकर, भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति और जमींदारी प्रथा समाप्ति तक की है । इस अन्तराल में कालचक्र कैसे कैसे करवट बदलता रहा, कैसे एक ग़रीब लड़का रामू, रामू से-रामाधार मास्टर बन कर आत्मसुख को प्राप्त हुआ। साथ ही समय चक्र के निर्मम प्रभाव से जमींदार श्री बैकुंठ राय जी शनै: शनै: विलुप्त होते गए।
कथानक तो बस इतना ही है। मगर--
संजीव जी ने उस कालखंड का इतना बारीक़ से चित्रण किया है कि पाठको को बाँध कर रखता है और अन्त तक इसे पढ़ने को विवश करता है। इस कथा में, उस समय के गाँव के हालात, ग़रीबी की मार, सामाजिक दुर्दशा , जमींदार का वैभव, लगान वसूली, अंग्रेजी राज का ख़ौफ़गाँधी जी का आन्दोलन और लोगों का उससे जुड़ना, उस समय का”अकाल’, गाँव की सामाजिक स्थिति त्यौहार, परम्परा, शादी विवाह पारम्परिक लोकगीतआदि का संजीव जी ने इतना सजीव चित्रण किया है कि अगर पाठक एक बार इसे पढ़ना शुरु करता है तो एक साँस में अन्त तक पढ़ने की उत्कंठा बनी रहती है।
इस उपन्यास में गुप्ता जी ने जिला ग़ाज़ीपुर के कुछ छुपे हुए रहस्य पर, अनछुए तथ्यों पर, इतिहास पर भी प्रकाश डाला है जिससे ग़ाजीपुर की ही आज की पीढ़ी संभवत: अनजान ही होगी।उपन्यासकार ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि पात्रों के कथन वाचन प्रतिवाचन स्थानीय लोकभाषा [जो मेरी भी भाषा है] में ही रखा जो इस उपन्यास में चार चाँद लगा देती है}रोचक बना देती है।
होनहार बिरवान के होत चिकने पात ।रामू गाँव का एक ही ग़रीब और साधन विहीन लड़का था। अगर ग़रीब की प्रतिभा को सही वक़्त पर सही सहारा ,अवलम्बन मिल जाए तो वक़्त आने पर प्रतिभा ज़रूर निखरती है और रामू कैसे अपने इसी प्रतिभा के बल पर उसी स्कूल में अध्यापक बन जाता है जो बचपन में उसी स्कूल में पढ़ने का सपना था और अपने जैसे सैकड़ॊ ”रामू’को "राम आधार ’ बनाने के इच्छा थी। उसका मिशन था।
कुल मिला कर ;वह दिन ; उपन्यास एक अत्यन्त रोचक सार्थक पठनीय संग्रहणीय उपन्यास है-जिसके लिए संजीव जी बधाई के पात्र है । यह उपन्यास और चर्चित हो इसी शुभकामना के साथ।
मूल्य :--295
प्रकाशक : विजया बुक्स
1/10753 सुभाष पार्क, गली नं0 3
नवीन शाहदरा, नई दिल्ली 110031
फोन 011-22822514 , 99101 89445
Email : vijyabooks@gmail.com
लेखक से सम्पर्क सूत्र:
संजीव गुप्त
एलिगेन्ट अप्लायेन्सेज, कचहरी रोड, गाज़ीपुर [उ0 प्र0
फ़ोन 0548-2221803 / 099849 10999
-----
1-परती परिकथा = फ़णीश्वर नाथ रेणु जी एक आंचलिक उपन्यास
2-आधा गाँव = राही मासूम रज़ा का बहुचर्चित उपन्यास

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें