रविवार, 4 जनवरी 2026

कविता 032 : राजनीति के जुमले हैं हम

 कविता : 032

राजनीति के जुमले हैं हम
हर "रैली’ के गमले हैं हम
जहाँ लगा दो, जहाँ सजा दो

हम सवर्ण है, हम शोषित हैं
हमी दलित हैं, हम वंचित हैं
हमी सनातनी, हमी ज़िहादी
फिरकों में बँटने के आदी
रंग लहू का एक बताते
खुद की मंशा नेक बताते

जाति-पाँत में बटे हुए हम
खाँचों में बस अँटे हुए हैं
वोट बैंक हम ।

लेकिन हम इंसान नहीं है
मानवता की पहचान नहीं है
" मुफ़्त रेवड़ी’-पर फ़िसलें  हम
राजनीति के जुमले हैं हम ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’


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