अनुभूतियाँ 190/77
:1:
उतर गया हो मन से कोई
कैसे मन में उसे बसाऊँ ।
टूट गया जब दिल ही मेरा
प्रेम गीत कैसे मैं गाऊँ ।
:2:
लोग हमे समझाने आए
जो ख़ुद ही ग़म के मारे हैं।
मुझे सहारा क्या वों देंगे
जीवन से ख़ुद हारा हो ।
:3:
:3:
सुना रहा हूँ कब से तुमको
बातें अपनी कही, अनकही
जो कहना था कह न सका मैं
दिल की दिल में दबी रह गई ।
:4:
सब अपने अपने मतलब से
मीठी मीठी बातें करते
जब भी उनको अवसर मिलता
छुप छुप कर करते हैं घातें
-आनन्द पाठक 'आनन'
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