अनुभूतियाँ 187/74
:745:
जो भी कर्म करोगे प्यारे !
कर्मों का फल यहीं भोगना ।
पिछले जन्मों का फल है
सखे ! तुम्हारा व्यर्थ सोचना ।
:746:
छ्द्म आवरण ओढ़े ओढ़ कर
सभी दिखावे में व्याकुल हैं
जान रहे हैं वो भी ख़ुद को
जान रहे हैं वो भी ख़ुद को
मिथ्या भावों के संकुल हैं ।
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