ग़ज़ल 459 [ 33-जी]
1222---1222----1222----1222
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उतर जाए ख़ुमार.ए.इश्क़ यूँ ही फिर नशा क्या है !
मुहब्बत में अगर तड़पे न दिल तो फिर मज़ा क्या है।
तुम्हे मालूम है सबकुछ हमारी आरज़ू , हसरत
बज़ाहिर है निगाहों से, छुपाने को बचा है क्या ।
अभी से बेनियाज़ी, बेरुख़ी, ज़ौर.ओ.सितम मुझ पर
अभी आग़ाज़.ए.उल्फ़त है, अभी मैने कहा क्या है ।
तुम्हारा चाहने वाला खड़ा है सर झुकाए जब
कि पर्दे के तहत पर्दा. अरे ! ऐसी हया क्या है ।
बनाया ख़ाक से हमको, मिटाया ख़ाक में हमको
तसव्वुर आप ही का था, हमें फिर सोचना क्या है।
सरापा आप ही के हैं , भले है या बुरे हैं हम
हमारे सामने अब रास्ता भी दूसरा क्या है ।
कहाँ रुकता कोई आशिक , ज़माना लाख समझाए
मरीजे.ए.इश्क की आख़िर कोई होती दवा क्या है।
नहीं चालाकियाँ चलती मुहब्बत में कभी ’आनन’
नहीं तू बाज़ आता है , इरादा फिर बता क्या है ?
-आनन्द.पाठक ’आनन’
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