शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

ग़ज़ल 459[ 33-जी ] : उतर जाए खुमार.ए.इश्क़ यूँ ही --

         ग़ज़ल 459 [ 33-जी]
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उतर जाए ख़ुमार.ए.इश्क़ यूँ ही फिर नशा क्या है !
मुहब्बत में अगर तड़पे न दिल तो फिर मज़ा क्या है।

तुम्हे मालूम है सबकुछ हमारी आरज़ू , हसरत
बज़ाहिर है निगाहों से, छुपाने को बचा है क्या ।

अभी से बेनियाज़ी, बेरुख़ी, ज़ौर.ओ.सितम मुझ पर
अभी आग़ाज़.ए.उल्फ़त है, अभी मैने कहा क्या है ।

तुम्हारा चाहने वाला खड़ा है सर झुकाए जब
कि पर्दे के तहत पर्दा. अरे ! ऐसी हया क्या है ।

बनाया ख़ाक से हमको, मिटाया ख़ाक में हमको
तसव्वुर आप ही का था, हमें फिर सोचना क्या है।

सरापा आप ही के हैं , भले है या बुरे हैं हम 
हमारे सामने अब रास्ता भी दूसरा क्या है ।

कहाँ रुकता कोई आशिक , ज़माना लाख समझाए
मरीजे.ए.इश्क की आख़िर कोई होती दवा क्या है।

नहीं चालाकियाँ चलती मुहब्बत में कभी ’आनन’
नहीं तू बाज़ आता है , इरादा फिर बता क्या है ?

-आनन्द.पाठक ’आनन’

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