सोमवार, 26 जनवरी 2026

ग़ज़ल 461[35-जी] : साफ़गोई हक़बयानी इक तरफ़

 ग़ज़ल  461[35-जी] : साफ़गोई हक़बयानी इक तरफ़

2122---2122--212

साफ़गोई हक़बयानी इक तरफ़
और उसकी लनतरानी इक तरफ़

गो हमारी गुल फ़िशानी इक तरफ़
और उसकी बदगुमानी इक तरफ़

बंदिशें दुनिया की चाहे लाख हों
इश्क़ की अपनी कहानी इक तरफ़

सौ मसाइब ज़िंदगी के दरमियाँ
दो घड़ी की शादमानी इक तरफ़

सद बलाएँ राह मेरी रोकती हैं
पर ख़ुदा की मिहरबानी इक तरफ़

आप का ज़ौर-ए-सितम अपनी जगह
दिल की मेरी नातवानी इक तरफ़

क्या हुआ ’आनन’ जो पीरी आ गई
दिल की अपनी नौजवानी इक तरफ़ 

-आनन्द पाठक ’आनन’

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