अनुभूतियाँ 188/75
:1:
कैसे छुपा सकोगी बातें-
राज़ आँख से खुल जाती हैं ।
विरह वेदना मन की पीड़ा
कब आँसू से धुल पाती हैं ।
;2;
मन महका महका सा रहता
खुशियों का फिर रहता मौसम।
यह वक्त हमारा भी होता ,
तुम साथ अगर देते हमदम ।
:3:
यह प्रश्न तुम्हारा बेमानी
किसने किससे मुुँह मोड़ा है।
प्रारब्ध कहूँ, दुर्भाग्य कहूँ
किसने किसका दिल तोड़ा है।
:4:
एक बात बतला कर जाना
लौट के आना है क्या मुमकिन?
वरना तो जीने की खातिर
आँसू तनहाई है हर दिन ।
-आनन्द पाठक 'आनन'-
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