बुधवार, 7 जनवरी 2026

अनुभूतियाँ 189/76

 अनुभूतियाँ 189/76


:1:
सरगोशी कर रही हवा है
बात इधर की उधर कर रही
अगर भरोसा है तुम को खुद 
तो काहे को व्यर्थ डर रही ।

:2:
 एक  बात पूछी थी तुमसे
उत्तर तुमने अबतक न दिया
क्या मौन तुम्हारा मानू मैं
तुमने उसको स्वीकार किया ?

:3:
बात बनेगी फिर बिगड़ेगी
फिर काहे का शोक मनाना
अगर करम हो जाए उनक
बिगड़ी बात पुन: बन जाना ।

:4:
छोटी छोटी बातों को तुम
क्यों अपने दिल पर लेती हो
लोगों की सब कानाफूसी
क्यों न अनसुना कर देती हो ?

-आनन्द.पाठक ’आनन’

कोई टिप्पणी नहीं: