अनुभूतियाँ 189/76
:1:
सरगोशी कर रही हवा है
बात इधर की उधर कर रही
अगर भरोसा है तुम को खुद
अगर भरोसा है तुम को खुद
तो काहे को व्यर्थ डर रही ।
:2:
एक बात पूछी थी तुमसे
उत्तर तुमने अबतक न दिया
क्या मौन तुम्हारा मानू मैं
तुमने उसको स्वीकार किया ?
तुमने उसको स्वीकार किया ?
:3:
बात बनेगी फिर बिगड़ेगी
फिर काहे का शोक मनाना
अगर करम हो जाए उनक
बिगड़ी बात पुन: बन जाना ।
:4:
छोटी छोटी बातों को तुम
क्यों अपने दिल पर लेती हो
लोगों की सब कानाफूसी
क्यों न अनसुना कर देती हो ?
क्यों न अनसुना कर देती हो ?
-आनन्द.पाठक ’आनन’
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