ग़ज़ल 462[36-जी] : वह आदमी है ऐसा---
221---2122 // 221---2122
वह आदमी है ऐसा, ख़ुद को बड़ा बताता
बैठा जहाँ घड़ी भ, अपना ही गीत गाता ।
वह ख़ुदगरज़ है इतना, जब हाथ भी मिलाता
रिश्तों को अपने हक़ में, वह सीढ़ियाँ बनाता
ख़ामोशियाँ ये मेरी, कमज़ोरियाँ न समझो
अपनी ज़ुबाँ अदब की ,क्यों तुमको मुँह लगाता
यह नौजवान नस्लें. अपनी पे जब हैं आतीं
हुंकार जब ये भरतीं, मुर्दा भी जाग जाता ।
अब वो चमन नहीं है, गुंचे हुए सयाने
माली को आजकल अब, ख़ातिर में कौन लाता?
बीती बहार कब की, अब तो ख़िज़ां का आलम
इन सूखी डालियों पर , कौन आशियाँ बनाता !
कितना बचेगा ’आनन’, हर हाथ में है पत्थर
यह सरफ़िरों की बस्ती, क्यों आइना दिखाता ।
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें