बुधवार, 28 जनवरी 2026

ग़ज़ल 462[36-जी] : वह आदमी है ऐसा

 ग़ज़ल 462[36-जी] : वह आदमी है ऐसा---

221---2122  // 221---2122 

वह आदमी है ऐसा, ख़ुद को बड़ा बताता
बैठा जहाँ घड़ी भ, अपना ही गीत गाता ।

वह ख़ुदगरज़ है इतना, जब हाथ भी मिलाता
रिश्तों को अपने हक़ में, वह सीढ़ियाँ बनाता

ख़ामोशियाँ ये मेरी, कमज़ोरियाँ न समझो
अपनी ज़ुबाँ अदब की ,क्यों तुमको मुँह लगाता 

यह नौजवान नस्लें. अपनी पे जब हैं आतीं
हुंकार जब ये भरतीं, मुर्दा भी जाग जाता ।

अब वो चमन नहीं है, गुंचे हुए सयाने
माली को आजकल अब, ख़ातिर में कौन लाता?

बीती बहार कब की, अब तो ख़िज़ां का आलम
इन सूखी डालियों पर , कौन आशियाँ  बनाता !

कितना बचेगा ’आनन’, हर हाथ में है पत्थर
यह सरफ़िरों की बस्ती, क्यों आइना दिखाता ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-


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