गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

ग़ज़ल 465[39-जी] : ये भी कैसा निज़ाम है साहिब

 

ग़ज़ल 465[39-जी] : ये भी कैसा निज़ाम है, साहिब !

2122---1212--22

ये भी कैसा निज़ाम है , साहिब!
इश्क़ का, दिल गुलाम है साहिब !

जिस्म बस नाम ही का मेरा है
साँस तो उनके नाम है साहिब !

ज़िंदगी इक ग़ज़ल अधूरी है
ना मुकम्मल कलाम है साहिब !

और भी रोजगार दुनिया में-
ग़मगुसारी भी काम है साहिब !

सब के दिल में हो लौ मुहब्बत की
एक ही बस पयाम है साहिब !

एक ही राह के मुसाफ़िर हम
आख़िरत ही मक़ाम है साहिब !

हैफ़! क्या है नसीब ’आनन’ की
सुबह होते ही शाम है साहिब !

-आनन्द पाठक ’आनन’
880092 7181




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