ग़ज़ल 465[39-जी] : ये भी कैसा निज़ाम है, साहिब !
2122---1212--22
ये भी कैसा निज़ाम है , साहिब!
इश्क़ का, दिल गुलाम है साहिब !
जिस्म बस नाम ही का मेरा है
साँस तो उनके नाम है साहिब !
ज़िंदगी इक ग़ज़ल अधूरी है
ना मुकम्मल कलाम है साहिब !
और भी रोजगार दुनिया में-
ग़मगुसारी भी काम है साहिब !
सब के दिल में हो लौ मुहब्बत की
एक ही बस पयाम है साहिब !
एक ही बस पयाम है साहिब !
एक ही राह के मुसाफ़िर हम
आख़िरत ही मक़ाम है साहिब !
हैफ़! क्या है नसीब ’आनन’ की
सुबह होते ही शाम है साहिब !
सुबह होते ही शाम है साहिब !
-आनन्द पाठक ’आनन’
880092 7181
880092 7181
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें