सोमवार, 9 मार्च 2026

ग़ज़ल 466[40-जी] : मुक़ाबिल सच के होते ही---

 ग़ज़ल 466[40-जी] : मुक़ाबिल सच के होते ही---

1222----12222---1222---122


मुक़ाबिल सच के होते ही वो घबराने लगे हैं ।
अगर मैं सच कहूँ तो उनको अफ़साने लगे हैं ।

पले गमलों के ये पौधे चलेंगे धूप  में क्या !
ज़रा सी धूप होते ही ये मुरझाने ल्गे हैं ।

गया मौसम, गई ख़ुशबू, गई रौनक चमन की
जो अपने लोग थे अब दूर वो जाने लगे है ।

किनारे बैठ कर कुछ लोग बस बातें बनाते
गुहरवाले समंदर में उतर जाने लगे हैं ।

न दुनिया की ख़बर उनको, नहीं अपनी ख़बर हो
ज़माने को वही सब लोग दीवाने लगे हैं ।

परिंदो को कहाँ फ़ुरसत कि मुड़ कर फिर वो देखें
पुराने शाख, आँगन, पेड़ बेगाने लगे हैं ।

मुहब्बत को समझते जो बहुत आसान ’आनन’
निभाने पर जो आती बात कतराने लगे हैं ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-





कोई टिप्पणी नहीं: