ग़ज़ल 467 [41-जी] : तुम्हारे बिन हमारी ज़िंदगी
1222---1222---1222---1222
तुम्हारे बिन हमारी ज़िंदगी लगती अधूरी है ।
भले सब कुछ हमे हासिल, जिगर में नासबूरी है ।
कभी हम पास थे इतने, बदन दो एक थी धड़कन
ख़ता क्या हो गई हमसे कि उनसे आज दूरी है ।
वो आते भी तो क्यों आते, तुम्हारी तिशन्गी कमतर
तुम्हारी आरजू दिल की अभी आधी अधूरी है ।
भले तुम को कहो ख़ुद को सभी हैं जानते तुमको
भले तुम को कहो ख़ुद को सभी हैं जानते तुमको
अक़ीदा तो नहीं है ये, तुम्हारी जी हज़ूरी है ।
न जाने लोग क्यों उसको यहाँ पागल समझते हैं
न जाने लोग क्यों उसको यहाँ पागल समझते हैं
जो हक़ की बात करता है. उसे कहते फ़ितूरी है
चिराग़ों को डराती है हवा की साज़िशें अकसर
नताइज़ जो भी हो ’आनन’ मगर लड़ना ज़रूरी है ।
-आनन्द पाठक ’आनन’-
8800927181
-आनन्द पाठक ’आनन’-
8800927181
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