शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

ग़ज़ल 456[30-जी] अब न मिलता कोई शख़्स है

 

ग़ज़ल 456 [30-जी] : अब न मिलता कोई शख़्स है--
212---212---212---212


अब न मिलता कोई शख़्स है मोतबर
जिस पे कर लूँ भरोसा मैं दिल खोल कर

तुमको खुशबू मिले जो कभी राह में
सोचना यह थी उनकी कभी रहगुज़र

तुम मिले क्या मुझे दिल ये रोशन हुआ
इक अंँधेरे में जैसे हुई हो सहर  ।

वक़्त ने क्या न ढाए हैं मुझ पर सितम
फिर भी बिखरा नहीं हूँ अभी टूट कर

तेरी चाहत जिधर ले के चल तू मुझे
तू ही रस्ता दिखा ऎ मेरे  राहबर ।

ढूँढता ही रहा , वो न हासिल हुआ
ख़्वाब में जो था चेहरा रहा उम्र भर

तेरे सजदे में होने से क्या फायदा
सर तो सजदे में  है और तू बाखबर ?

चल पड़े हो जो ’आनन’ रह-ए-इश्क़ में
कू-ए-जानाँ से आना नहीं लौट कर ।

-आनन्द पाठक ’आनन’-
8800927181

मोतबर = विश्वसनीय, जिस पर एतबार किया जा सके

कू-ए-जानाँ = प्रेयसी की गली 

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