ग़ज़ल 450 [ 24-जी] : जिधर ज़र है, तुम्हे तो बस--
1222---1222---1222
जिधर ज़र है, तुम्हें तो बस उधर जाना
कि अपना क्या, है अपना दिल फ़क़ीराना ।
कि अपना क्या, है अपना दिल फ़क़ीराना ।
बदलते लोग कुछ ऐसे ज़माने में
कि जैसे रंग गिरगिट का बदल जाना ।
करें क्या बात उनसे दोस्ती का हम
जिन्हे आता नहीं रिश्ते निभा पाना
कहानी एक ही जैसी सभी की है ,
करोगे क्या मेरा सुनकर भी अफ़साना ।
गुज़र जाएगी अपनी मुफ़लिसी इक दिन
किसी के सामने क्या हाथ फैलाना ।
कभी है ज़िंदगी में शादमानी तो
कभी ग़म से मेरा रहता है याराना ।
यहीं है राह-ए- मयख़ाना भी ,मसजिद भी
तुम्ही अब तय करो ’आनन’ किधर जाना ।
-आनन्द. पाठक ’आनन’-
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