:1:
उस पार मेरा माही
टेरेगा जिस दिन
उस दिन तो जाना ही ।
:2:
जब दिल ही नहीं माना
क्या होगा लिख कर
कोई राजीनामा ।
तुम बिन मेरे साजन ।
चंद माहिए : क़िस्त 109/19
:1:
बदरा बरसै रिमझिम
आग लगाता है
तन में मद्धिम मद्धिम ।
:2:
शैलाब है जब आता
बादल जब फटता
मन अपना डर जाता ।
:3:
उड़ता तेरा आँचल
नील गगन में ज्यों
उड़ता रहता बादल ।
:4:
कुछ भी ना कहती हो
अन्दर ही अन्दर
बस घुटती रहती हो ।
:5:
क्या तुम को सुनानी है
जैसे सबकी है
अपनी भी कहानी है ।
-आनन्द.पाठक-
चन्द माहिए : 107 /17
:1:
चंद माहिए 106/16
1;
होली का है मौसम
छा जाती मस्ती
जब साथ रहे हमदम ।
2:
कान्हा खेलें होली
भाग रही बच कर
राधा रानी भोली ।
3:
खुशियॊ से भरी झोली
मिल कर खेलेंगे
हम रंग भरी होली
;4:
कुछ रंग गुलाल लिए
राह तेरी देखूँ
फूलों का थाल लिए ।
5
जब होली आती है
फूल बहक जाते
डाली मुस्काती हैं
-आनन्द.पाठक-
चन्द माहिए 105/15 [ उस पार]
:1:
कलियाँ हैं जन्नत की
ख़ूशबू आती है
माली के मिहनत की ।
:2:
कुदरत का करिश्मा है
कौन समझ पाया
उसकी क्या सीमा है ।
:3;
दर्या यह गहरा है
डूबा जो इसमें
फिर कब वो उबरा है!
क़िस्त 104 /14 [माही उस पार]
1
जब तुम न नज़र आए
लाख हसीं चेहरे
मुझको न कभी भाए
2
नफ़रत को हराना है
तो सबके दिल में
उलफ़त को जगाना है
3
बस्ती तो जलाते हो
क्या हासिल होता
यह क्यों न बताते हो?
4
गुलशन में महक कैसी?
तुम तो नही गुज़री
डाली में लचक कैसी?
5
माना कि अँधेरा है
धीरज रख प्यारे
होने को सवेरा है
-आनन्द.पाठक-
क़िस्त 103/13 [माही उस पार]
1
देखा जो कभी होता
ग़ौर से जब मुझको
मैं खुद में नहीं होता ।
2
ऎ दिल ! क्यॊं दीवाना
कब उसको देखा
पढ़ कर ही जिसे जाना ।
3
जो तेरे अन्दर है
देख ज़रा, पगले !
क़तरे में समन्दर है ।
4
भगवा कंठी माला
व्यर्थ दिखावा क्यों
जब मन तेरा काला ।
5
ऐसा भी आना क्या
"जल्दी जाना है"
हर बार बहाना क्या ।
चन्द माहिए 102/12 [होली पर] [माही उस पार]
;1:
रंगो के दिन आए
कलियाँ शरमाईं
भौरें जब मुस्काए
:2:
आई होली आई
आज अवध में भी
खेलें चारो भाई
:3:
हर दिल पर छाई है
होली की मस्ती
गोरी घबराई है
:4:
"कान्हा मत छेड़ मुझे"
राधा बोल रही
"हट दूर परे, पगले !"
:5:
होली के बहाने से
बाज न आएगा
तू रंग लगाने से ।
-आनन्द पाठक-
चन्द माहिए 101/11 : होली पर [माही उस पार]
:1:
होली में सनम मेरे
थाम मुझे लेना
बहके जो कदम मेरे
:2:
घर घर में मने होली
हम भी खेलेंगे
आ मेरे हमजोली
:3;
क्यों रंग लगाता है
दिल तो अपना है
क्यों दिल न मिलाता है?
:4:
क्यों प्रीत करे तन से
रंग लगा ऐसा
उतरे न कभी मन से ।
:5:
पूछे है अमराई
फागुन तो आया
गोरी क्यूँ नहीं आई ?
-आनन्द पाठक-
चन्द माहिए : क़िस्त 100/10 [माही उस पार]
:1:
क्या और सुनानी है
तेरी कहानी में
मेरी भी कहानी है
:2:
जीवन का सफ़र बाक़ी
हाथ पकड़ चलना
मेरे जीवन साथी !
3
छुप कर भी गुजरेगी
कोई कली जब भी
खुशबू तो बिखरेगी
4
जुल्मों की कहानी है
जिंदा हो तो फिर
आवाज उठानी है
5
अल्हड़ सी जवानी पर
इतना मत इतरा
इस जिस्म ए फानी पर
-आनन्द पाठक-
चन्द माहिए 99/09] : प्राण प्रतिष्ठा पर [माही उस पार]
:1:
जन जन के दुलारे हैं
आज अवध में फिर
प्रभु राम पधारे हैं
:2:
झूमेंगे नाचेंगे
प्राण प्रतिष्ठा में
श्री राम विराजेंगे
:3:
सपना साकार हुआ
राम लला जी का
मंदिर तैयार हुआ
:4:
प्रभु राम की सब माया
उनकी किरपा से
अब यह शुभ दिन आया
:5:
गिन गिन कर काटे दिन
स्वर्ग से उतरेंगे
भगवान सभी इस दिन
:6:
मंदिर की इच्छा में
पाँच सदी तक थे
दो नैन प्रतीक्षा में ।
:7:
प्रभु प्रेम में हो विह्वल
शर्त मगर यह भी
मन भाव भी हो निश्छल
-आनन्द.पाठक-
चन्द माहिए : क़िस्त 98/08 [माही उस पार]
1
रितु बासंती आई
और नशा भरती
गोरी की अँगड़ाई
2
आ मेरे हमजोली
साथ सजाते हैं
आँगन की रंगोली
3
भूली बिसरी यादें
सोने कब देतीं
करती रहतीं बातें
4
कुछ ख़्वाब तुम्हारे थे
और थे कुछ मेरे
सब कितने प्यारे थे
5
जीवन भर चलना है
वक़्त कहाँ रुकता
गिरना है सँभलना है
-आनन्द.पाठक-
क़िस्त 97/07 [होली 2023] [माही उस पार]
1
होली के दिन आए
आए न बालमवा
मौसम भी तड़पाए
2
रंगों का है मौसम
खेल रहे कान्हा
राधा भी कहाँ है कम
3
है प्रेम का रंग ऐसा
रंग अलग कोई
चढ़ता ही नहीं वैसा
4
होली का मज़ा क्या है
रंग लगा मन पे
इस तन में रखा क्या है
5
गोरी हँस कर बोली
" मन ही नहीं भींगा
फिर कैसी यह होली
-आनन्द.पाठक-
इन्ही माहियों को गाया है डा0 अर्चना पाण्डेय और उनकी बेटी रश्मि ने [ युगल गायन]
क़िस्त 96/06 [माही उस पार]
1
तुम पास जो आओ तो
प्यास मेरी देखो
खुल कर जो पिलाओ तो
2
कब प्यास बुझी सब की
नदियाँ प्यासी हैं
प्यासा है समन्दर भी
3-
इक बार ही नाम लिया
नाम तेरा लेकर
जग ने बदनाम किया
4
मैं कैसे कह पाता
छू देती गर तुम
तन और महक जाता
5
मौसम महका महका
रंग लगा देना
मन है बहका बहका
-आनन्द.पाठक-
क़िस्त 95/05 [माही उस पार]
1
सपनों के शीश महल
टूट ही जाना है
सच, आज नहीं तो कल
2
चलने की तैय्यारी
आ मेरी माहिया
कुछ और निभा यारी
3
मेरी भी गली में आ
ओ मेरी माहिया !
बस एक झलक दिखला
4
कांटों से भरी राहें
तेरे दर की हों
फिर भी तुमको चाहें
5
आसान नहीं होतीं
प्रेम नगर वाली
गलियाँ सँकरी होतीं
क़िस्त 94/04 [माही उस पार]
1
कुछ यादें रह जाती
सूनी आँखों में
आँसू बन कर आतीं
2
कोई मिल जाता है
राह-ए-मुहब्बत में
फिर क्यों खो जाता है?
3
कलियाँ सहमी सहमी
माली की नज़रें
दिखतीं बहकी बहकी
4
कुछ अपनी सीमाएँ
मर्यादा की हैं
हम भूल नहीं जाएँ
5
मैं इक प्यासा राही
मिलना है मुझको
उस पार मेरा माही
क़िस्त 93/ 03 [माही उस पार]
1
दुनिया की छोड़ो तुम
क्या करना इसका
दिल से दिल जोड़ो तुम
2
ख़्वाबों में मिला करना
लौट के आऊँगा
इक दीप जला रखना
3
अब क्या मजबूरी है
और सुना माहिया
तेरी बात अधूरी है
4
जानी पहचानी सी
लगती है तेरी
कुछ मेरी कहानी सी
5
बाग़ों के बहारों का
रंग चढ़ा मुझ पर
कलियों के नज़ारों का
क़िस्त 92/ 02[माही उस पार]
1
अब और न कर बातें
झेल चुकी हूँ मैं
हर बार तेरी घातें ।
2
टुकड़ा टुकड़ा जीवन
जोड़ के जीते हैं
जीने का है बन्धन
3
गो, सुनने में तीखे
पैसों के आगे
सब रिश्ते हैं फीके
4
आदाब मुहब्बत के
कुछ तो निभाते तुम
अन्दाज़ नज़ाक़त के
5
कैसी थी मुलाकातें
कुछ तो बता, गुइयाँ !
क्या क्या थी हुई बातें