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रविवार, 9 जून 2024

मुक्तक 17S: समंदर से [ क़ता’]

 मुक्तक 17 : समंदर से 

1/05
221---2121---1221---212
बस आप की झलक से ही चढ़ता सुरूर है
क्या इश्क़ है? अदब है, मुजस्सम शुऊर् है
हुस्न-ओ-जमाल यूं तो इनायत ख़ुदा की है
किस बात का हुज़ूर को इतना गुरूर है ।

2/22
2122----2122---2122---2122
इन्क़लाबी मुठ्ठियाँ तू खींच कर एलान कर दे
एक तिनके को ख़ुदा चाहे तो फिर जलयान कर दे
गर हवा सरमस्त भी हो क़ैद कर सकता है तू
हौसला दिल में जगा कर राह तू आसान कर दे ।


3/6
1222   1222   1222  1222
कभी लगता है, आने को ,अचानक आ के उड़ जाती 
जहाँ ख्वाबों को गाना था वहाँ पीड़ा स्वयं गाती
अजब क्या चीज है यह नींद जो आँखों में बसती है
जब आनी है तो आती है, नहीं आनी, नहीं आती

4/21
2122   2122   2122   212
आप  हैं  ईमां मुजस्सम, बेइमां हम भी नहीं
आप खुदमुख्तार हैं तो बेनिशाँ हम भी  नहीं
यह शराफत है हमारी आप की सुन गालियाँ
चुप हैं हम,वरना सुनाते बेजुबां हम भी नहीं।

-आनन्द पाठक-

इन्हीं मुक्तक कॊ आ0 विनोद कुमार उपाध्याय [ लखनऊ] की आवाज़ में यहाँ सुनें--

सुनिए-

https://www.facebook.com/share/v/15BTPL248B/

शुक्रवार, 7 जून 2024

मुक्तक 16 : समंदर से [क़ता’]

मुक्तक 16: समंदर से[ क़ता’]
1/25
1222---1222---1222---1222
अगर एहसास है ज़िंदा तो राह-ए-दिल सही मिलती
वगरना इन अँधेरों में कहाँ से रोशनी मिलती ।
तेरा होना, नही होना, भरम है भी तो अच्छा है 
न  होता तू तसव्वुर में कहाँ फिर ज़िंदगी मिलती ।

2/09
1222    1222  1222  22
नज़र आया उन्ही का हुस्न माह ए कामिल में
नहीं उतरा नहीं आया कोई उन सा दिल में
बचाता खुद को तो कैसे बचाता मै 'आनन'
बला की धार थी उनकी निगाह ए क़ातिल में

3/19
1222---1222---1222---122
न जाने किस दिशा से ग़ैब से ताक़ीद आती है
अभी कुछ साँस बाक़ी है, नज़र उम्मीद आती है
जो अफ़साना अधूरा था विसाल-ए-यार का ’आनन’
चलो वह भी सुना दो अब कि मुझको नींद आती है ।

4/18
1222---1222---1222---1222
ये उल्फ़त की कहानी है कि पूरी हो न पाती है
कभी अफ़सोस मत करना कि हस्ती हार जाती है
पढ़ो ’फ़रहाद’ के किस्से यकीं आ जायेगा तुमको
मुहब्बत में कभी ’तेशा’ भी बन कर मौत आती है ।

-आनन्द.पाठक-

-

गुरुवार, 6 जून 2024

मुक्तक 15 : समंदर से [क़ता’]

 मुक्तक 15 : समंदर से[क़ता’]

1/30

221---2121---1221---212

खुशियाँ तमाम लुट गई है कू-ए-यार में 

जैसे हरा-सा पेड़ कटा  हो बहार में ।

जैसे कटी है आज तलक ज़िंदगी मेरी

बाक़ी कटेगी वह भी तेरे इन्तजार में ।


2/31

221---2121---1221---212

चढ़ती हुई नदी थी, चढ़ी और उतर गई

जैसे कि आरज़ू  हो किसी की  बिखर गई

वैसे तमाम उम्र खुशी  ढूँढती रहीं

आ कर भी मेरे पास बगल से गुज़र गई


3/36

1222---1222---1222---1222

कभी इन्कार करती हो, कभी उपहार देती हो

मुझे हर बार जीने का नया आधार देती  हो,

मुहब्बत का अजब तेरा तरीका है मेरे जानम !

कभी पुचकार लेती हो, कभी दुतकार देती हो ।


4/27

221---2122 // 221-2122 

कश्ती भी पूछती है, साहिल कहाँ है मेरा

मजलूम ढूँढता है ,आदिल कहाँ है मेरा 

क़ातिल निगाह उनकी, ख़ंज़र भी उनके हाथों

उनसे ही पूछता हूँ, क़ातिल कहाँ है मेरा ।


-आनन्द.पाठक-





मुक्तक 14 : समंदर से [क़ता’]

मुक्तक 14:  समंदर से [क़ता’]


1/33
1222---1222---1222---1222
भला कब डूबने देंगे तुम्हारे चाहने वाले
दुआ कर के बचा लेंगे, तुम्हारे चाहने वाले
पता तुमको न हो शायद, इज़ाज़त दे के तो देखो
कि पलकों पर बिठा लेंगे, तुम्हारे चाहने वाले ।

2/13
2122--2122---212
 राह-ए-उल्फ़त में कभी ऐसा तो कर
दिल को तू पहले अभी शैदा तो कर
सिर्फ़ सजदे में पड़ा है बेसबब
इश्तियाक़-ए-इश्क़ भी पैदा तो कर । 

3/12
212---212--212---212
कोई कहता नहीं, उनसे मेरी तरह
कोई खुलता नहीं दिल से मेरी तरह
जो मिले मुझसे, चेहरे चढ़ाए हुए
कोई मिलता नहीं मुझसे मेरी तरह ।

4/29
2212----2212----2212----2212
नासेह ये तेरा फ़लसफ़ा नाक़ाबिल-ए-मंज़ूर
क्या सच यहाँ कि हूर से बेहतर वहाँ की हूर ?
याँ सामने है मैकदा और तू बना है पारसा
फिर क्यों ख़याल-ए-जाम-ए-जन्नत से हुआ मख़्मूर है ।

-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ
  [इश्तियाक-ए-इश्क़ = प्रेम की लालसा]\
पारसा = संयमी
मख़्मूर  = ख़ुमार में

बुधवार, 5 जून 2024

मुक्तक 13: समन्दर से [क़ता’]

 

मुक्तक 13 : समंदर से [क़ता’]

1/16

1222---1222---1222---1222

वो मेरे ख़्वाब क्या थे और क्या ताबीर थी मेरी

जो वक़्त-ए-जाँ-ब-लब देखा, फटी तसवीर थी मेरी

मिलाया ख़ाक में मुझको, जो पूछू तो मैं क्या पूछूं

हुनर था वो तुम्हारा या कि फिर तकदीर थी मेरी ।


2/03

1222---1222--1222--1222

 कहीं मुझको जो तुम दिखती, मैं बेबस क्यों मचलता हूं ?

कभी यह दिल भटकता है, कभी गिर कर सँभलता हूँ ।

ज़माने की हज़ारों बंदिशे क्यों फ़र्ज़ हो मुझ पर ?

अकेला मैं ही क्या ’आनन’ जो राह-ए-इश्क़ चलता हूँ ?


3/35

1222---1222---1222---1222

कभी जब आग लगती है किसी के दिल के अंदर तक

किसे परवा कि कितने पेंच-ओ-ख़म होंगे तेरे दर तक

अगर होती नहीं उसके लबों पर तिश्नगी ’आनन’

भला कटता सफ़र कैसे नदी का इक समंदर  तक ।


4/34

1222---1222---1222---1222

नवाज़िश भी नहीं उसकी, शिकायत भी नहीं करता

न जाने क्या हुआ उसको, क़राबत भी नही करता ।

ज़माने की हवाओं से वो क्यों बेजार  रहता है ,

वो नफ़रत तो नहीं करता, मुहब्बत भी नहीं करता ।


-आनन्द.पाठक-


सोमवार, 3 जून 2024

मुक्तक 12 : समन्दर से [क़ता’]

मुक्तक 12: समन्दर से [क़ता’]

1/38

221--2121--1221--212

वह झूठ बोलता है , हुनरमंद यार है

ईमान बेचकर भी वो ईमानदार है

कर के गुनाह-ओ-जुर्म भी वह मुस्करा रहा

कहते सभी वो शख़्स बड़ा होशियार है ।


2/37

221---2121---1221---212

क्या इश्क़ है ग़लत कि सही? और बात है,

हसरत अयाँ न हो कि दबी ,और बात है ,

हाज़िर है मेरी जान मुहब्बत में आप की

माँगा न आप ने ही कभी, और बात है ।


3/1

1222---1222----1222---1222

ये दिल बेचैन रहता है अगर उनको नही पाता

भले गुलशन हो सतरंगी, बिना उनके नहीं भाता

सकून-ओ-चैन, ज़ेर-ए-हुक्म उनके आने जाने पर

वो आते हैं तो आता है, नहीं आते नही आता ।

4/8

2122---2122---212 //2122---2122---212

झूठ कब बोला किए हैं आइने // ग़ौर से देखा नहीं खुद आप ने

खुद का चेहरा ख़ुद नज़र आता नहीं// जब तलक न आइना हो सामने ।


-आनन्द.पाठक-



शनिवार, 1 जून 2024

मुक्तक 11 : समन्दर से[ क़ता’]

 मुक्तक 11- समन्दर से [क़ता’]

1/14

कुछ करो या ना करो इतना करो
है बची ग़ैरत अगर ज़िन्दा  करो
 कौन देता है  किसी  को रास्ता
 ख़ुद नया इक रास्ता  पैदा  करो ।


2/17
महफ़िल में लोग आए थे अपनी अना के साथ
देखा नहीं किसी को भी ज़ौक़-ए-फ़ना  के साथ
नासेह ! तुम्हारी बात में नुक्ते की बात  है 
दिल लग गया है  मेरा किसी  आश्ना  के साथ\।

3/10
122---122---122--122
यूँ जितना भी चाहो दबे पाँव आओ
हवाओं की खुशबू से पहचान लूंगा
अगर  मेरे दिल से निकल कर दिखा दो
तो फिर हार अपनी चलो मान लूँगा |

4/07
1212   1122   1212   22
निकल गए थे कभी छोड़ कर जो घर अपने
तो मुड़ के देखते भी क्या नफ़ा-ज़रर अपने
जहाँ जहाँ पे दिखे थे हमें क़दम उनके
वही वहीं पे झुकाते गए थे  सर अपने  ।

 -आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ

नफ़ा-ज़रर = हानि-लाभ


मंगलवार, 7 मई 2019

ग़ज़ल 119 : झूठ का है जो फैला--

212--      -212--       -212
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़ाइलुन

एक ग़ज़ल : झूठ का है जो फैला धुआँ---

झूठ का है जो  फैला  धुआँ
साँस लेना भी मुश्किल यहाँ

सच की उड़ती रहीं धज्जियाँ
झूठ का दबदबा  था जहाँ

चढ़ के औरों के कंधों पे वो
आज छूने चला  आसमाँ

तू इधर की उधर की न सुन
तू अकेला ही  है  कारवाँ

जिन्दगी आजतक ले रही
हर क़दम पर कड़ा इम्तिहाँ

बेज़ुबाँ की ज़ुबाँ  है ग़ज़ल
हर सुखन है मेरी दास्ताँ

एक ’आनन’ ही तनहा नहीं
जिसके दिल में है सोज़-ए-निहाँ

-आनन्द.पाठक-

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शनिवार, 20 अप्रैल 2019

ग़ज़ल 118[57]: रँगा चेहरा है उसका---

बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन महज़ूफ़
1222---------1222-----1222-------122
मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन--फ़ऊलुन
----      -------       -----
एक ग़ज़ल : रँगा चेहरा है उसका--

रँगा चेहरा है उसका, हाथ कीचड़ में सना है
उसे क्या और करना, दूसरो पर फ़ेंकना  है

वो अपने झूठ को भी बेचता है सच बता कर
चुनावी दौर में बस झूठ का बादल  घना है

अकेला ही खड़ा है जंग के मैदान में  जो
हज़ारों तीर का हर रोज़ करता  सामना है

नज़र नापाक किसकी लग गई मेरे चमन को
बचाएँ किस तरह इसको, सभी को सोचना है

जुबाँ ऐसी नहीं थी आप की पहले कभी  तो
अदब से बोलना भी क्या चुनावों में मना है ?

उन्हे फ़ुर्सत कहाँ है जो कि सुनते हाल मेरा
उन्हें तो "चोर-चौकीदार" ही बस खेलना है

नहीं करता है कोई बात खुल कर अब तो ’आनन’
जमी है धूल  सब के आइनों पर ,पोछना है

-आनन्द पाठक-
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सोमवार, 15 अप्रैल 2019

ग़ज़ल 117[56] : कहाँ आवाज़ होती है--

बहर-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम
मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन--मफ़ाईलुन
1222----------1222---------1222--------1222
----    ----

एक ग़ज़ल : कहाँ आवाज़ होती है--


कहाँ आवाज़ होती है कभी जब टूटता है दिल
अरे ! रोता है क्य़ूँ प्यारे ! मुहब्बत का यही हासिल

मुहब्बत के समन्दर का सफ़र काग़ज़ की कश्ती में
फ़ना ही इसकी क़िस्मत है, नहीं इसका कोई साहिल

’मुहब्बत का सफ़र आसान है”- तुम ही तो कहते थे
अभी है  इब्तिदा प्यारे ! सफ़र आगे का है मुश्किल

समझ कर क्या चले आए, हसीनों की गली में तुम
गिरेबाँ चाक है सबके ,यहाँ हर शख़्स है  साइल

तरस आता है ज़ाहिद के तक़ारीर-ओ-दलाइल पर
नसीहत सारे आलम को खुद अपने आप से गाफ़िल

कलीसा हो कि बुतख़ाना कि मस्जिद हो कि मयख़ाना
जहाँ दिल को सुकूँ हासिल हो अपनी तो वही मंज़िल

न जाने क्या समझते हो तुम अपने आप को ’आनन’
जहाँ में है सभी नाक़िस यहाँ कोई नहीं कामिल


-आनन्द.पाठक-
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गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

ग़ज़ल 112[55]: इधर आना नहीं ज़ाहिद

1222--1222---1222---1222
एक ग़ज़ल : इधर आना नहीं ज़ाहिद

इधर आना नहीं ज़ाहिद , इधर रिन्दों की बस्ती है
तुम्हारी कौन सुनता है ,यहाँ अपनी ही मस्ती  है

भले हैं या बुरे हैं हम ,कि जो भी हैं ,या जैसे भी
हमारी अपनी दुनिया है हमारी अपनी हस्ती है

तुम्हारी हूर तुम को हो मुबारक और जन्नत भी
हमारे वास्ते काफी  हमारी  बुतपरस्ती  है

तुम्हारी और दुनिया है ,हमारी और है दुनिया
ज़हादत की वही  बातें ,यहाँ बस मौज़-मस्ती है

तुम्हारी मस्लहत अपनी ,दलाइल हैं हमारे भी
कि हम दोनो ही गाफ़िल हैं ये कैसी ख़ुदपरस्ती है ?

कभी छुप कर जो आना मैकदे में ,देखना ज़ाहिद
कि कैसे ज़िन्दगी आकर यहाँ मय को तरसती है

ज़माना तुमको ठुकराए तो फिर ’आनन’ से मिल लेना
भरा है दिल मुहब्बत से ,भले ही तंगदस्ती  है

-आनन्द पाठक-
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रविवार, 23 दिसंबर 2018

ग़ज़ल 111[38] : लोग क्या क्या नहीं कहा करते--

2122----1212----22
बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून


एक ग़ज़ल : लोग क्या क्या नहीं --

लोग क्या क्या  नहीं कहा करते
जब कभी तुमसे हम मिला करते

इश्क़ क्या है ? फ़रेब खा कर भी
बारहा इश्क़ की दुआ  करते

ज़िन्दगी क्या तुम्हे शिकायत है
कब नहीं तुम से हम वफ़ा करते

दर्द अपना हो या जमाने का
दर्द सब एक सा लगा करते

हाथ औरों का थाम ले बढ़ कर
लोग ऐसे कहाँ मिला करते

इश्क़ उनके लिए नहीं होता
जो कि अन्जाम से डरा करते

दर्द अपना छुपा के रख ’आनन’
लोग सुनते है बस,हँसा करते

-आनन्द पाठक-
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गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

ग़ज़ल 110[54] : राम की बात करते--


ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन---मफ़ाइलुन----फ़े’लुन
2122---------1212-----22



राम मन्दिर की बात करते हैं
’वोट’ से झोलियाँ वो भरते हैं

अह्ल-ए-दुनिया की बात क्या करना
लोग दम झूठ का ही भरते हैं

कौन सुनता है हम ग़रीबों की
साँस लेते हुए भी मरते हैं

जो भी कहना है बरमला कहिए
बात क्यों यूँ घुमा के करते हैं

आप की कोशिशें हज़ार रहीं
टूट कर भी न हम बिखरते हैं

आप से क्या गिला करें ’आनन’
कस्में खाते हैं फिर मुकरते हैं

-आनन्द.पाठक-


बरमला= खुल्लम खुल्ला

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

ग़ज़ल 109[53]: आज इतनी मिली है--

एक ग़ज़ल : आज इतनी मिली है--
212----212----212---212


आज इतनी मिली है  ख़ुशी आप से
दिल मिला तो मिली ज़िन्दगी आप से

तीरगी राह-ए-उल्फ़त पे तारी न हो
छन के आती रहे रोशनी  आप से

बात मेरी भी शामिल कहीं न कहीं
जो कहानी सुनी आप की आप से

राज़-ए-दिल ये कहूँ भी तो कैसे कहूँ
रफ़्ता रफ़्ता मुहब्बत  हुई  आप से

गर मैं पर्दा करूँ भी तो क्योंकर करूँ
क्या छुपा जो छुपाऊँ अभी आप से

या ख़ुदा अब बुझे यह नहीं उम्र भर
प्रेम की है अगन जो लगी आप से

ठौर कोई नज़र और आता नहीं
दूर जाए न ’आनन’ कभी आप से

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 16 नवंबर 2018

ग़ज़ल 108[51] : वक़्त सब एक सा नहीं होता---

एक ग़ज़ल :

2122---1212---22
वक़्त सब एक सा  नहीं होता
सुख हो दुख , देरपा नहीं होता

आदमी है,गुनाह  लाज़िम है
आदमी तो ख़ुदा  नहीं  होता

एक ही रास्ते से जाना  है
और फिर लौटना नहीं होता

किस ज़माने की बात करते हो
कौन अब बेवफ़ा नहीं  होता ?

हुक्म-ए-ज़ाहिद पे बात क्या कीजै
इश्क़ क्या है - पता नहीं  होता

लाख माना कि इक भरम है मगर
नक़्श दिल से जुदा नहीं होता

बेख़ुदी में कहाँ ख़ुदी ’आनन’
काश , उन से मिला नहीं होता

-आनन्द.पाठक- 

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

ग़ज़ल 107[01] : एक समन्दर मेरे अन्दर----

बह्र-ए-मुतक़ारिब असरम मक़ूज़ मक़्बूज़ सालिम अल आखिर
मूल   बह्र ------फ़ अ’ लु   -फ़ऊलु--फ़ऊलु---फ़ऊलुन
                          21---------121------121-------122
------------------------------

ग़ज़ल : एक समन्दर ,मेरे अन्दर...

एक  समन्दर ,  मेरे  अन्दर
शोर-ए-तलातुम बाहर भीतर

एक तेरा ग़म  पहले   से ही
और ज़माने का ग़म उस पर

तेरे होने का भी तसव्वुर
तेरे होने से है बरतर

चाहे जितना दूर रहूँ  मैं
यादें आती रहतीं अकसर

एक अगन सुलगी  रहती है
वस्ल-ए-सनम की, दिल के अन्दर

प्यास अधूरी हर इन्सां  की 
प्यासा रहता है जीवन भर

मुझको ही अब जाना  होगा   
वो तो रहा आने  से ज़मीं पर 

सोन चिरैया  उड़ जायेगी     
रह जायेगी खाक बदन पर   

सबके अपने  अपने ग़म हैं
सब से मिलना’आनन’ हँस कर

-आनन्द पाठक-

[सं 30-06-19]

शनिवार, 29 सितंबर 2018

ग़ज़ल 103[13] : हुस्न उनका जल्वागर था---

एक ग़ज़ल ----
2122---2122---212

हुस्न उनका जलवागर थ ,नूर था
"मैं" कहाँ था ? बस वही थे,’तूर’ था

होश में आया न आया ,क्या पता
बाद उसके उम्र भर मख़्मूर था

 रोशनी का एक पर्दा  सामने
पास आकर भी मैं कितना दूर था

एक लम्हे की सज़ा इक उम्र थी
वो तुम्हारा कौन सा दस्तूर था

अहल-ए-दुनिया का तमाशा देखना
क्या यही मेरे लिए मंज़ूर था ?

ख़ाक में मिलना था जब  वक़्त-ए-अजल
किस लिए इन्सां यहाँ मग़रूर था ?

राह-ए-उलफ़त में हज़ारों मिट गए
सिर्फ़ ’आनन’ ही नहीं मजबूर था

-आनन्द.पाठक-

[सं 30-06-19]

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

ग़ज़ल 102[22] : पयाम-ए-उल्फ़त मिला तो होगा--

ग़ज़ल 102 : पयाम -ए-उलफ़त मिला तो होगा----

121--22/121-22/121-22/121-22

पयाम-ए-उल्फ़त मिला तो होगा ,न आने का कुछ बहाना होगा
मेरी अक़ीदत में क्या कमी थी ,सबब ये तुम को बताना होगा

जो एक पल की ख़ता हुई थी ,वो ऐसा कोई गुनाह कब थी
नज़र से तुमने गिरा दिया है,तुम्ही को आकर उठाना होगा

ख़ुदा के बदले सनमपरस्ती .ये कुफ़्र है या कि बन्दगी है
हद-ए-जूनूँ में ख़बर न होगी ,ज़रूर कोई दिवाना  होगा

मेरी मुहब्बत है पाक दामन ,रह-ए-मुक़्द्दस में  नूर-अफ़्शाँ
तो फिर ये पर्दा है किस से जानम,निक़ाब रूख से हटाना होगा

इधर है मन्दिर उधर मसाजिद ,कहीं कलीसा की चार बातें
सभी की राहें जो मुख़्तलिफ़ हैं ,तो क्या है यकसा ?बताना होगा

कहीं थे काँटे ,कहीं था सहरा, कहीं  था दरिया ,कहीं था तूफ़ां
कहाँ कहाँ से नहीं हूँ गुज़रा , ये राज़ तुमने न जाना होगा

रहीन-ए-मिन्नत रहूँगा ’आनन’,कभी वो गुज़रें अगर इधर से
अज़ल से हूँ मुन्तज़िर मैं उनका. न आएँ हैं वो, न आना होगा

-आनन्द.पाठक-

सं 07-02-2021

[सं 22-07-19]

शनिवार, 22 सितंबर 2018

ग़ज़ल 98[50] : कौन बेदाग़ है---


212---212---212---212
एक ग़ज़ल

कौन बेदाग़  मैला है दामन  नहीं ?
जिन्दगी में जिसे कोई उलझन नहीं ?

हर जगह पे हूँ मैं उसकी ज़ेर-ए-नज़र
मैं छुपूँ तो कहाँ ? कोई चिलमन नहीं

वो गले क्या मिले लूट कर चल दिए
लोग अपने ही थे कोई दुश्मन नहीं

घर जलाते हो तुम ग़ैर का शौक़ से
क्यों जलाते हो अपना नशेमन नहीं ?

बात आकर रुकी बस इसी बात पर
कौन रहजन है या कौन रहजन नहीं

सारी दुनिया ग़लत आ रही है नज़र
साफ़ तेरा ही मन का है दरपन नहीं

इस चमन को अब ’आनन’ ये क्या हो गया
अब वो ख़ुशबू नहीं ,रंग-ए-गुलशन नहीं

-आनन्द.पाठक--

शनिवार, 8 सितंबर 2018

ग़ज़ल 101[49] : झूठ का जब धुआँ --


एक ग़ज़ल :
212---212---212---212
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन
---------------------------

झूठ का  ये धुआँ जब घना हो गया
सच  यहाँ बोलना अब मना हो गया

आईने को ही फ़र्ज़ी बताने लगे
आइने से कभी सामना हो गया

रहबरी भी तिजारत हुई आजकल
जिसका मक़सद ही बस लूटना हो गया

जिसको देखा नहीं जिसको जाना नहीं
क्या कहें ,दिल उसी पे फ़ना हो गया

रफ़्ता रफ़्ता वो जब याद आने लगे
बेख़ुदी में ख़ुदी  भूलना हो गया

रंग चेहरे का ’आनन’ उड़ा किसलिए ?
ख़ुद का ख़ुद से कहीं सामना हो गया ?

-आनन्द.पाठक-

[सं0 25 -09-18]