शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

ग़ज़ल 107 : एक समन्दर मेरे अन्दर----

बह्र-ए-मुतक़ारिब असरम मक़ूज़ मक़्बूज़ सालिम अल आखिर
मूल   बह्र ------फ़ अ’ लु   -फ़ऊलु--फ़ऊलु---फ़ऊलुन
                          21---------121------121-------122
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ग़ज़ल : एक समन्दर ,मेरे अन्दर...

एक  समन्दर ,  मेरे  अन्दर
शोर-ए-तलातुम बाहर भीतर

एक तेरा ग़म  पहले   से ही
और ज़माने का ग़म उस पर

तेरे होने का भी तसव्वुर
तेरे होने से है बरतर

चाहे जितना दूर रहूँ  मैं
यादें आती रहतीं अकसर

एक अगन सुलगी  रहती है
वस्ल-ए-सनम की, दिल के अन्दर

प्यास अधूरी हर इन्सां  की 
प्यासा रहता है जीवन भर

मुझको ही अब जाना  होगा   
वो तो रहा आने  से ज़मीं पर 

सोन चिरैया  उड़ जायेगी     
रह जायेगी खाक बदन पर   

सबके अपने  अपने ग़म हैं
सब से मिलना’आनन’ हँस कर

-आनन्द पाठक-

[सं 30-06-19]

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