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शनिवार, 14 जनवरी 2023

अनुभूतियाँ : क़िस्त 113

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 113 ओके
449
भली रही या बुरी रही थी ,
एक लगन की एक अगन थी,
तेरे घर की राहें दुष्कर,
लेकिन चाहत आजीवन थी ।
 
 
450
दुनिया चाहे जो भी समझे,
’अनुभूति’ के रंग हमारे,
वक़्त कसौटी पर जाँचेगा,
रंग निखर आएँगे  सारे ।
 
451
जब हमने ख़ुद राह चुनी है,
राह-ए-मुहब्बत, राह फ़ना की
दोष किसी को फिर देना क्या
किसने छोड़ी राह वफ़ा  की ।
 
452
सच का साथ न छोड़ा मैने,
द्वन्द  रहा आजीवन मन में.
साँस साँस बन हर पल उतरी,
’अनुभूति’ मेरे जीवन में ।
00---00---00
आखिरी बंद

वेदनाएँ तड़प कर बनी बिजलियाँ
जब न पीड़ा मेरी ढल सकी शब्द में
बन के आँसू ढली मेरी अनुभूतियाँ
 
 
-- समाप्त-

भावनाएँ कभी बन गईं तितलियाँ


अनुभूतियाँ : क़िस्त 112

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 112 ओके
445
क़तरा क़तरा मिल जाता है
बन जाता है एक समन्दर,
भेद खत्म फिर हो जाता है
क्या था बाहर, क्या था अन्दर ।
 
446
कुछ तो कमियाँ सब के अन्दर
सबको क्या सब कुछ हासिल है ?
कब होता इन्सान फ़रिश्ता
हस्ती किसकी कब कामिल है ?
 
447
यह "अनुभूति" नही किसी की
तेरी, मेरी, हम सबकी है,
फ़र्क यही कि मैने कह दी
और सभी ने बस सह ली है ।
 
448
प्रेम समर्पण एक साधना
चलता नहीं दिखावा इसमें
पाने की कुछ चाह न रहती
बस देना ही देना जिसमें
-आनन्द.पाठक-
 
 

अनुभूतियाँ : क़िस्त 111

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 110 ओके
441
गिरना-पड़ना, उठना-चलना
पाना-खोना, हँसना-रोना ,
प्यार-मुहब्बत, मिलन जुदाई
जब तक साँस तभी तक होना ।
 
442
पीड़ा की अपनी पीड़ा है
दुनिया कहाँ सुना करती है ?
अपनी ही बस गाती रहती
अपनी राह चला करती है ।
 
443
आँख भिगोने वाली बातें
 क्यों करती रहती तुम अकसर
द्वार हृदय का खुला हुआ है
 जब दिल चाहे  आना दिलबर।
 
444
पाप-पुण्य का बोझ उठाए
घूम रही हो तुम दुनियाभर
सत्य विवेचन कर देगा मन
झाँकोगी जब मन के अन्दर
 
 

शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

अनुभूतियाँ : क़िस्त 110

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 110 ओके
437
प्रेम अगन ही एक अगन है
अपने आप दहक जाती है,
जितना इसे बुझाना चाहो
उतनी  और भड़क जाती है ।
 
438
बिन्दु-वृत्त का जो है रिश्ता
उस त्रिज्या से सधे हुए हैं
एक परस्पर आकर्षण से,
हम तुम दोनों बँधे हुए हैं ।
 
439
अंधकार हो अगर हॄदय में,
आशा की भी किरन वहीं है
हार मान कर बैठे रहना
यह कोई संघर्ष नहीं  है ।
 
440
अगर चला जाता है कोई ,
दुनिया भला कहाँ रुक जाती
चार दिनों के बाद वही फिर
लौट के पटरी पर है आती ।
 

अनुभूतियाँ : क़िस्त 109

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 109 ओके
433
ऐसे लोग बहुत हैं जिनको
साँस-साँस बन मिला न कोई,
उम्र प्रतीक्षा में कट जाती
फिर भी शिकवा गिला न कोई।
 
434
तेरी आँखों से पढ़ता हूँ
अपनी कुछ अनकही कहानी
खिलने से पहले ही कैसे
ढल जाती है भरी जवानी
 
435
अपनी चाहत फ़ना हुई है
एक आख़िरी चाह बची है
आ जाओ तो ठीक है वरना
एक आख़िरी राह बची है
 
436
तुम्ही समाए हो जब अन्दर
तो  फिर मै बाहर क्यों देखूँ ?
 अपना ही मन काबा-काशी
और किसी का दर क्यों देखूँ ?
 
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अनुभूतियाँ : क़िस्त 108

अनुभूतियाँ : क़िस्त 108 ओके
 
429
बाजी बिछी हुई है, प्यारे !
हम बिसात के सब मोहरे हैं,
हाथी -घोड़ा ,राजा-रानी
एक बुलावे तक ठहरे हैं ।
 
430
छाप-तिलक या माला भगवा
ये साधन है, साध्य नहीं हैं,
यह तो एक छलावा भर है
मन में जब ’आराध्य’ नहीं हैं।
 
431
कभी कभी बीती यादों से
आँखें भर आती बेमौसम
जाने कहाँ गए वो दिन अब
पहलू में होता था हमदम ।
 
432
मेघदूत ! बस एक बार फिर
जा कर कह दे पाषाणी  से
"व्यर्थ विवेचन करना इस पर
दिल तोड़ा किसने वाणी से?"

अनुभूतियाँ : क़िस्त 107

 अनुभूतियाँ : क़िसत 107 ओके
425
पा न सका हूँ अबतक मंज़िल
हर मंज़िल की एक कथा है
याद करूँ तो आँखें नम हो
हर आँसू की एक व्यथा है
 
426
जनम जनम की बात हुई थी
एक जनम भी नहीं निभाया !
अच्छा, कोई बात नहीं, प्रिय !
सदा रहूँगी बन कर छाया ।
सदा रहूँगी बन कर छाया ।
 
427
जब श्रद्धा के फूल न खिलते
तो फिर  पूजन-अर्चन क्या है ,
तुम ही उतरो जब न हॄदय में
ढोल-मजीरा कीर्तन क्या है ।
 
428
प्रेम का धागा ,कच्चा धागा
लेकिन पक्के से पक्का है ,
प्रेम न होता हवा-हवाई
सच्चे से भी वह सच्चा है ।
 

अनुभूतियाँ : क़िस्त106

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 106 ओके
421
जाने क्या है चाहे जितनी
लरज गरज कर बदली बरसी।
प्यास है ऐसी, बुझी न अबतक
प्यासी धरती फिर से तरसी ।
 
422
कहने की तो बात नहीं है
बिना कहे दिल रह ना पाए
दर से जिसको उठा दिए तुम
अब वो कहाँ किधर को जाए?
 
423
जितनी बार मिली तुम मुझ से
नज़र झुकाए देखा मैने,
मर्यादा की जो रेखा थी
पार न की वो रेखा मैने ।
 
424
उतना ही सच नहीं कि जितना
ये आंखें जो देखा करती ,
परदे के पीछे भी सच है
मै ही क्या सब दुनिया कहती। 
 
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अनुभूतियाँ : क़िस्त 105



 अनुभूतियाँ : क़िस्त 105 ओके
 417
इधर उधर की बातें क्यों तुम
करती रहती घुमा फिरा कर,
क्यों मुझको भरमाती रहती
झूठी मूठी बात बना कर ।
 
418
नज़र झुका कर फिर न उठाना
मुझको काफी एक इशारा ,
दिल की बात अगर मैं  कह दूँ
तुम को शायद हो न गवारा ।
 
419
छू कर आतीं मृदुल हवाएँ
जब जब तेरा कोरा आँचल,
रोम-रोम तब खिल उठता है
मन मेरा हो जाता  पागल ।
 
420
सच है कि वो नज़र न आता
होने का एहसास है लेकिन ,
शीतल मन्द सुगन्ध हवा-सी
पास सदा रहता है लेकिन ।
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अनुभूतियाँ :क़िस्त 104

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 104 ओके


413
इतना मुझको डरा न पगली !
जान निकल जाएगी मेरी,
कर्मों का फल सबको मिलता
बात नई क्या इसमे तेरी ?
 
414
कौन इधर से गुज़रा है जो
महक रहा है सारा गुलशन
बेमौसम आ गईं बहारें
कलियाँ कलियाँ करती नर्तन ।
 
415
रूप-राशि से अपनी, सुमुखी !
मत बाँधों इस भोले मन को
तोड़ न पाऊँगा जीवन भर
भुजपाशों के इस बंधन को ।
 
416
क्या क्या गुजरी दिल पर मेरे
क्या क्या तुमको बतलाऊँ मैं
आँसू मेरे, अपने ग़म से
दिल को अपने बहलाऊँ मैं ।
 
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अनुभूतियाँ : क़िस्त 103

 

अनुभूतियाँ 103 ओके
409
" कैसे हो,जी! कैसे हो, जी ! "
और न फिर कुछ बातें करना
हर दिन तुमको क्या यह सूझी ?
 
410
’तालिबानी’-सोच भरा है
कुछ लोगों के मन के अन्दर,
नाम भले हों ऊँचे-ऊँचे
काम से लेकिन हैं बौने भर ।
 
411
नावाक़िफ़ हो, कैसे कह दूँ ,
इतनी तो नादान नहीं तुम,
प्यार मुहब्ब्त की बातों से
इतनी भी अनजान नहीं तुम ।
 
412
कलियाँ झूम रही गुलशन में
बागबान की बुरी नज़र है,
इक दिन चुन कर ले जायेगा
कलियों को कब कहाँ ख़बर है?
 
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सुबह शाम तुम पूछा करती

अनुभूतियाँ: क़िस्त 102

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 102 ओके
405
हो जाएँगी ख़ुशियाँ बोझिल
अगर न तुम इनको बाँटोगी
स्वर्ण महल में कब तक आख़िर
तनहा तनहा दिन काटोगी ?
 
406
वादे करना, क़समें खाना
उसकी आदत में शामिल है,
और न कोई एक निभाना
क्यों न कहूँ मैं, वह बातिल है।
 
407
मन भारी था, दर्द कमर में
रोज़ रोज़ के नए बहाने,
इश्क़ इबादत, प्रेम समर्पण
क्या होता है, वह क्या जाने।
 
408
कब तक भोली बनी रहोगी
कब तक ये बचकानी बातें,
कब तक मैं समझाऊँ तुमको
कुछ तो करो सयानी बातें ।
 
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अनुभूतियाँ : क़िस्त101

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 101 ओके
401
सोने के मृग कब होते हैं
जान रही है दुनिया सारी
लिखा हुआ है वो होना है
भाग्य-लेख कब जाए टारी
402
दुखती रग पर उँगली रख दी
तुमने जाने या अनजाने
ज़ख़्म हमारे हरे हो गए
दर्द लगे हैं फिर से गाने ।
 
403
कब काटी है बात तुम्हारी
तुमने कहा सुना है मैने
तुनक-मिजाज़ी से वाकिफ़ था
फिर भी तुम्हे चुना है मैने॥
 
404
मन मुझसे कहता रहता है
प्रेम विधा है, एक समर्पन
सभी समाहित होते इसमे
श्रद्धा भक्ति पूजन-अर्चन ।
 
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गुरुवार, 12 जनवरी 2023

अनुभूतियाँ : क़िस्त 100

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 100 ओके
397
जिस दिन ज्वार उठेगा मन में
साहिल तक लहरें आएँगी,
चुपके चुपके दिल की बातें
साहिल से कह कर जाएँगी ।
 
398
जो बीता, सो बीत गया अब
ग़लत-सही की बातें छोड़ो.
दिख जायेगी कुछ तो ख़ूबी
अगर न मुँह तुम मुझसे मोड़ो

399
अपनी मरजी के मालिक तुम
क्या मैं इस पर कह सकता हूँ,
अगर लिखी होगी तनहाई
तो तनहा भी रह सकता हूँ ।
 
400
’अनुभूति’ यह नई नहीं  है
हर मन की यह एक व्यथा है,
सूरज उगने से ढलने तक
सुख-दु:ख की बस एक कथा है ।

अनुभूतियाँ : क़िस्त 099

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 099 ओके


393
इतना तो मालूम नहीं है
खुशियाँ कब आतीं कब जातीं,
लेकिन मेरी तनहाई में
यादें तेरी साथ निभातीं
      394
आख़िर सुख की सीमा क्या है
कितने सुख को सुख समझोगी ?
क्यों लगता दुख परबत जैसा
कब तक दुखड़ा तुम रोओगी ?
395
एक द्वन्द चलता रहता है
आजीवन इस मन के अन्दर,
पाप-पुण्य क्या, ग़लत सही क्या
मन उलझा रहता जीवन भर।
396
ढूँढ रहा हूँ जाने किसको
जिसको ढूँढ न पाए ज्ञानी,
लेकिन सच की प्यास एक है
सदियों की, जानी पहचानी ।
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अनुभूतियाँ : क़िस्त 098

 
अनुभूतियाँ : क़िस्त 098 ओके
389
जीवन भर चलता रहता है
एक तमाशा मेरे आगे ,
आ जाती है नींद किसी को
कोई सुबह सुबह ही जागे ।
 
390
क़तरे में है बसा समन्दर
या कि समन्दर में क़तरा है,
जब आपस में मिल जाना है
क्यों रहता तन पर पहरा है ?
 
391
सुख-दु:ख की है आँख मिचौली
हार-जीत का यह खेला है ,
जीवन क्या है? आना-जाना
चार दिनों का बस मेला है ।
 
392
ग़म के साथ पला करते हैं
आने वाले कल के सपने,
और पता यह भी चल जाता
कौन पराया ,कौन हैं अपने ।
 
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अनुभूतियाँ : क़िस्त 097

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 097
385
धुआँ भर गया है कमरे में
खोलो खिड़की दरवाजे सब,
वरना घुट कर मर जाओगी
नई हवाएँ आने दो अब ।
 
386
याद नहीं कुछ रहता अब तो
सुबह हुई या शाम हुई है
कौन गया कब, कौन आया है
हस्ती किसके नाम हुई है ।
 
387
कौन छुपा है दिल के अन्दर
नयन तुम्हारे बोला करते
दर्द तुम्हारा तुम से पहले
आँसू बन कर डोला करते ।
 
388
इश्क़ हक़ीक़ी, इश्क़ मजाज़ी
एक इश्क है, पहलू दो हैं
फ़र्क़ नहीं फिर रह जाता है
एक जगह जब मिलते वो हैं ।

अनुभूतियाँ : क़िस्त 096

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 096 ओके
381
अन्तर्मन से अन्तर्मन का 
जब अटूट हो जाता बंधन,
गौण सभी तब हो जाते है
रूप-राशि तन का आकर्षन ।
 
382
कल न रहूँगा साथ तुम्हारे
रुकना नहीं सफ़र में अपने,
धीरज रख कर पूरा करना
हम दोनों के जो थे सपने ।
 
383
जीवन क्या? संघर्ष कथा है
दीप-शिखा की तूफ़ानों से,
दुनिया तुम को पहचानेगी
ज्योति-पुंज के अभियानों से ।
 
384
धीरे-धीरे आखिर हम-तुम
इतनी दूर चले ही आए ,
कहती हो तुम वापस जाऊँ
तुम को कौन भला समझाए ।
 

अनुभूतियाँ : क़िस्त 095

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 095 ओके
377
खुशबू भला कहँ बँध पाती
कलियों, फूलों के बंधन में,
पंख हवाओं के लगते ही
छा जाती गुलशन गुलशन में ।
 
378
चाहत नहीं मरा करती है
एक तेरे ठुकराने भर से ,
साँस साँस में घुली हुई है
देख सको गर खुली नज़र से ।
 
379
एक प्रश्न पूछा था तुमने
दे न सका था उस दिन उत्तर,
कितना ढूँढा पोथी-पतरा
उत्तर था बस " ढाई-आखर’।
 
380
सार यही जीवन का समझो
निश्छल पावन प्रेम समर्पन,
पोथी-पतरा मैं क्या जानूँ
जानूँ एक यही बस ’दर्शन’।
 

अनुभूतियाँ : क़िस्त 094

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 094
373
जब तक है चेतना तुम्हारी
तब तक इसको थाती समझो,
जबतक साँस तभी तक तुम हो
वरना तन फिर माटी समझो
 
374
सूरज जबतक चमक रहा है
जो करना है कर जाना  है,
शाम ढलेगी तो फिर सबको
अपने अपने घर जाना है ।
 
375
सबकी यूँ पहचान अलग है
लेकिन भीतर सत्व एक है,
रंग-रूप हो अलग अलग पर
सब के अन्दर ’तत्व ’ एक है
 
 
376
रात गई सो बात गई अब
उन बातों को दुहराना क्यों
नई सुबह की नई किरन में
फिर से सबको बतलाना क्यों ।