अनुभूतियाँ : क़िस्त 109
अनुभूतियाँ : क़िस्त 109 ओके
433
ऐसे लोग बहुत हैं जिनको
साँस-साँस बन मिला न कोई,
उम्र प्रतीक्षा में कट जाती
फिर भी शिकवा गिला न कोई।
434
तेरी आँखों से पढ़ता हूँ
अपनी कुछ अनकही कहानी
खिलने से पहले ही कैसे
ढल जाती है भरी जवानी
435
अपनी चाहत फ़ना हुई है
एक आख़िरी चाह बची है
आ जाओ तो ठीक है वरना
एक आख़िरी राह बची है
436
तुम्ही समाए हो जब अन्दर
तो फिर मै बाहर क्यों देखूँ ?
अपना ही मन काबा-काशी
और किसी का दर क्यों देखूँ ?
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