और हवाओं की सरगोशी,
कह देती है सारी बातें
एक तेरी लम्बी ख़ामोशी।
जो कहना है कह दो खुल कर
मन के अन्दर क्यों रखती हो?
जान रहा हूँ दर्द तुम्हारा
दर्द छुपा कर क्यों रखती हो ?
दुनिया क्या है आडम्बर है
और जाल में फँस जाना है,
छोड़ यहीं तू चल जायेगा
जिस दिन डोरी कस जाना है ।
धोने को तो रोज़ हैं धोते
मन का मैल नहीं धुल पाता,
मन का द्वार नहीं खुल जाता ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें