शनिवार, 14 जनवरी 2023

अनुभूतियाँ : क़िस्त 112

 

445

क़तरा क़तरा मिल जाता है

बन जाता है एक समन्दर,

भेद खत्म फिर हो जाता है

क्या था बाहर, क्या था अन्दर ।

 

446

कुछ तो कमियाँ सब के अन्दर

सबको क्या सब कुछ हासिल है ?

कब होता इन्सान फ़रिश्ता

हस्ती किसकी कब कामिल है ?

 

447

यह "अनुभूति" नही किसी की

तेरी, मेरी, हम सबकी है,

फ़र्क यही कि मैने कह दी

और सभी ने बस सह ली है ।

 

448

प्रेम समर्पण एक साधना

चलता नहीं दिखावा इसमें

पाने की कुछ चाह न रहती

बस देना ही देना जिसमें

 

 

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