शनिवार, 23 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 228 [92] सबक़ उलफ़त का दुहराते---

 ग़ज़ल 228 [92]


1222--1222---1222--1222


सबक़ उलफ़त का पढ़ आते ,नज़ारा और कुछ होता

अगर नफ़रत न फैलाते , नज़ारा और कुछ होता ।


जहाँ पत्थर थे बरसाए, जहाँ तलवार लहराए

वहाँ गर फूल बरसाते ,नज़ारा और कुछ होता ।


जलाते जा रहे हो बस्तियाँ, दूकाँ ,मकाँ ,छप्पर

ज़हानत पर उतर आते, नज़ारा और कुछ होता ।


अगर तुम क़ैद ना करते चमन के रंग, ख़ुशबू तो

सुमन हर डाल खिल जाते, नज़ारा और कुछ होता ।


फ़रेबी रहनुमाओं के जो चालों में न तुम फँसते

निकल बाहर चले आते, नज़ारा और कुछ होता ।


सियासत भी है मज़हब में, बने हैं क़ौम के लीडर

इरादे जो समझ जाते ,नज़ारा और कुछ होता ।


इधर भी सरफ़िरे कुछ हैं  उधर भी सरफ़िरे ;आनन’ 

तराने प्यार के गाते, नज़ारा और कुछ होता ।


आनन्द.पाठक



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