मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 224 [88 D]: एक रिश्ता जो ग़ायबाना है

 

ग़ज़ल 224[88D]

2122—1212—22

 

एक रिश्ता जो ग़ायबाना1 है ,

उम्र भर वह हमें निभाना है ।

 

इतनी ताक़त दे ऎ ख़ुदा मेरे !

आज उनसे नज़र मिलाना है ।

 

शेख जी ! फिर वही रटी बातें ?
और क्या कुछ नया बताना है ?

 

रंग-सा घुल गई समन्दर में ,

बूँद का बस यही फ़साना है ।

 

वो पुकारेगा जब कभी मुझको,

काम हो लाख , छोड़ जाना है।

 

तेरी आदत वही पुरानी है -

ज़ख़्म देकर के भूल जाना है ।

 

बात सबकी सुना करो ’आनन’ ,

जो कहे दिल वो आज़माना है ।

 

-आनन्द.पाठक-

 

1-    1- परोक्ष में. छिपा छिपा

कोई टिप्पणी नहीं: