बुधवार, 14 अगस्त 2024

ग़ज़ल 419 [68 फ़] : नहीं वह राज़ से पर्दा उठाता है--

 

ग़ज़ल 419[ 68 फ़]

1222---1222---1222


नहीं वह राज़ से पर्दा उठाता है ।
हमेशा ग़ैब से दुनिया चलाता है।

अक़ीदा साबित-ओ-सालिम कि झूठा है ?
यही हर मोड़ पर वह आजमाता है ।

नज़र आता नहीं लेकिन कहीं तो है
इशारों में मुझे कोई बुलाता है ।

उतर जाना है कश्ती ले के दरिया में ,
भरोसा है तो फिर क्यों ख़ौफ़ खाना है ।

चिराग़ों को भले तुम क़ैद कर लोगे ,
उजालों को न कोई रोक पाता है ।

हुनर होगा तुम्हारा ख़ास जो कोई
ज़माने में नुमायाँ हो ही जाता है ।

ज़माना जो भी समझे इश्क़ को’ ’आनन’
निभाना पर इसे सबको न आता है ।


-आनन्द.पाठक-


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