रविवार, 29 सितंबर 2024

ग़ज़ल 426[75 फ़] : झूठे ख़्वाब दिखाते क्यों हो

 

ग़ज़ल  426[75 फ़]

21--121--121--122  =16


झूठे ख़्वाब  दिखाते क्यों हो
सच को तुम झुठलाते क्यों हो

कुर्सी क्या है आनी-जानी
तुम दस्तार गिराते क्यों हो

तर्क नहीं जब पास तुम्हारे
इतना फिर चिल्लाते क्यों हो।

गुलशन तो हम सबका है फिर
तुम दीवार उठाते क्यों हो ।

बाँध कफ़न हर बार निकलते
पीठ दिखा कर आते क्यों हो ।

जब जब लाज़िम था टकराना
हाथ खड़े कर जाते क्यों हो ।

पाक अगर है दिल तो ’आनन’
दरपन से घबराते क्यों हो ।


-आनन्द.पाठक - 





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