सोमवार, 14 अक्टूबर 2024

अनुभूति 158/45

  अनुभूति 158/45
629
भला बुरा या जैसा भी हूँ
जो बाहर से, सो अन्दर से
शायद और निखर जाऊँ मै
पारस परस तुम्हारे कर से ।

630
विरह वेदना अगर न होती
तड़प नहीं जो होती इसमे
पता कहाँ फिर चलता कैसे
प्रेम भावना कितना किसमे।

631
हम दोनों की राह अलग अब
लेकिन मंज़िल एक हमारी
प्रेम अगन ना बुझने पाए
चाहे जो हो विपदा भारी ।

632
दोषारोपण क्या करना अब
किसने जोड़ा, किसने छोड़ा
टूट गई जब प्रेम की डोरी
व्यर्थ बहस क्या किसने तोड़ा
-आनन्द पाठक-

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