ग़ज़ल 124[12 A] -ओके
1222---1222---1222---122
मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन--मफ़ाईलुन---फ़ऊलुन
1222---1222---1222---122
मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन--मफ़ाईलुन---फ़ऊलुन
सलामत पाँव है जिनके, वो कन्धों पर टिके हैं
जो चल सकते हैं अपने दम, अपाहिज
से दिखे हैं
-आनन्द.पाठक-
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कि जिनके कद से भी ऊँचे "कट-आउट’ शहर में थे
जो भीतर झाँक कर देखा, बहुत नीचे गिरे हैं
बुलन्दी आप की माना कि सर चढ़
बोलती है
मगर ये क्या कि हम सब आप
को बौने दिखे हैं
ये "टुकड़े गैंग" वाले हैं फ़क़त मोहरे किसी के
सियासी चाल है जिनकी वो पर्दे में छुपे
हैं
कहीं नफ़रत, कहीं
दंगा ,कहीं फ़ित्ना, हवादिस
मुहब्बत के चराग़ों को बुझाने
पर अड़े हैं
हमारे साथ जो भी थे चले पहुँचे कहाँ तक
यही हम सोचते अब तक, कहाँ
पर हम रुके हैं
धुले
हैं दूध के कहते हैं जो ख़ुद को हमेशा
-आनन्द.पाठक-
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2 टिप्पणियां:
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 27.6.19 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3379 में दिया जाएगा
धन्यवाद
सुंदर
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