सोमवार, 17 जून 2019

चन्द माहिया : क़िस्त 05



:1:
जब बात निकल जाती
लाख जतन कर लो
फिर लौट के कब आती ?

:2:

यारब ! ये अदा कैसी ?
ख़ुद से छुपते वो
देखी न सुनी ऐसी

:3:

ऐसे न चलो ,हमदम !
लहरा कर जुल्फ़ें
आवारा है मौसम

:4:

माना कि सफ़र मुश्किल
होता है आसां
मिलता जब  दिल से दिल

:5:

 जब क़ैद ज़ुबां होती
बेबस आँखें तब
अन्दाज़-ए-बयां होती

-आनन्द.पाठक-
[सं0 15-06-18]

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