बुधवार, 31 मार्च 2021

ग़ज़ल 164 : जब कभी सच फ़लक से उतरा है

 ग़ज़ल 164
2212--1212--112/22
बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़
2122---1212---22
फ़ाइलातुन---मफ़ाइलुन-- फ़अ’ लुन
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सच कभी जब फ़लकसे उतरा है,
झूठ को नागवार  गुज़रा है।

बाँटता कौन है चिराग़ों को ,
रोशनी पर लगा के पहरा  है?

ख़ौफ़ आँखों के हैं गवाही में,
हर्फ़-ए-नफ़रत हवा में बिखरा है।

आग लगती कहाँ, धुआँ है कहाँ !
राज़ यह भी अजीब  गहरा है ।

खिड़कियाँ बन्द हैं, नहीं खुलतीं,
जख़्म फिर से तमाम उभरा है ।

दौर-ए-हाज़िर की यह हवा कैसी?
सच  भी बोलूँ तो जाँ पे ख़तरा है ।

आज किस पर यकीं करे ’आनन’
कौन है क़ौल पर जो ठहरा है ?


-आनन्द.पाठक- 


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