सोमवार, 30 जनवरी 2023

चन्द माहिए : क़िस्त 95/05

 क़िस्त 95/05 [माही उस पार]

1

सपनों के शीश महल

टूट ही जाना है

सच, आज नहीं तो कल


2

चलने की तैय्यारी

आ मेरी माहिया

कुछ और निभा यारी


3

मेरी भी गली में आ

ओ मेरी माहिया !

 बस एक झलक दिखला


4

कांटों से भरी राहें

तेरे दर की हों 

फिर भी तुमको चाहें


5

आसान नहीं होतीं

प्रेम नगर वाली

गलियाँ सँकरी होतीं


चन्द माहिए : क़िस्त 94/04

 क़िस्त 94/04 [माही उस पार]


1

कुछ यादें रह जाती

सूनी आँखों में

आँसू बन कर आतीं


2

कोई मिल जाता है

राह-ए-मुहब्बत में 

फिर क्यों खो जाता है?


3

कलियाँ सहमी सहमी

माली की नज़रें

दिखतीं बहकी बहकी


4

कुछ अपनी सीमाएँ

मर्यादा की हैं

हम भूल नहीं जाएँ


5

मैं इक प्यासा राही

मिलना है मुझको

उस पार मेरा माही 


चन्द माहिए : क़िस्त 93/03

 


क़िस्त 93/ 03 [माही उस पार]


1

दुनिया की छोड़ो तुम

क्या करना इसका

दिल से दिल जोड़ो तुम


2

ख़्वाबों में मिला करना

लौट के आऊँगा

इक दीप जला रखना


3

अब क्या मजबूरी है

और सुना माहिया

तेरी बात अधूरी है


4

जानी पहचानी सी

लगती है तेरी

कुछ मेरी कहानी सी


5

बाग़ों के बहारों का

रंग चढ़ा मुझ पर

कलियों के नज़ारों का


चन्द माहिए : क़िस्त 92/02

 क़िस्त 92/ 02[माही उस पार]


1

अब और न कर बातें

झेल चुकी हूँ मैं

हर बार तेरी घातें ।


2

टुकड़ा टुकड़ा जीवन

जोड़ के जीते हैं

जीने का है बन्धन


3

गो, सुनने में तीखे

पैसों के आगे

सब रिश्ते हैं फीके


4

आदाब मुहब्बत के

कुछ तो निभाते तुम

अन्दाज़ नज़ाक़त के


5

कैसी थी मुलाकातें

कुछ तो बता, गुइयाँ !

क्या क्या थी हुई बातें


चन्द माहिए: क़िस्त 91/01 : सावन पर

 क़िस्त 91 /01: [माही उस पार]==चन्द माहिए सावन पर


:1:
भींगे जब जब तन मन
सावन की बूँदे
लगती हैं मन भावन ।

;2:
अब की सावन में 
आएँगे साजन
गोरी सोचे मन में  ।

3
रुक ! सुन तो ज़रा बादल !
कैसे है प्रियतम?
यह पूछ रही पायल 

4
भूले से आ जाते
सावन में साजन
झूले पे झुला जाते

5
सावन की हरियाली
मस्त हुआ मौसम
कलियाँ भी मतवाली

-आनन्द पाठक-

रविवार, 29 जनवरी 2023

अनुभूतियाँ 125/12

 अनुभूतियाँ 125/क़िस्त 12
497
जीवन है सौग़ात किसी की
जब तक जीना, हँस कर जीना
बात बात पर रोना क्या है
हर पल आँसू क्यों है पीना
498
देख सुबह की नव किरणों को
आशाएँ लेकर आती हैं
शीतल मन्द सुगन्ध हवाएँ
नई चेतना भर जाती हैं
499
कण कण में है झलक उसी की
अगर देखना चाहो जो तुम
वरना सब बेकार की बातें
नहीं समझना चाहो जो तुम
500
रोज़ शाम ढलते ही छत पर
एक दिया रख आ जाती हूं~
लौटोगे तुम इसी राह से
सोच सोच कर हुलसाती हूं~
x

अनुभूतियाँ 124/11

 क़िस्त 124/क़िस्त 11
 
 493
आग लगाने वाली बातें
बार बार दुहराती क्यों हो
ला हासिल था तब भी,अब भी 
माजी में फिर जाती क्यों  हो 
 
494
मिलना जुड़ना और बिछ्ड़ना
यह जीवन का क्रम है सुमुखी !
सदा बहारों का मौसम हो-
एक कल्पना है भ्रम है सुमुखी !
 
495
मंज़िल मिलना या ना मिलना
यह तुम पर निर्भर करता है
राह कहाँ इसमे दोषी है-
जो जैसा करता, भरता है
 
496
बार बार यह कहते रहना
नहीं ज़रूरत तुम्हे किसी की
जिसको तुम ने ठुकराया हो
कहीं ज़रूरत पड़े उसी की

अनुभूतियाँ 123/10

 
क़िस्त 123/क़िस्त 10
 489
जब से दूर गए हो प्रियतम
साथ गईं मेरी साँसे भी
देख रही हैं सूनी राहें
और प्रतीक्षारत आँखे भी
490
मीठी मीठी बातें उनकी
ज़हर भरें हैं दिल के भीतर
नए ज़माने की रस्में हैं
क्यों लेती हो अपने दिल पर
 491
नफ़रत के बादल है अन्दर
कुछ दिन में जब छँट जाएँगे
प्रेम दया करुणा के सागर
खुद बह कर बाहर आएँगे
 
492
राह अभी माना दुष्कर है
उसके आगे राह सरल है
लक्ष्य साधना क्या मुश्किल है
इच्छा शक्ति अगर अटल है
 

अनुभूतियां 122/09

 
क़िस्त 122/क़िस्त 9
 
485
जनता को क्या अनपढ़ समझा
लम्बी लम्बी फेंक रहे हो
जलता है घर और किसी का
अपनी रोटी सेंक रहे हो
 
486
सुख दुख जीवन के दो पहलू
बारी बारी आना जाना
आजीवन कब दोनों रहते
क्या हँसना क्या नीर बहाना
 
487
सबके अपने अपने मसले
सब की अपनी है मजबूरी
साथ निभानेवाला कोई-
हमराही है एक ज़रूरी
 
488
मीठी मीठी चिकनी चुपड़ी
समझ रहा हूँ बातें सारी
देख रहा हूँ पट के पीछे
शहद घुली है घात कटारी
 

अनुभूतियाँ 121/08

 
क़िस्त 121/क़िस्त 8
 
481
बातों में जब गहराई हो
सब सुनते हैं सब गुनते हैं
हवा-हवाई बातॊ से भी-
कुछ हैं जो सपने बुनते हैं
 
482
साथ किसी का ठुकरा देना
अभी तुम्हारी आदत होगी
जीवन के एकाकी पथ पर
मेरी तुम्हें ज़रूरत होगी
 
483
साथ तुम्हारे होने भर से
हर मौसम बासंती मौसम
कट जाता यह सफ़र हमारा
साथ अगर तुम होते हमदम
 
484
किया  भरोसा मैने तुम पर
और तुम्हारी राहबरी का
कमरे में जयकार किसी का
बाहर नारा और किसी का
 
x

अनुभूतियाँ 120/07

 
क़िस्त 120/क़िस्त 7
 
477
जिन बातों से चोट लगी हो
मन में उनको, फिर लाना क्यों
जख्म अगर थक कर सोए हो
फिर उनको व्यर्थ जगाना क्यों
478
बीत गए वो दिन खुशियों के
शेष रह गई याद पुरानी
जीवन के पन्नों पर बिखरी
एक अधूरी लिखी कहानी
 
479
पर्दे के पीछे से छुप कर
कौन नचाता है हम सबको
कौन है वो जो खुशियाँ देता
कौन है जो देता ग़म सबको
 
480
सब दरवाजे बंद हो गए
होता नही कभी जीवन में
एक रोशनी अंधियारों में
सदा छुपी रहती है मन में

अनुभूतियाँ 119/06

 
क़िस्त 119/क़िस्त 6
 
473
देख रही हूँ दूर खड़े तुम
प्यास हमारी, तुम हँसते हो
बात नई तो नहीं है ,प्रियतम !
श्वास-श्वास  में  तुम बसते हो
 
474
आज नहीं तो कल लौटेंगी
गईं बहारें  फिर उपवन में
लौटोगी तुम फूल खिलेंगे
मेरे इस वीरान चमन में
 475
लाख मना करता है ज़ाहिद
कब माना करता है यह दिल
मयखाने से बच कर चलना
कितना होता है यह मुश्किल
 
476
भाव समर्प्ण नहीं हॄदय में
व्यर्थ तुम्हारी सतत साधना
पूजन-अर्चन से क्या होगा
मन में हो जब कुटिल भावना
x

अनुभूतियाँ 118/05

 
क़िस्त 118/क़िस्त 5
469
आ अब लौट चले मेरे दिल !
यादों की भूली बस्ती में
जहाँ उन्हे छेड़ा करते थे
अपनी धुन में , मस्ती मे

470
निश-दिन याद करूँगा तुम को
हक़ है मेरा उन यादों पर
जाने अनजाने जो किया था
मुझे भरोसा उन वादों पर

471
पहले वाली बात कहाँ अब
मौसम बदला तुम भी बदली
वो भी दिन क्या दिन थे अपने
मैं ’पगला’ था, तुम थी ’पगली’

472
शाम ढलेगी , गोधूली में
चरवाहें सब घर जाएंगे
हमको भी तो जाना होगा
कितने दिन तक रह पाएँगे

अनुभूतियाँ 117/04

 
क़िस्त 117/क़िस्त 4
 
465
अगर तुम्हे लगता हो ऐसा
साथ छोड़ना ही अच्छा है
जिसमे खुशी तुम्हारी होगी
मुझे तुम्हारा दिल रखना है
 
466
जा ही रहे हो लेते जाना
टूटा दिल यह, सपने सारे
क्या करना अब उन वादों का
तड़पाएँगे साँझ-सकारे ।
 
467
जहाँ रहो तुम ख़ुश रहना तुम
खुल कर जीना हाँसते गाते
अगर कभी कुछ वक़्त मिले तो
मिलते रहना आते-जाते
 
468
छोड़ गई तुम ख़ुशी तुम्हारी
लेकिन याद तुम्हारी बाक़ी
तुम्हें मुबारक नई ज़िंदगी
मुझको रहने दो एकाकी
x

अनुभूतियाँ 116/03

 
क़िस्त 116/क़िस्त 3
461
झगड़ा करना रूठ भी जाना
और मुझी पर दोष लगाना
कितना सब आसान तुम्हे है
बेमतलब का रार बढ़ाना
 
462
छोड़ गया जब कोई अचानक
दिल में सूनापन रहता है
एक ख़लिश सी रहती दिल में
दिल चुप हो कर सब सहता है
463
तू तू मैं मैं  से क्या होना
जो होना था हो ही गया अब
उन बातों का क्या करना है
ख़्वाब जगा था ,सो भी गया अब
 
464
हम दोनों के दर्द एक से
लेकिन दबा रहें हम दोनों
कहने को तो बात बहुत है
लेकिन छुपा रहे हम दोनों

अनुभूतियाँ 115/02

 
क़िस्त 115/क़िस्त 2
 
457
शायद तुम को खुशी इसी में
तुम जीती हो हारा हूँ मैं
अच्छा कोई बात नहीं है
फिर भी एक किनारा हूँ मैं
 
458
और कोई होता समझाता
तुमको समझाना मुश्किल है
एक लकीर खिंची पत्थर पर
और तुम्हारा पत्थर दिल है
 
459
सौ बातों की एक बात है
सब कुछ होता दिल के अन्दर
मानों तो ’देवत्व’ छुपा है
वरना पत्थर तो है पत्थर
 
460
इतना हठ भी ठीक नहीं है
टूट गया दिल फिर न जुड़ेगा
राख बची रह जाएगी फिर
अरमानों का धुँआ उड़ेगा

अनुभूतियाँ 114/01

 

क़िस्त 114/ 01 

453

कब आना था तुमको लेकिन

निश दिन मैने राह निहारे

हर आने जाने वाले से

पूछ रहा हूँ  साँझ-सकारे।

454

जिन रिश्तों में तपिश नहीं हो

उन रिश्तों को क्या ढोना है

हाय’ हेलो तक ही रह जाना

रस्म निबाही का होना है

455

कैसे मैं समझाऊँ तुमको

नही समझना ना समझोगी

तुम्ही सही हो, मैं ही ग़लत हूँ

बिना बात मुझ से उलझोगी

456

बात बात पर नुक़्ताचीनी

बात कहाँ से कहाँ ले गई

क्या क्या तुमने अर्थ निकाले

जहाँ न सोचा, वहाँ ले गई

शुक्रवार, 27 जनवरी 2023

ग़ज़ल 298 [63इ]: आग पहले तुम्ही लगाते हो

 ग़ज़ल 298/63


2122--1212--22

आग पहले तुम्हीं लगाते हो
और तुम ही जले-बताते हो

इन अँधेरों को कोसने वालों
इक दिया क्यूँ नहीं जलाते हो

झूठ की नींव पर खड़े होकर
रोज़ तोहमत नया लगाते हो

काँच का घर ही जब नहीं मेरा
खौफ़ पत्थर का क्या दिखाते हो

बाँध जब टूटने का ख़तरा है
सब्र क्यों और आजमाते हो

बात बननी ही जब नहीं कोई
बात फिर क्यों वही उठाते हो

आख़िरी सफ़ में है खड़ा ’आनन’
ाद कर के भी भूल जाते हो ?


-आनन्द.पाठक-
सफ़= पंक्ति कतार 

मंगलवार, 24 जनवरी 2023

ग़ज़ल 297 [62इ] : फेर ली तुमने क्यों मुझसे अपनी नज़र

 ग़ज़ल 297/62


212--212--212--212

फेर ली तुमने क्यों मुझसे अपनी नज़र
छोड़ कर दर तुम्हारा मैं जाऊँ किधर ?

ये अलग बात है तुम न हासिल हुए
प्यार की राह लेकिन चला उम्र भर

उठ के दैर-ओ-हरम से इधर आ गया
जिंदगी मयकदे में ही आई नजर

ख़ुदनुमाई से तुमको थी फ़ुरसत कहाँँ
देखते ख़ुद को भी देखते किस नज़र

बोल कर थे गए लौट आओगे तुम
रात भी ढल गई पर न आई ख़बर

सरकशी मैं कहूँ या कि दीवानगी 
वह बनाने चला बादलों पर है घर

उसको ’आनन’ सियासी हवा लग गई
झूठ को सर झुकाता सही मान कर 


-आनन्द.पाठक-

सोमवार, 23 जनवरी 2023

ग़ज़ल 296[61इ] ; मिलता हूँ गले लग कर

 ग़ज़ल 296 [61इ]


221--1222 // 221-1222


मिलता हूँ गले लग कर, अपनी तो है बीमारी
दिल खोल के रखता हूँ, यारों से है दिलदारी

जो दाग़ लगे दिल पर नफ़रत से कहाँ मिटते
हर बार मुहब्बत ही नफ़रत पे पड़ी भारी

सत्ता के नशे में तुम रौंदोगे अगर यूँ ही
मज़लूम के हर आँसू बन जाएगी चिंगारी

कीचड़ से सने कपड़े कीचड़ से कहाँ धुलते
हर शख्स में होती जो, इतनी तो समझदारी

तुम दूध पिलाते हो साँपों को बसा घर में
वो आज नहीं तो कल कर जाएंगे गद्दारी

आसान नहीं होता ईमान बचा रखना
फिर काम नही आती जुमलॊं की अदाकारी

”आनन’ की जमा पूँजी बाक़ी है बची अबतक
इक चीज़ शराफ़त है इक चीज़ है ख़ुद्दारी


-आनन्द.पाठक-

रविवार, 22 जनवरी 2023

ग़ज़ल 295[60इ] : यही देखा किया मैने--

 ग़ज़ल 295[60इ]

1222---1222---1222---1222


यही देखा किया मैने यही होता रहा अक्सर
कभी नदियाँ रहीं प्यासी कभी प्यासा रहा सागर

जो डूबोगे तो जानोगे किसी दर्या की गहराई
भला समझोगे तुम कैसे किनारों पर खड़े होकर

जो अफ़साना अधूरा था विसाल-ए-यार का मेरा
चलो बाक़ी सुना दो अब कि नींद आ जाएगी बेहतर

हमें ऎ ज़िंदगी ! हर मोड़ पर क्यों आजमाती है
हमारे आशियाँ पर क्यों तुम्हारे ख़ौफ़ का मंज़र ?

नदी को इक समन्दर तक लबों कि तिश्नगी उसकी
पहाड़ों में कि सहरा में दिखाती राह बन ,रहबर 

उधर अब शाम ढलने को ,इधर लम्बा सफ़र बाक़ी
तराना छेड़ कुछ ऐसा सफ़र कट जाए, ऎ दिलबर !

तमाशा खूब है यह भी, किसे तू ढूँढता 'आनन'
जिसे तू ढूँढता रहता वो रहता है तेरे अन्दर


-आनन्द.पाठक-


शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

ग़ज़ल 294[59इ] : जमाल-ओ-हुस्न जब उनका----

 ग़ज़ल 294

1222---1222---1222--1222


जमाल-ओ-हुस्न  जब उनका बहारों पर उतर आया
चमन गाने लगा सरगम दिल अपना भी निखर आया

हज़ारों रंग से हमने सँवारी ज़िंदगी अपनी
मगर हर रंग में इक रंग उनका भी उभर आया

मुहब्बत में कमी होगी, वो नादाँ भी रहा होगा
तुम्हारे दर तलक जा कर भी वापस लौट कर आया

निगाह-ए-शौक़ से क्या क्या मनाज़िर है नहीं गुज़रे
न उनकी रहगुज़र आई, न नक़्श-ए-पा नज़र आया

ढलेगी शाम अब साथी परिंदे घर को लौटेंगे
चलो अब ख़त्म होने को हमारा भी सफ़र आया

समझना ही नहीं चाहा कभी इस दिल की चाहत को
तुम्हें सिक्के का बस क्यों  एक ही पहलू नज़र आया

ये दीवानों की बस्ती है, फ़ना है आख़िरी मंज़िल
तमाशाघर नहीं 'आनन' समझ कर क्या इधर आया ?

-आनन्द.पाठक-






ग़ज़ल 293 [58इ] : ये हक़ीक़त है या फ़साना है

 ग़ज़ल 293[58इ]

2122---1212--22


ये हक़ीक़त है या फ़साना है
हर जगह आप का ठिकाना है

आप से हम क़रार क्या करते
आप को कौन सा निभाना है

वक़्त की बारहा कमी रोना
जानता हूँ फ़क़त बहाना है

आप आएँ ग़रीबख़ाने पर
ख़ैर मक़दम में सर झुकाना है

आसमाँ से ज़मीं पे आ जाते
हाल-ए-दुनिया तुम्हे दिखाना है

रूठ कर जाते भी कहाँ जाते
लौट कर फिर यहीं पे आना है

इल्तिज़ा और क्या करूँ ’आनन’
वक़्त रहते न उनको आना है


-आनन्द.पाठक-




मंगलवार, 17 जनवरी 2023

ग़ज़ल 292[57इ] : कल तुम्हारा शहर सारा जश्न में डूबा रहा

 ग़ज़ल 292 [57 इ]

2122---2122---2122--212


कल तुम्हारा शहर सारा जश्न में डूबा रहा
पर हमारी बस्तियों में एक सन्नाटा रहा

वह मुजस्सम सामने है फ़ाइलों में मर चुका
पर अदालत में महीनों मामला अटका रहा

प्यार के ’पैंतीस’टुकड़े काट कर फेंके गए
’आदमीयत’ मर गई पर आदमी ज़िंदा रहा

बन्द कर लेता हैं आँखें रोशनी चुभती उसे
इसलिए ही तीरगी से वास्ता उसका रहा

जब कहीं आया नज़र कोई चमन हँसता हुआ
ले के ’माचिस’ हाथ में साज़िश का वो चेहरा रहा

चाहतें बढ़ती गईं और प्यास थी कुछ इस तरह
पी गया पूरी नदी वह बा'द हु प्यासा रहा

दौर-ए-हाज़िर की अब ’आनन’ क्या रवायत हो गई
सच इधर सूली चढ़ा बातिल उधर गाता रहा ।


-आनन्द,पाठक-

रविवार, 15 जनवरी 2023

ग़ज़ल 291[56इ] : वह अँधेरो की हिफ़ाज़त में लगा है

 ग़ज़ल 291[56इ]

2122---2122---2122


वह अँधेरों की हिफ़ाज़त में लगा है
रोशनी की ही शिकायत में लगा है

धूप कितनी चढ़ गई उसको पता क्या
वह पुरानी ही हिकायत में लगा है

हो बलाएँ, मौत हो सैलाब आए
हादिसों पर वह सियासत में लगा है

इक तरफ़ मक़्तूल पर आँसू बहा कर
अब वह क़ातिल की जमानत में लगा है

ज़ाहिरन मजलूम की है बात करता
दल बदल वाली तिजारत में लगा है

बन्द कमरे में हमेशा सरनिगूँ जो
वह दिखावे की बग़ावत में लगा है

राग दरबारी सुनाने में लगे सब
और तू ’आनन’ दियानत में लगा है ?


-आनन्द पाठक-

शनिवार, 14 जनवरी 2023

ग़ज़ल 290 [55E] : उनसे मिलना नहीं हुआ ---

 ग़ज़ल 290[55E]


2122---1212---22


उनसे मिलना नहीं हुआ फिर भी
शौक़ मेरा बना रहा फिर भी

आग नफ़रत की बुझ चुकी कब की
लोग देते रहे हवा फिर भी

अह्ल-ए-दुनिया कहे बुरा मुझको
मैने माना नहीं बुरा फिर भी

छोड़ कर जो चला गया मुझको
याद आता है बारहा फिर भी

वह मिला भी तो फ़ासिले से मिला
वह गले से नहीं मिला फिर भी

सच अगर सच है ख़ुद ही बोलेगा
लाख हो झूठ से दबा फिर भी

जागना था उसे जहाँ ’आनन’
जाग कर हैफ़! सो गया फिर भी


-आनन्द.पाठक--


अनुभूतियाँ : क़िस्त 113

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 113 ओके
449
भली रही या बुरी रही थी ,
एक लगन की एक अगन थी,
तेरे घर की राहें दुष्कर,
लेकिन चाहत आजीवन थी ।
 
 
450
दुनिया चाहे जो भी समझे,
’अनुभूति’ के रंग हमारे,
वक़्त कसौटी पर जाँचेगा,
रंग निखर आएँगे  सारे ।
 
451
जब हमने ख़ुद राह चुनी है,
राह-ए-मुहब्बत, राह फ़ना की
दोष किसी को फिर देना क्या
किसने छोड़ी राह वफ़ा  की ।
 
452
सच का साथ न छोड़ा मैने,
द्वन्द  रहा आजीवन मन में.
साँस साँस बन हर पल उतरी,
’अनुभूति’ मेरे जीवन में ।
00---00---00
आखिरी बंद

वेदनाएँ तड़प कर बनी बिजलियाँ
जब न पीड़ा मेरी ढल सकी शब्द में
बन के आँसू ढली मेरी अनुभूतियाँ
 
 
-- समाप्त-

भावनाएँ कभी बन गईं तितलियाँ


अनुभूतियाँ : क़िस्त 112

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 112 ओके
445
क़तरा क़तरा मिल जाता है
बन जाता है एक समन्दर,
भेद खत्म फिर हो जाता है
क्या था बाहर, क्या था अन्दर ।
 
446
कुछ तो कमियाँ सब के अन्दर
सबको क्या सब कुछ हासिल है ?
कब होता इन्सान फ़रिश्ता
हस्ती किसकी कब कामिल है ?
 
447
यह "अनुभूति" नही किसी की
तेरी, मेरी, हम सबकी है,
फ़र्क यही कि मैने कह दी
और सभी ने बस सह ली है ।
 
448
प्रेम समर्पण एक साधना
चलता नहीं दिखावा इसमें
पाने की कुछ चाह न रहती
बस देना ही देना जिसमें
-आनन्द.पाठक-
 
 

अनुभूतियाँ : क़िस्त 111

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 110 ओके
441
गिरना-पड़ना, उठना-चलना
पाना-खोना, हँसना-रोना ,
प्यार-मुहब्बत, मिलन जुदाई
जब तक साँस तभी तक होना ।
 
442
पीड़ा की अपनी पीड़ा है
दुनिया कहाँ सुना करती है ?
अपनी ही बस गाती रहती
अपनी राह चला करती है ।
 
443
आँख भिगोने वाली बातें
 क्यों करती रहती तुम अकसर
द्वार हृदय का खुला हुआ है
 जब दिल चाहे  आना दिलबर।
 
444
पाप-पुण्य का बोझ उठाए
घूम रही हो तुम दुनियाभर
सत्य विवेचन कर देगा मन
झाँकोगी जब मन के अन्दर
 
 

शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

अनुभूतियाँ : क़िस्त 110

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 110 ओके
437
प्रेम अगन ही एक अगन है
अपने आप दहक जाती है,
जितना इसे बुझाना चाहो
उतनी  और भड़क जाती है ।
 
438
बिन्दु-वृत्त का जो है रिश्ता
उस त्रिज्या से सधे हुए हैं
एक परस्पर आकर्षण से,
हम तुम दोनों बँधे हुए हैं ।
 
439
अंधकार हो अगर हॄदय में,
आशा की भी किरन वहीं है
हार मान कर बैठे रहना
यह कोई संघर्ष नहीं  है ।
 
440
अगर चला जाता है कोई ,
दुनिया भला कहाँ रुक जाती
चार दिनों के बाद वही फिर
लौट के पटरी पर है आती ।
 

अनुभूतियाँ : क़िस्त 109

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 109 ओके
433
ऐसे लोग बहुत हैं जिनको
साँस-साँस बन मिला न कोई,
उम्र प्रतीक्षा में कट जाती
फिर भी शिकवा गिला न कोई।
 
434
तेरी आँखों से पढ़ता हूँ
अपनी कुछ अनकही कहानी
खिलने से पहले ही कैसे
ढल जाती है भरी जवानी
 
435
अपनी चाहत फ़ना हुई है
एक आख़िरी चाह बची है
आ जाओ तो ठीक है वरना
एक आख़िरी राह बची है
 
436
तुम्ही समाए हो जब अन्दर
तो  फिर मै बाहर क्यों देखूँ ?
 अपना ही मन काबा-काशी
और किसी का दर क्यों देखूँ ?
 
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अनुभूतियाँ : क़िस्त 108

अनुभूतियाँ : क़िस्त 108 ओके
 
429
बाजी बिछी हुई है, प्यारे !
हम बिसात के सब मोहरे हैं,
हाथी -घोड़ा ,राजा-रानी
एक बुलावे तक ठहरे हैं ।
 
430
छाप-तिलक या माला भगवा
ये साधन है, साध्य नहीं हैं,
यह तो एक छलावा भर है
मन में जब ’आराध्य’ नहीं हैं।
 
431
कभी कभी बीती यादों से
आँखें भर आती बेमौसम
जाने कहाँ गए वो दिन अब
पहलू में होता था हमदम ।
 
432
मेघदूत ! बस एक बार फिर
जा कर कह दे पाषाणी  से
"व्यर्थ विवेचन करना इस पर
दिल तोड़ा किसने वाणी से?"

अनुभूतियाँ : क़िस्त 107

 अनुभूतियाँ : क़िसत 107 ओके
425
पा न सका हूँ अबतक मंज़िल
हर मंज़िल की एक कथा है
याद करूँ तो आँखें नम हो
हर आँसू की एक व्यथा है
 
426
जनम जनम की बात हुई थी
एक जनम भी नहीं निभाया !
अच्छा, कोई बात नहीं, प्रिय !
सदा रहूँगी बन कर छाया ।
सदा रहूँगी बन कर छाया ।
 
427
जब श्रद्धा के फूल न खिलते
तो फिर  पूजन-अर्चन क्या है ,
तुम ही उतरो जब न हॄदय में
ढोल-मजीरा कीर्तन क्या है ।
 
428
प्रेम का धागा ,कच्चा धागा
लेकिन पक्के से पक्का है ,
प्रेम न होता हवा-हवाई
सच्चे से भी वह सच्चा है ।
 

अनुभूतियाँ : क़िस्त106

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 106 ओके
421
जाने क्या है चाहे जितनी
लरज गरज कर बदली बरसी।
प्यास है ऐसी, बुझी न अबतक
प्यासी धरती फिर से तरसी ।
 
422
कहने की तो बात नहीं है
बिना कहे दिल रह ना पाए
दर से जिसको उठा दिए तुम
अब वो कहाँ किधर को जाए?
 
423
जितनी बार मिली तुम मुझ से
नज़र झुकाए देखा मैने,
मर्यादा की जो रेखा थी
पार न की वो रेखा मैने ।
 
424
उतना ही सच नहीं कि जितना
ये आंखें जो देखा करती ,
परदे के पीछे भी सच है
मै ही क्या सब दुनिया कहती। 
 
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अनुभूतियाँ : क़िस्त 105



 अनुभूतियाँ : क़िस्त 105 ओके
 417
इधर उधर की बातें क्यों तुम
करती रहती घुमा फिरा कर,
क्यों मुझको भरमाती रहती
झूठी मूठी बात बना कर ।
 
418
नज़र झुका कर फिर न उठाना
मुझको काफी एक इशारा ,
दिल की बात अगर मैं  कह दूँ
तुम को शायद हो न गवारा ।
 
419
छू कर आतीं मृदुल हवाएँ
जब जब तेरा कोरा आँचल,
रोम-रोम तब खिल उठता है
मन मेरा हो जाता  पागल ।
 
420
सच है कि वो नज़र न आता
होने का एहसास है लेकिन ,
शीतल मन्द सुगन्ध हवा-सी
पास सदा रहता है लेकिन ।
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