ये बाद-ए-सबा है ,भरी ताज़गी है फ़ज़ा में अजब कैसी दीवानगी है निज़ाम-ए-चमन जो बदलने चला तो क्यूँ अहल-ए-सियासत को नाराज़गी है वो सपने दिखाता ,है बातें बनाता ख़यालात में उस की बेचारगी है बदल दे ज़माने की रस्म-ओ-रवायत अभी सोच में तेरी पाकीज़गी है दुआयें करो ये तलातुम से उबरे गो मौजों की कश्ती से रंजीदगी है वो वादे निभाता, निभाता भी कैसे ? वफ़ा में कहाँ अब रही पुख़्तगी है ? हो दीवार-ए-ज़िन्दां से क्यों ख़ौफ़ ’आनन’ अगर तेरी ताक़त तेरी सादगी है
नफ़रत की होलिका जलाएं, रंग चलो प्यार के लगाएं रस्में जो हो गईं पुरानी जैसे कि ठहरा हुआ पानी चेतना की नई लेखनी से नए दौर की लिखें कहानी ’वसुधैव कुटुम्बकम’-की धुन पे, गूंज उठें वेद की ऋचाएं कोसने से क्या भला मिलेगा अँधियारा तो नहीं मिटेगा हौसले से मुठ्ठियाँ जो भींचो ज़मीं तो क्या, आस्मां हिलेगा उठती दीवार जब गिराएं, आयेंगी सन्दली हवाएं बातें जो बीत गई ,छोड़ो दो दिल के बीच सेतु जोड़ो रूढियां जो रोकतीं हों राहें मिल के उन रूढियों को तोड़ो अंगद-सा एक पाँव रख दो ,टूटने लगेंगी वर्जनाएं तितलियों के पंख तुम कतर के किस पे पौरुष जता रहे हो ? ये तो कोई वीरता नहीं है जैसा कि तुम बता रहे हो मन से कभी भाग न सकोगे, घेरती रहेंगी चेतनाएं सड़कों पे भीड़ उतर आई मौसम नें ली हैं अँगड़ाई कल तक जो आम आदमी था उसने आवाज़ तो उठाई भरने दो रंग तूलिका से ,उसकी जो भी हैं कल्पनाएं नफ़रत की होलिका जलाएं-रंग चलो प्यार के लगाएं ।