गुरुवार, 23 दिसंबर 2021

ग़ज़ल 202 : बात यूँ ही निकल गई होगी--

 ग़ज़ल 202
2122--1212--22

बात यूँ ही निकल गई होगी
रुख की रंगत बदल गई होगी

वक़्त-ए-रुख़सत जो उसने देखा तो
हर तमन्ना निकल गई होगी

वक़्त क्या क्या नहीं सिखा देता
टूटे दिल से बहल गई होगी

दौर-ए-हाज़िर की रोशनी ऐसी
रोशनी से वह जल गई होगी

सर्द रिश्ते गले लगा लेना
बर्फ़ अबतक पिघल गई होगी

एक दूजे के मुन्तज़िर दोनों
उम्र उसकी भी ढल गई होगी

ज़िक्र ’आनन’ का आ गया होगा
चौंक कर फिर सँभल गई होगी

-आनन्द.पाठक-

सोमवार, 20 दिसंबर 2021

ग़ज़ल 201 : मुहब्बत की उसने सज़ा जो सुनाई

 ग़ज़ल 201
122---122--122---122

मुहब्बत की उसने सज़ा जो सुनाई
न क़ैद-ए-कफ़स ही, न होगी रिहाई

भरोसा नहीं जब मेरी बात का तो
कहाँ तक तुम्हें दूँ मैं अपनी सफ़ाई

ये मासूम दिल था, समझ कुछ न पाया
इशारों में जो बात तुम ने बताई

नज़र को मेरी वैसी ताक़त भी देते
अगर तुम को करनी थी जल्वानुमाई

कहीं ज़िक्र आया न मेरा अभी तक
कहानी अधूरी है तुमने सुनाई

हज़ारों शिकायत तुम्हे ज़िन्दगी से
कभी ज़िन्दगी से की क्या आशनाई ?

सुना है कि शामिल वो हर शय में ’आनन’
वो ख़ुशबू है, ख़ूशबू  न देती दिखाई

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 18 दिसंबर 2021

ग़ज़ल 200 : बदल गईं जब तेरी निगाहें---

                  ग़ज़ल 200
121-22/ 121-22 /121-22/ 121-22

बदल गईं जब तेरी निगाहें , ग़ज़ल का उन्वां बदल गया है
जहाँ भी हर्फ़-ए-करम लिखा था, वहीं पे हर्फ़-ए-सितम लिखा है 

अजब मुहब्बत का यह चलन है जो डूबता है वो पार पाता
फ़ना हुए हैं ,फ़ना भी होंगे, ये सिलसिला भी कहाँ रुका है 

पता तो उसका सभी है जाने, तलाश में हैं सभी उसी के
कभी तो दैर-ओ-हरम में ढूँढू , कभी ये लगता कि लापता है

न कुछ भी सुनना, न कुछ सुनाना, न कोई शिकवा,गिला,शिकायत
ये बेख़ुदी है कि बेरुख़ी है, तुम्हीं बता दो सनम ये क्या है ?

पयाम मेरा, सलाम उनको, न जाने क्यों नागवार गुज़रा
जवाब उनका न कोई आया, मेरी मुहब्बत की यह सज़ा है
 
तमाम कोशिश रही किसी की, कि बेच दूँ मैं ज़मीर अपना
मगर ख़ुदा की रही इनायत, ज़मीर अबतक बचा रखा है
 
जिसे तुम अपना समझ रहे थे, हुआ तुम्हारा कहाँ वो ’आनन’
उसे नया हमसफ़र मिला है. तुम्हें वो दिल में कहाँ रखा है 

-आनन्द.पाठक-